Last Update On : 02 11 2018 10:03:01 AM

हाईकोर्ट ने दिया आदेश इस मामले की जांच कर सीबीआई सौंपे 6 महीने में रिपोर्ट, पहले योगी सरकार कर चुकी थी शिक्षक घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपने से इंकार…

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में 68500 सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा में हुई धांधली और इसकी जांच में बरती जा रही अनियमितताओं से नाराज इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने इन नियुक्तियों की पूरी चयन प्रक्रिया की जांच सीबीआई को सौंप दी। गुरुवार 1 नवंबर को इस मामले की सुनवायी करते हुए हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सरकार के रवैये पर भी सख्त टिप्पणी की।

हाईकोर्ट ने जांच के लिए नियुक्त किए गए अधिकारियों और सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार अपने अधिकारियों की खाल बचाने में लगी है। जिन तीन सदस्यों का चयन जांच समिति के लिए किया गया, उसके दो अधिकारी उसी बेसिक शिक्षा विभाग से हैं, जिस पर सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा 2018 में भ्रष्टाचार करने के आरोप हैं। यहीं नहीं हाईकोर्ट ने जांच समिति द्वारा अब तक अपनायी गई जांच प्रक्रिया और रवैये पर नाराजगी व्यक्त की।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने प्रस्तुत किए गए साक्ष्य और अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भर्ती की जांच सीबीआई को सौंपने की सिफारिश कर दी। इस मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी। हाईकोर्ट ने सीबीआई को छह माह में जांच पूरी कर रिपोर्ट देने को कहा है।

इस परीक्षा में हुई धांधलियों, बार कोड के बावजूद उत्तर पुस्तिकाएं बदलने और सही जवाबों पर भी शून्य अंक देने के खिलाफ हाईकोर्ट में 41 याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनकी हाईकोर्ट में एक साथ सुनवाई की गई। प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में इन नियुक्तियों की जांच सीबीआई को सौंपने से इंकार कर दिया था। इस पर कोर्ट ने कहा कि वह मजबूरी में जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दे रही है।

न्यायालय ने अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाएं बदलने के मामले में पहले महाधिवक्ता से पूछा था कि राज्य सरकार इस मामले की सीबीआई जांच कराने को तैयार है अथवा नहीं, जिस पर महाधिवक्ता द्वारा सरकार की ओर से सीबीआई जांच से इंकार कर दिया गया था।

इस मामले में सोनिका देवी व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि परीक्षा में सामने आई गड़बड़ियां नागरिकों को संविधान द्वारा मिले मूल अधिकारों का हनन करती हैं। इन मामलों को न्यायिक जांच के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा है कि बड़ी संख्या में ऐसे अभ्यर्थियों के मामले सामने आए हैं, जिन्हें 65 अंक दिए गए। उनके तीन—चार प्रश्न सही होते हुए भी गलत मानकर उन्हें शून्य अंक दिए गए।

सोनिका देवी के मामले में जान—बूझकर उनका चयन नहीं किया गया। यह तथ्य अभ्यर्थी के अभिव्यक्ति, जीवन और समानता के मूल अधिकारों का हनन हैं।सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि कुछ उत्तर पुस्तिकाओं के पहले पृष्ठ पर अंकित बार कोड अंदर के पृष्ठों से मेल नहीं खा रहे हैं। न्यायालय ने तब ही इस पर हैरानी जताते हुए कहा था कि उत्तर पुस्तिकाएं बदल दी गई हैं।

जांच समिति की कार्रवाई से संतुष्ट नही था हाईकोर्ट
चीनी उद्योग व गन्ना विकास विभाग के प्रमुख सचिव संजय भुसरेड्डी की अध्यक्षता में बनी तीन सदस्यीय जांच समिति की जांच के आधार पर इस मामले में कार्रवाई की गई थी। लेकिन अदालत इस कार्रवाई से संतुष्ट नही थी। दरअसल इससे पहले हाईकोर्ट ने 68,500 सहायक अध्यापक भर्ती मामले में सभी अभ्यर्थियों के कापियों के पुनर्मूल्यांकन अवसर प्रदान किया था। साथ ही सचिव परीक्षा नियामक प्राधिकारी को दो सप्ताह में प्राप्त होने वाले प्रार्थनापत्रों का पुनर्मूल्यांकन कराने का निर्देश दिये थे। अक्टूबर के पहले सप्ताह में 68,500 शिक्षक भर्ती की लिखित परीक्षा में हुई गड़बड़ी पर बेसिक शिक्षा विभाग ने बड़ी कार्रवाई की थी।

