भगत सिंह के 88वें शहादत दिवस पर उनके विचारों को याद कर रहे हैं भगत सिंह के सपनों को पिछले 40 वर्षों से साकार करने में लगे राजनीतिक कार्यकर्ता अर्जुन प्रसाद सिंह

‘अंग्रेजों की जड़ें हिल चुकी हैं। वे 15 सालों में चले जायेंगे, समझौता हो जायेगा, पर इससे जनता को कोई लाभ नहीं होगा। काफी साल अफरा-तफरी में बीतेंगे। उसके बाद लोगों को मेरी याद आयेगी।’

शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने यह बात 1931 में फांसी के फंदे पर लटकाये जाने के कुछ ही दिन पहले कही थी। उनका अनुमान सही निकला और करीब 16 साल बाद 1947 में एक समझौता हो गया। इस समझौते के तहत अंग्रजों को भारत छोड़ना पड़ा और देश की सत्ता की बागडोर ‘गोरे हाथों से भूरे हाथों में’ आ गई। इसके बाद सचमुच ‘अफरा-तफरी में’ काफी साल (88साल) बीत चुके हैं। अब देश की शोषित-पीड़ित जनता एवं उनके सच्चे राजनीतिक प्रतिनिधियों को भगत सिंह की याद ज्यादा सताने लगी है।

इस साल देश की तमाम देशभक्त, जनवादी व क्रांतिकारी ताकतें भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव की शहादत की 88वीं वर्षगांठ मना रही हैं। खासकर, क्रांतिकारी शक्तियां इस अवसर पर केवल अनुष्ठानिक कार्यक्रम आयोजित नहीं कर रही हैं, जैसा कि पंजाब सरकार हर साल 23 मार्च को उक्त अमर शहीदों के हुसैनीवाला स्थित समाधि-स्थल पर करती है। वे भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों को देश की शोषित-पीड़ित व मेहनतकश जनता के बीच ले जाने के लिए विभिन्न प्रकार के जन कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं।

भगत सिंह ने कहा था- ‘वे (अंग्रेज) सोचते हैं कि मेरे शरीर को नष्ट कर, इस देश में सुरक्षित रह जायेंगे। यह उनकी गलतफहमी है। वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं। वे मेरे शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर सकते हैं, लेकिन वे मेरी आंकाक्षाओं को दबा नहीं सकते।’

सचमुच हमारे देश में न अंग्रेज सुरक्षित रह सके और न ही भगत सिंह के विचारों व आकांक्षाओं को दबाया जा सका। इतिहास साक्षी है कि ‘मरा हुआ भगत सिंह जीवित भगत सिंह से ज्यादा खतरनाक’ साबित हुआ और उनके क्रांतिकारी विचारों से नौजवान पीढ़ी ‘मदहोश’ और ‘आजादी व क्रांति के लिए पागल’ होती रही। वह लाठियां-गोलियां खाती रही और शहीदों की कतारें सजाती रही।

1947 के सत्ता हस्तांतरण या आकारिक आजादी के बाद जनता के व्यापक हिस्से को लगा था कि देश व उनके जीवन की बदहाली रुकेगी और समृद्धि व खुशहाली का एक नया दौर शुरू होगा। लेकिन मात्र कुछ सालों में ही यह अहसास हो गया कि जो दिल्ली की गद्दी पर बैठे हैं वे उनके प्रतिनिधि नहीं हैं। उन्होंने देश व जनता के विकास की जो आर्थिक नीतियां अपनाईं और उनका जो नतीजा सामने आया, उससे साफ पता चल गया कि वे बड़े जमींदारों व बड़े पूंजीपतियों के साथ-साथ साम्राज्यवाद के भी हितैषी हैं।

उनका मुख्य उद्देश्य मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई को लूटना है और शोषक-शासक वर्गों को मालामाल करना है। भगत सिंह देश के विकास की इस प्रक्रिया को अच्छी तरह समझते थे। तभी तो उन्होंने कहा था कि ‘कांग्रेस जिस तरह आंदोलन चला रही है उस तरह से उसका अंत अनिवार्यतः किसी न किसी समझौते से ही होगा।’ उन्होंने यह भी कहा था कि ‘यदि लाॅर्ड रीडिंग की जगह पुरुषोत्तम दास’ और ‘लार्ड इरविन की जगह तेज बहादुर सप्रू’ आ जायें तो इससे जनता को कोई फर्क नहीं पड़ेगा और उनका शोषण-दमन जारी रहेगा।

उन्होंने भारत की जनता को आगाह किया था कि हमारे देश के नेता, जो शासन पर बैठेंगे वे ‘विदेशी पूंजी को अधिकाधिक प्रवेश’ देंगे और ‘पूंजीपतियों व निम्न-पूंजीपतियों को अपनी तरफ’ मिलायेंगे। ‘उन्होंने यह भी कहा कि’ निकट भविष्य में बहुत शीघ्र हम उस वर्ग को और उसके नेताओं को विदेशी शासकों के साथ जाते देखेंगे, तब उनमें शेर और लोमड़ी का रिश्ता न रह जायेगा।’

