टेकनाथ रिज़ाल से अजय प्रकाश  की बातचीत

नेपाली भाषी भूटानी नागरिक पिछले १६ सालों से नेपाल के सात कैम्पों में शरणार्थियों का जीवन बीता रहे हैं. इन नागरिकों को भूटानी राजशाही ने देश निकाला कि सजा दी क्योंकि इन्होने लोकतांत्रिक प्रक्रिया लागु किये जाने के लिये संघर्ष किया. संयुक्त राष्ट्र संघ आदि दानदाता एजेंसियों के सहारे गुजर-बसर कर रहे शणार्थियों की आबादी लगभग १ लाख पचास हजार हो चुकी है. देशनिकाला का दंश झेल रहे इस आबादी का यह अनुपात भूटान की कुल जनसंख्या का पांचवां हिस्सा है.पराये देश में इनकी तीसरी पीढी नौजवान हो चुकी है. अपने मुल्क की ओर जाने का जब भी प्रयास किया तो भारतीय फौजों ने दखलंदाजी की. कारण कि नेपाल से भूटान जाने का रास्ता भारत होकर ही जाता है. हालिया राजनीतिक परिवर्तनों के मद्देनजर भूटान में चुनाव होने जा रहे हैं बावजूद कि वहां कि एक बडी आबादी देश से बाहर है.
टेकनाथ रिजाल नेपाल में रहने वाले भूटानी शरणार्थियों के लोकप्रिय नेता हैं. भूटानी राजशाही ने १९८९ में लोकतांत्रिक आंदोलन खडा करने के आरोप में रिज़ाल को १० साल के कैद की सज़ा दे डाली. १८ दिसम्बर १९९९ को जेल से मुक्त होने के बाद से वह नेपाल में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं.राजशाही की देखरेख में लोकतन्त्र की स्थापना की कवायद से शणार्थियों को क्या उम्मीदें हैं, भारत से वे क्या चाहते हैं जैसे मसलों पर टेकनाथ रिज़ाल से जून २००७ में विस्तृत बातचीत की. आज जब वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया लागू किये जाने की नौटंकी हो रही है वैसे में इस साक्षारत्कार से आपका साबका हो, यह जरूरी लगता है.

भूटानी नागरिक भारतीयों के साथ कैसा रिश्ता महसूस करते हैं?

भारत के आजादी से पहले का कहें या बाद का दक्षिणी भूटान के नेपाली भाषी लोंगों से भारतीयों का गहरा आत्मीय रिश्ता है. भारतीय फौजों में हमारे इतने लोग थे कि जब राजा ने देश निकाला किया तो उसमें सैकडों वीर चक्रों को हमसे छीन लिया .ये वीर चक्र हमारे लोगों को भारतीय सेना में काम करते हुये दिये गये थे.इतना ही नहीं भारत की आजादी की लडाई में शामिल हुये तीन-चार भूटानी नागरिक तो बहुत बाद तक पटना के जेल में बंद रहें. जिस देश के साथ हम लोगों का इस तरह का रिश्ता रहा था वही देश आज हमें अपने देश जाने के लिए रास्ता नहीं दे रहा है.

भूटान-भारत के साथ मौजूदा और पूर्ववर्त्ती संबंधों के बीच आप लोग क्या फर्क देखते हैं.

1960 के बाद भूटान में जिस स्तर पर नागरिक सुविधायें लागू कि गयीं उसमें भारत का अहम योगदान हैं. भूटान को इससे पहले एट्टियों यानी जंगली लोगों का देश कहा जाता था. किन योजनाओं में कितना खर्च होगा के हिसाब से लेकर मलेरिया तक के ईलाज का भार भारत ही उठाता था. मौजू़दा दौर में भारत सरकार का झुकाव और पक्षधरता भूटानी नागरिकों के प्रति होने के बजाय राजा के प्रति है.
दक्षिण एशिया का सबसे ताकतवर और जनतांत्रिक देश होने के नाते न सिर्फ भूटान बल्कि इस क्षेत्र के हर देश की जनता बहुत उम्मीद से भारत की तरफ देखती हैं. भारत सरकार की मदद के बगैर न तो नेपाल में शांति प्रक्रिया को स्थिरता मिल सकती है और न भूटानी शरणार्थी सम्मानपूर्वक स्वदेश वापसी कर सकते हैं.

शिविरों में रहने वाले युवा आतंवादी गतिविधियों में संलिप्त है?

यह तथ्यजनक नहीं है. राजा प्रायोजित प्रचार है, जिसे हिन्दुस्तानी मीडिया हवा देता रहता है. जाहिर है कि राजा तथा उसकी मददगार शक्तियां नेपाल के कैम्पों में रह रहे डेढ लाख शरणार्थियों पर किसी बहाने तोहमत लगाती रहेंगी जिससे स्वदेश वापसी संभव न हो.

दक्षिणी भूटान के नेपाली भाषियों को भूटानी राजा ने देशनिकाला क्यों किया?

