शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट पर पढ़िए टी शर्मा की विस्तृत पड़ताल

उपराज्यपाल नजीब जंग द्वारा गठित 3 सदस्यीय शुंगलू जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में केजरीवाल सरकार पर नियमों और प्रक्रियाओं को ताक पर रख कर नियुक्तियां और स्थानांतरण करने, दिल्ली सरकार के सीमित अधिकारों के बावजूद अपने निर्णयों में जान-बूझकर संवैधानिक व कानूनी प्रक्रिया का पालन न करने, कानूनी तौर पर अयोग्य व्यक्तियों को आवास व अन्य सुविधाएं देने व कुछ ख़ास सरकारी और सेवानिवृत्त अधिकारियों की गैरकानूनी तरीके से मदद करने का आरोप है।

101 पन्नों की रिपोर्ट ज्यादातर ऐसे मामलों से भरी हुई है, जहां ये जानते हुए भी कि उपराज्यपाल की अनुमति जरूरी है, लेकिन उपराज्यपाल को सम्बंधित फाइल ही नहीं भेजी गयी।

शुंगलू कमेटी द्वारा पकड़ी केजरीवाल सरकार की मुख्य गड़बड़ियां

1. सौम्या जैन को दिल्ली स्टेट हेल्थ मिशन निदेशक की सलाहकार नियुक्त करना। शुंगलू कमेटी ने इस नियुक्ति को पूरी तरह से गैरकानूनी बताया है। मजेदार बात यह है कि आधिकारिक रूप से उनकी न तो किसी ने नियुक्ति की, न ही उन्हें इसके लिए कोई नियुक्ति पत्र मिला। उनकी नियुक्ति के लिए बस सचिव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को ये लिख दिया गया कि चेयरमैन एस. एच. एस. इन्हें सलाहकार नियुक्त कर सकता है। यहां तक कि कोई नियुक्ति आदेश तक जारी नहीं किया गया। तीन महीने के कार्यकाल में उनके ऊपर 1.15 लाख का खर्च आया। पेशे से आर्किटेक्ट सौम्या जैन स्वास्थ्य सेवाओं के अध्ययन के लिए सरकारी खर्च पर चीन के दौरे पर गयीं। शुंगलू कमेटी ने आगे लिखा है कि इस सबकी एक ही वजह थी कि सौम्या दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री की बेटी थीं। (पेज 13 पर)

2. विधायक अखिलेश पति त्रिपाठी को 2000 वर्ग फुट का पूरी तरह सुसज्जित आवासीय घर कार्यालय के नाम पर देना। कार्यालय के नाम पर ऐसे 10 आवास 10 विधायकों को देने की बात सामने आई है। इस मामले की और विस्तृत जांच की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री ने हर विधायक को ऐसे कार्यालय देने की बात कही है।  (पेज 15 -16)

3. स्वाति मालीवाल जो दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष हैं, को नियमों के विरुद्ध जाकर सरकारी आवास देना। यहां गौर देने वाली बात यह है कि वे आप के एक बड़े नेता नवीन जयहिंद की पत्नी हैं। (पेज 17)

4. केजरीवाल का गोपाल मोहन को 1 रु. वेतन पर अपना सलाहकार नियुक्त करना, पर 4 महीने बाद ही उन्हें वहां से हटाकर एक अन्य खाली हुए पद पर जिसका वेतन 115000 मासिक है, पर स्थानांतरित कर देना। जांच आयोग इस सारी कार्यवाही को सीधा व्यक्ति विशेष को गलत आचरण से फायदा पहुंचाने का मामला बताया है। (पेज 21 -22)

5. बड़ी संख्या में ऐसे मामले हैं जहां नियुक्तियों में गलत तरीके से ख़ास लोगों की मदद की गयी। (पेज 17 ,18 ,19 ,20)

6. एलजी की बिना अनुमति और प्रक्रिया के सरकारी खर्च पर मंत्रियों और विधायकों के गैरजरुरी विदेशी दौरों पर धन की बर्बादी। (पेज 30)

7. सरकारी कंपनियों BTL, DPCL, IGPCL, के निदेशक मंडल में नियमों के विरुद्ध निदेशकों की नियुक्ति।

8. संवैधानिक संस्थाओ में भर्ती के नियमों के विरुद्ध अयोग्य व्यक्तियों की भर्ती। (पेज 40, 41, 42, 43, 46, 47, 48, 49, 50)

9. इसके अलावा जांच आयोग ने सरकारी पैनल पर रखे नए वकीलों और उनको दी जा रही फीस पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाए हैं। आयोग को ऐसी 46 फाइलों का पता चला है जहां वकीलों को स्पेशल काउंसलर नियुक्त किया गया है। ऐसे लगता है इतनी बड़ी संख्या में बिना किसी काम के वकीलों की नियुक्ति गलत आचरण से की गयी है। ऐसी ज्यादातर नियुक्तियों के समय कानून और वित्त विभाग से भी कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया।

10. बहुत सारे ऐसे मामले हैं जहां एक ही केस 2 वकीलों को दिया गया। जांच आयोग ने वकीलों की इस गैरजरूरी नियुक्ति पर हाईकोर्ट के एक जज पीएस तेजी की एक तीखी टिप्पणी का भी हवाला दिया है, जहां लिपिका मित्रा vs स्टेट CRL .MC 48 92 /2015 के मामले में सुनवाई के दौरान कहा, ‘आज फिर अदालत में तमाशा हुआ है, जहां 2 वकील अपने आप को सरकार का वकील कह रहे हैं। न तो यह न्याय व्यवस्था और अदालत की कार्यवाही के हित में है और न ही सरकार के लिए यह परिदृश्य सही हो सकता है। (पेज 68 ,69)