सचमुच ‘आजाद भारत’ के विकास की गति इसी प्रकार रही है। 1947 में 248 विदेशी कम्पनियां हमारे देश में कार्यरत थीं, जिनकी संख्या आज बढ़कर करीब 12 हजार हो गई है। आज विदेशी पूंजी एवं भारतीय दलाल पूंजी का गठजोड़ अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में दिखाई पड़ रहा है। खासकर 1990 के बाद उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की जो प्रक्रिया चली उससे हमारे देश के शासक वर्गों का असली साम्राज्यवाद परस्त चेहरा पूरी तरह बेनकाब हो गया। आज औद्योगिक क्षेत्र के साथ-साथ कृषि व सेवा क्षेत्रों में भी विदेशी पूंजी का ‘अधिकाधिक प्रवेश’ हो रहा है।

करोड़ों रुपए का लाभ अर्जित करने वाली ‘नवरत्नों’ समेत दर्जनों सार्वजनिक कम्पनियों का विनिवेशीकरण किया जा रहा है और उनके शेयरों को मिट्टी के मोल बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बेचा जा रहा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, सिंचाई, व्यापार, सड़क, रेल, हवाई व जहाजरानी परिवहन, बैंकिंग, बीमा व दूरसंचार आदि सेवाओं का धड़ल्ले से निजीकरण किया जा रहा है और इनमें से अधिकांश क्षेत्रों में 100 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी लगाने की छूट दे दी गई है।

कृषि, जो आज भी देश की कुल आबादी के कम से कम 65 प्रतिशत लोगों की जीविका का मुख्य साधन बना हुआ है, को मोनसेंटो व कारगिल जैसी विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का चारागाह बना दिया गया है। ‘निगमीकृत खेती’, बड़ी-बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं एवं ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों के नाम पर बड़े पैमाने पर किसानों व आदिवासियों की जमीन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सुपूर्द की जा रही है। पहले ये कम्पनियां खेती में खाद, बीज, कीटनाशक दवाओं व अन्य कृषि उपकरणों की आपूर्ति करती थीं।

अब कृषि उत्पादों के खरीद व व्यापार में भी वे अहम् भूमिका निभा रही हैं। आज कृषि समेत हमारी पूरी अर्थव्यवस्था विश्व बैंक, आई.एम.एफ. व विश्व व्यापार संगठन जैसे साम्राज्यवादी संस्थाओं के चंगुल में बुरी तरह फंस गई है। नतीजतन, लाखों कल-कारखाने बंद हो रहे हैं, दसियों लाख मजदूरों-कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है और विगत 25 सालों में करीब 5 लाख किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा है।

जब किसान-मजदूर व जनता के अन्य तबके अपने हक-अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष छेड़ते हैं, तो उन पर लाठियां व गोलियां बरसाई जाती हैं और उनकी एकता को खंडित करने के लिए धार्मिक उन्माद, जातिवाद व क्षेत्रवाद को भड़काया जाता है। इन स्थितियों में अगर भगत सिंह आज जिंदा होते तो मोदी शासन को लुटेरों की सरकार कहते।

जाहिर है कि साम्राज्यवादी वैश्वीकरण व लूट-खसोट के इस भयानक दौर में भगत सिंह के विचार काफी प्रासंगिक हो गये हैं। खासकर, साम्राज्यवाद, धार्मिक-अंधविश्वास व साम्प्रदायिकता, ‘जातीय उत्पीड़न, आतंकवाद, भारतीय शासकवर्गों के चरित्र एवं जनता की मुक्ति के लिए, एक क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण व क्रांति की जरूरत क्रांतिकारी संघर्ष के तौर-तरीके और क्रांतिकारी वर्गों की भूमिका के बारे में उनके विचारों को जानना और उन्हें आत्मसात करना आज क्रान्तिकारी समूहों का फौरी दायित्व हो गया है। आईये, अब हम भगत सिंह के कुछ मूलभूत विचारों पर गौर करें।

धार्मिक अंधविश्वास व साम्प्रदायिकता के बारे में
धार्मिक अंधविश्वास व कट्टरपंथ ने राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में एक बड़े बाधक की भूमिका अदा की है। अंग्रेजों ने धार्मिक उन्माद फैलाकर साम्प्रदायिक दंगे करवाये और जनता की एकता को खंडित किया। 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का व्यापक प्रचार शुरू किया। खासकर, 1924 में कोहट में भीषण व अमानवीय हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए तो सभी प्रगतिशील व क्रांतिकारी ताकतों को इस विषय पर सोचने को मजबूर होना पड़ा।