उसके दो मुख्य कारण थे. एक तो यह कि भारत के साथ दक्षिणी भूटान के नागरिकों की नजदीकी बढती जा रही थी. दूसरा यह कि भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को देखकर भूटानियों ने भी जनतांत्रिक हकों के लिए पहल करना शुरू किया. लेकिन राजा को यह मंजूर नहीं था. प्रतिक्रिया में उसने नेपाली भाषी लोगों की संस्कृति, भाषा तथा जीवन जीने के तरीके तक पर हमले शुरू कर दिये. राजशाही के जुल्म इस कदर बढे कि राज्य की तथाकथित संसद में बैठे सांसदों, अदालत के जजों तक को राज्य निकाला कर दिया गया.
फरवरी १९८५ में जब राजा ने हमारी नागरिकता को रद्द कर दिया तो हमें भरोसा था कि पडोसी देश भारत राजशाही की तानाशाही के खिलाफ ऐतराज करेगा. मगर यहां उल्टा हुआ. आज हम न भारत में हैं न भूटान में. हमें तीसरे देश की शरण लेनी पडी.
भारत, राजा के साथ अपने हित साध रहा है.कौन नहीं जानता कि भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मरीं तो राजा ने देश में जश्न मनाये.भारत की अखण्डता के लिये खतरा बन चुके उल्फा और बोडो उग्रवादियों की प्रमुख शरणस्थली तथा ट्रेनिंग कैम्प आज भी भूटान में है. हमारे ऊपर आतंकवादी गतिविधियों के संचालित करने का आरोप लगाने वाली भारतीय मिडिया को ये तथ्य क्यों नहीं दिखते. साथ ही भारतीय सरकार भूटान में भारत के लिए काम करने वाली स्थानीय खुफिया एजेंसियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं करती कि तैनात अधिकारी भारत के प्रति कितने ईमानदार हैं.

क्या यह सच है कि शिविर के युवाओं में भारत के खिलाफ नफरत बढ रही?

पिछले कुछ सालों में भारत के प्रति नफरत बढी है. १६-१७ वर्षों में हमने स्वदेश वापसी का सात-आठ बार शांतिपूर्वक प्रयास किया.मगर जाने में असफल रहे हैं.इन प्रयासों के खिलाफ भारतीय फौजें बार-बार रोडा बनकर खडी हुयी हैं.

भूटान से भारत की नजदीकी की वजहें?

भूटान की कुल साढे छह लाख की आबादी में भारतीयों की संख्या ६० हजार है. भूटानी बाजार और व्यापार पर भारतीयों का ही कब्जा है. इसके अलावा भारत सरकार को यह भी डर है कि लोकतंत्र कायम होते ही वह भूटान में अपने कठपुतली राजा का उपयोग नहीं कर सकेगा. मतलब यह कि एक तरफ जहां भारत सीधे आर्थिक लाभ के कारण स्थानीय राजनीति पर अपना दबदबा बनाये रखना चाहता है वहीं विस्तारवादी नीति के मद्देनजर कमजोर देशों में सामंती राजसत्ताओं को बनाये भी रखना चाहता है.

अमेरिका ने प्रस्ताव दिया है वह शरणार्थियों को कनाडा और दूसरे देशों में पुनर्वासित करेगा ?

मीडिया में आयी खबरों के आधार पर हमने नेपाली सरकार से बातचीत की तो पता चला कि अमेरिका की तरफ से इस बारे में कोई आधिकारिक सूचना नहीं हैं.हालांकि सांस्कृतिक, भौगोलिक विविधता की वजह से ऐसा होना संभव नही है. हुआ भी तो इसे स्थायी हल नही कहा जा सकता. अगर भूटानी शरणार्थियों का अमेरिका शुभचिंतक है तो भारत पर दबाव डाले कि वह शरणार्थियों को स्वदेश वापसी का रास्ता दे. क्योंकि भारत के रास्ते ही हम अपने देश भूटान जा सकते हैं.दूसरा यह कि भारत के लिये भी यह बेहतर नहीं कि हम अमेरिका में जाकर बसें.कैम्पों में भारत के खिलाफ बढ रही नफरत का कभी भी कोई साम्राज्यवादी देश इस्तेमाल कर सकता है.

अमेरिकी प्रस्ताव पर शरणार्थियों का क्या विचार है?

मिला-जुला असर है.शगूफा उठा कि अमेरिका जाने वाले फार्म पर दस्तख्त करने से १७,००० लाख नेपाली रुपये मिलेंगे. इस लालच में तमाम शरणार्थियों ने फार्म भरे. लेकिन एपिछले दिनों जब स्वदेश वापसी की पहल हुयी तो सभी भारत की सीमाओं की तरफ जुटने लगे. किसी ने नहीं कहा कि वह अमेरिका जायेगा. इसलिये कहा जा सकता है कि शरणार्थी अब इस कदर त्रस्त हो चुके हैं कि वह कहीं भी सम्मान और बराबरी की जिन्दगी चाहते हैं चाहे वह कनाडा हो या भूटान.

भारत के जिस राज्य की सीमा से शरणीर्थियों को भूटान जाना है वह पश्चिम बंगाल है. इस मसले पर वहां की वामपंथी सरकार का रूख कैसा रहा है?

लंबे समय बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्ध्देव भट्टाचार्य ने २००७ के जून माह में आश्वासन दिया कि भूटानियों की समस्या का हल किया जायेगा. हालांकि इस वादे से हफ्ते भर पहले बंगाल पुलिस, असम पुलिस और सीआरपीएफ ने हमारे लोगों को गोलियों से भून डाला था. आखिरकार हम करें तो क्या करें. यह तो बडे देश के सामने छोटे देश की पीडा है.ऐसे में सच का एक बडा हिस्सा है कि समाधान भी उत्पीडक ही करेगा.

नेपाल का रुख?

सरकार चाहे किसी की रही हो नेपाल ने हमेशा आश्रय दिया है. हां यह कहना अतिरेक नहीं होगा कि माओवादी प्रमुख प्रचण्ड इस मामले को गंम्भीरता से लेते हैं. कुछ महीने पहले नेपाल दौरे पर आये अमेरिकी राष्ट्रपति जीमी कार्टर से भी प्रचण्ड ने समस्या के समाधान पर बातचीत किया था.


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