जांच रिपोर्ट के आधार विभागीय अपर मुख्य सचिव डा. प्रभात कुमार ने परीक्षा नियामक प्राधिकारी के रजिस्ट्रार जीवेन्द्र सिंह ऐरी और उप रजिस्ट्रार प्रेम चन्द्र कुशवाहा को निलंबित कर दिया था। साथ ही राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के सात अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की बात कही थी। जाँच समिति ने अपनी छानबीन में पाया कि 343 कॉपियों के मूल्यांकन में गड़बड़ी हुई थी। जिन कॉपियों में गड़बड़ी थी उनमें से 51 अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में सफल थे, लेकिन उन्हें फेल कर दिया गया था। अब वे उत्तीर्ण की श्रेणी में हैं।

वहीं 53 ऐसे सफल अभ्यर्थी इस परीक्षा में फेल पाए गए हैं जिन्हें शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल चुकी थी। जांच समिति ने पाया कि कॉपियों को चेक करने में भारी लापरवाही बरती गई। जांच समिति के रवैये पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जिन अभ्यर्थियों को स्क्रूटनी में रखा गया था, उनके भी चयन पर अब तक निर्णय नहीं लिया गया।

जांच समिति के सदस्यों पर ऐतराज
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच कमेटी में दो सदस्य बेसिक शिक्षा विभाग के ही हैं। न्यायसंगत अपेक्षा के सिद्धांत के तहत दोनों को जांच समिति में नहीं रखा जाना चाहिए था, क्योंकि उसी विभाग के अधिकारी उक्त जांच के दायरे में हैं। यही नहीं वर्तमान चयन प्रक्रिया पर भारी भ्रष्टाचार व गैरकानूनी चयन के आरोप हैं। एकल न्यायाधीश ने कहा कि सरकार से स्वतंत्र व साफ—सुथरे चयन की उम्मीद की जाती है लेकिन कुटिल इरादे से राजनीतिक उद्देश्य पूरा करने के लिए प्राथमिक विद्यालयों में बड़े पैमाने पर गैर कानूनी चयन किए गए, जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकारी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

अधिकारियों ने किया भ्रष्टाचार
हाईकोर्ट ने कहा कि इस चयन प्रक्रिया के बावत कोर्ट प्रथम दृष्टया मानती है कि परीक्षा कराने वाले अधिकारियों ने भ्रष्टाचार के द्वारा अपने उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाने के लिए अपने पद व अधिकारों को दुरुपयोग किया। जिन अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षा में कम मार्क्स मिले उन्हें अधिक मार्क्स दे दिए गए। वहीं कुछ अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाएं फाड़ दी गईं और पन्ने बदल दिए गए ताकि उन्हें फेल घोषित किया जा सके।

बार कोडिंग में गड़बड़ी करने वाले को नहीं दिया दंड
सरकार द्वारा बार कोडिंग की जिम्मेदारी जिस एजेंसी को दी गई थी। उसने स्वयं स्वीकार किया है कि 12 अभ्यर्थियों की कॉपियां बदली गईं। बावजूद इसके उसके खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही नहीं की गई। न्यायालय ने कहा कि इन परिस्थितियों में मजबूर होकर हम सीबीआई को इस पूरी चयन प्रक्रिया की जांच करने का आदेश देते हैं। न्यायालय ने सीबीआई को दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी कानून सम्मत कार्रवाई करने को कहा है। इसके साथ ही जांच की प्रगति जानने के लिए मामले को 26 नवम्बर को सूचीबद्ध करने का भी आदेश दिया है।

गौरतलब है कि योगी सरकार की पहली सबसे बड़ी भर्ती परीक्षा सहायक अध्यापकों की थी, लेकिन यह पूरी तरह अधिकारियों के भ्रष्टाचार और कदाचार का शिकार बनकर रह गयी। सहायक अध्यापक भर्ती की खामियों की लिस्ट बहुत लंबी है।