भगत सिंह ने मई, 1928 में ‘धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम’ शीर्षक एक लेख लिखा जो ‘किरती’ में छपा। इसके बाद उन्होंने जून, 1928 में ‘साम्प्रदायिक दंगे और उसका इलाज’ शीर्षक लेख लिखा। अंत में गदर पार्टी के भाई रणधीर सिंह (जो भगत सिंह के साथ लाहौर जेल में सजा काट रहे थे) के सवालों के जबाब में भगत सिंह ने 5-6 अक्तूबर, 1930 को ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ शीर्षक काफी महत्वपूर्ण लेख लिखा। इन लेखों में उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न किया।

उन्होंने कहा कि ‘ईश्वर पर विश्वास रहस्यवाद का परिणाम है और रहस्यवाद मानसिक अवसाद की सवाभाविक उपज है।’ उन्होंने धार्मिक गुरुओं से प्रश्न किया कि ‘सर्वशक्तिमान होकर भी आपका भगवान अन्याय, अत्याचार, भूख, गरीबी, शोषण, असमानता, दासता, महामारी, हिंसा और युद्ध का अंत क्यों नहीं करता?’ उन्होंने मार्क्स की विख्यात उक्ति को कई बार दुहराया- ‘धर्म जनता के लिए एक अफीम है।’

उन्होंने धार्मिक गुरुओं व राजनीतिज्ञों पर आरोप लगाया कि वे अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिक दंगे करवाते हैं। उन्होंने अखबारों पर भी आरोप लगाया कि वे ‘उत्तेजनापूर्ण लेख’ छापकर साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। उन्होंने इसके इलाज के बतौर ‘धर्म को राजनीति से अलग रखने’ पर जोर दिया और कहा कि ‘यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते हैं, धर्मों में हम चाहें अलग-अलग ही रहें।’

उनका दृढ मत था कि ‘धर्म जब राजनीति के साथ घुल-मिल जाता है, तो वह एक घातक विष बन जाता है जो राष्ट्र के जीवित अंगों को धीरे-धीरे नष्ट करता रहता है, भाई को भाई से लड़ता है, जनता के हौसले पस्त करता है, उसकी दृष्टि को धुंधला बनाता है, असली दुश्मन की पहचान कर पाना मुश्किल कर देता है, जनता की जुझारू मनःस्थिति को कमजोर करता है और इस तरह राष्ट्र को साम्राज्यवादी साजिशों की आक्रमणकारी यातनाओं का लाचार शिकार बना देता है।’ आज जब हमारे देश में राजसत्ता की देख-रेख में बाबरी मस्जिद ढाही जाती है और गुजरात जैसे वीभत्स जनसंहार रचाये जाते हैं, तब भगत सिंह की इस उक्ति की प्रासंगिकता सुस्पष्ट हो जाती है।

जातीय उत्पीड़न के बारे में
जातीय उत्पीड़न के सम्बंध में भगत सिंह ने अपना विचार मुख्य तौर पर ‘अछूत-समस्या’ शीर्षक अपने लेख में व्यक्त किया है। यह लेख जून, 1928 में ‘किरती’’ में प्रकाशित हुआ था। उस वक्त अनुसूचित जातियों को ‘अछूत’ कहा जाता था और उन्हें कुओं से पानी नहीं निकालने दिया जाता था। मन्दिरों में भी उनका प्रवेश वर्जित था और उनके साथ छुआछूत का व्यवहार किया जाता था।

उच्च जातियों, खासकर सनातनी पंडितों द्वारा किए गए इस प्रकार के अमानवीय व विभेदी व्यवहार का उन्होंने कड़ा विरोध किया। उन्होंने बम्बई काॅन्सिल के एक सदस्य नूर मुहम्मद के एक वक्तव्य का हवाला देते हुए प्रश्न किया- ‘जब तुम एक इंसान को पीने के लिए पानी देने से भी इंकार करते हो, जब तुम उन्हें स्कूल में भी पढ़ने नहीं देते- तो तुम्हें क्या अधिकार है कि अपने लिए अधिक अधिकार की मांग करो।’

छुआछूत के व्यवहार पर भी आपत्ति जाहिर करते हुए कहा- ‘कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है, हमारी रसोई में निःसंग फिरता है। लेकिन एक इंसान का हमसे स्पर्श हो जाये तो बस धर्म भ्रष्ट हो जाता है।’ जब हिन्दू व मुस्लिम राजनेता अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए ‘अछूतों’ को धर्म के आधार पर बांटने लगे, और फिर उन्हें मुस्लिम या इसाई बनाकर अपना धार्मिक आधार बढ़ाने लगे, तो उन्हें काफी नाराजगी हुई।

