सोचने पर मजबूर कर देंगे दिल्ली एमसीडी चुनाव के मुद्दे

जनज्वार। परंपरागत रूप से स्थानीय निकाय के चुनावों में नाली, पानी, सड़क, सफाई, स्वास्थ्य और सहुलियतें मुद्दा हुआ करती हैं। लोग पार्षदों को इस आधार पर वोट करते हैं कि उनको मच्छर, बदबू, प्रदूषण, अतिक्रमण, बीमारी, अशिक्षा और खराब सीवर सिस्टम से कौन पार्टी बचाएगी।

पर अबकी दिल्ली एमसीडी चुनाव में ऐसा नहीं है।

दिल्ली एमसीडी ‘म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन आॅफ दिल्ली’ चुनाव में तीन तलाक, हलाला, कश्मीर में आतंकवाद, वहां के प्रदर्शकारियों से सेना का बर्ताव, योगी का रोमियो स्क्वायड, गोहत्या पर गोरक्षकों की पहल, राष्ट्रवाद और देशद्रोह की बहस आदि मुद्दा बना हुआ है।

जागरूक वोटरों का एक तबका सीरिया में बच्चों की हत्या, अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान में गिराया गया 10 हजार किलो का बम और पाकिस्तान में कुलभूषण जाधव को दी गयी फांसी के फरमान पर भी बहस कर तय कर रहा है कि दिल्ली एमसीडी चुनावों में किस पार्टी को वोट दिया जाए।

यही वजह है कि कोई पार्षद जनता के बुनियादी मुद्दों सड़क, पानी, सफाई, स्वास्थ्य आदि पर ज्यादा फोकस कर बात नहीं कर रहा है। अलबत्ता जो पार्टी और पार्षद जनता की बुनियादी जरूरतों पर ज्यादा केंद्रीत कर वोट मांग रहे हैं उनकी जनता के बीच कोई चर्चा नहीं है या है भी तो इस रूप में कि ‘उनकी बात ठीक है पर वह टक्कर में नहीं हैं।’

उदाहरण के तौर पर योगेंद्र यादव के नेतृत्व वाली ‘स्वराज पार्टी’ को लिया जा सकता है। स्वराज पार्टी अपने 211 पार्षद प्रतिनिधियों के माध्यम से लगातार जनता के बुनियादी मुद्दों पर फोकस किए हुए है। आप या कांग्रेस की तरह वह स्थानीय मुद्दों से जरा भी इधर—उधर नहीं हो रही। स्वराज पहली ऐसी पार्टी है जिसने पर्यावरण को दिल्ली की मूल सवालों में शामिल किया है।

पर ‘साफ दिल और साफ दिल्ली’ के नारे साथ एमसीडी चुनाव में उतरी स्वराज पार्टी के बारे में पत्रकारों की आम राय है कि मुश्किल से इस पार्टी का खाता खुल पाएगा और ज्यादातर जगहों पर प्रतिनिधियों की जमानत जब्त होगी। सर्वे एजेंसियों का भी यही आकलन है।

सवाल है कि दिल्ली जैसे प्रोफेशनल शहर का यह हृदय परिवर्तन हुआ कैसे? क्यों वोटरों को जीवन की बुनियादी सुविधाओं की सरकारों से मांग और उनका पूरा कराने का अधिकार रोमांचित—आंदोलित नहीं करता, क्यों उन्हें आंदोलन का सारा आनंद राष्ट्रवाद, कश्मीर, राष्ट्रवाद और हिंदू—मुस्लिम विभाजन पर आने लगा है?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक पीयुष पंत की राय में, ‘भाजपा के राष्ट्रवादी शोर—सराबे ने पिछले कुछ चुनावों से लोगों का माइंडसेट चेंज कर दिया है। एक के बाद एक भाजपा की जीत लोगों की इस समझ को मजबूत कर रही है कि बेकारी, गरीबी, अशिक्षा, महंगाई हमारी किस्मत है और मुद्दे जिनसे उन्हें निपटना है वह देशद्रोह, राष्ट्रवाद और हिंदू—मुसलमान हैं।’

चार एमसीडी चुनाव कवर कर चुके वरिष्ठ पत्रकार अनिरूद्ध शर्मा कहते हैं, ‘भाजपा उत्तर प्रदेश में जिस राह जीती है वह उसी को यहां भी आजमा रही है। उत्तर प्रदेश चुनाव राज्य के सवालों—समस्याओं से ज्यादा आतंकवाद, कश्मीर, राष्ट्रवाद, हिंदू—मुस्लिम और केंद्र की उपलब्धियों पर केंद्रीत रहा। एमसीडी चुनावों में कौन पार्टी बहुमत पाएगी इस पर कुछ कहने की बजाए मैं यह कहना चाहुंगा कि ‘पब्लिक परसेप्शन’ में भाजपा जीती हुई दिख रही है।’


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