उन्होंने अछूत समुदाय के लोगों का सीधा आह्वान किया- ‘संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इंकार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो, दूसरे के मुंह की ओर मत ताको।’ लेकिन साथ ही साथ, उन्होंने नौकरशाही से सावधान करते हुए कहा- ‘नौकरशाही के झांसे में मत पड़ना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूंजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है।’

इसी सिलसिले में उन्होंने उनकी अपनी ताकत का भी अहसास दिलाया। उन्होंने कहा- ‘तुम असली सर्वहारा हो। तुम ही देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोते हुए शेरों उठो, और बगावत खड़ी कर दो।’ भगत सिंह का यह आह्वान काफी मूल्यवान है। खासकर ऐसे समय में, जब आज भी क्रांतिकारी ताकतें दलितों पर होने वाले जातीय व व्यवस्था जनित उत्पीड़न के खिलाफ कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हैं।

आतंकवाद के बारे में
भगत सिंह एवं उनके साथियों पर कई राजनीतिक कोनों से आतंकवादी होने का आरोप लगाया जाता रहा है। यहां तक कि महात्मा गांधी भी ब्रिटिश सरकार की तरह उन्हें एक आतंकवादी मानते थे। इसीलिए उन्होंने 5 मार्च, 1931 को सम्पन्न हुए ‘गांधी-इरविन समझौता’ में भगत सिंह व उनके साथियों की फांसी की सजा रद्द करने पर जोर नहीं दिया। उल्टे, उन्होंने वायसराय इरविन को सलाह दी कि उन्हें कांग्रेस के कराची अधिवेशन से पहले फांसी की सजा दे दी जाये और अंग्रेजों ने कराची अधिवेशन के शुरू होने के एक दिन पहले उन्हें फांसी पर लटका दिया।

अगले दिन, यानी 24 मार्च, 1931 को कराची रवाना होने से पहले ‘अहिंसा के पुजारी’ महात्मा गांधी ने प्रेस में बयान दिया- ‘मेरी व्यक्तिगत राय में भगत सिंह व उनके साथियों की फांसी से हमारी शक्ति बढ़ गई है।’ इसी बयान में उन्होंने नौजवानों को आगाह किया कि ‘वे उनके पथ का अवलम्बन न करें।’ लेकिन देश की जनता व खासकर नौजवानों ने पूरे देश में फांसी की सजा का तीखा प्रतिवाद किया और कराची में नौजवानों ने गांधी को काला झंडा दिखाया और उनके खिलाफ आक्रोशपूर्ण नारे लगाये।

भगत सिंह ने असेम्बली हाॅल में फेंके गए पर्चे एवं सेंशन व हाईकोर्ट में असेम्बली बम कांड में दिये गए बयानों, और ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक लेखों में अपने उपर लगाये गए इस आरोप (आतंकवादी होने) का माकूल जबाब दिया है। भगवतीचरण बोहरा ने गांधी के लेख ‘बम की पूजा’ (जिसमें असेम्बली बम कांड की तीखी आलोचना की गई थी) के जवाब में ‘बम का दर्शन’ शीर्षक एक सारगर्मित लेख लिखा, जिसमें गांधी के तमाम तर्कों का बखिया उधेड़ा गया। इस लेख को अन्तिम रूप भगत सिंह ने प्रदान किया।

भगत सिंह ने अपने बयानों व लेखों में साफ शब्दों में स्वीकार किया कि शुरुआती दौर में वे एक रोमांटिक क्रांतिकारी थे और उनपर रूसी नेता बाकुनिन का प्रभाव था। लेकिन बाद में वे एक सच्चे क्रातिकारी बन गए।

उन्होंने फरवरी, 1931 में लिखे गए ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ शीर्षक लेख में कहा- ‘आतंकवाद हमारे समाज में क्रांतिकारी चिंतन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है, या एक पछतावा। इसी तरह यह अपनी असफलता का स्वीकार भी है। शुरू-शुरू में इसका कुछ लाभ था। इसने राजनीति में आमूल बदलाव लाया। नवयुवक बुद्धिजीवियों की सोच को चमकाया, आत्मत्याग की भावना को ज्वलंत रूप दिया और दुनिया व अपने दुश्मनों के सामने अपने आंदोलन की सच्चाई एवं शक्ति को जाहिर करने का अवसर मिला। लेकिन वह स्वयं में पर्याप्त नहीं है। सभी देशों में इसका (आतंकवाद) इतिहास असफलता का इतिहास है- फ्रांस, रूस, जर्मनी स्पेन में हर जगह इसकी यही कहानी है।’

इस उक्ति से जाहिर है कि भगत सिंह आतंकवादी नहीं बल्कि क्रांतिकारी थे, जिनका कुछ निश्चित विचार, निश्चित आदर्श और क्रान्ति का एक लम्बा कार्यक्रम था।


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