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पढ़िए रवींद्र गोयल का विश्लेषण कि मुनाफे की भूख किस दरिंदगी तक ले जा सकती है व्यवस्था को, जिसमें गर्भवती महिला को भी नहीं बख्शा जाता…

यह तो सभी मानते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्थाओं में मुनाफा ही खुदा है, मुनाफा ही भाई और रिश्तेदार है, वही न्याय है, वही इंसानियत है। लेकिन यह मुनाफे का लालच और भूख किस हद जा सकती है, इसका ताज़ा उदाहरण है european court of justice द्वारा इस 22 फ़रवरी को दिया गया एक फैसला है।

यूरोपियन कोर्ट ने इस फैसले में फ़रमाया है कि एक गर्भवती कर्मचारी की बर्खास्तगी तब तक स्वीकार्य है, जब तक कि उसकी बर्खास्तगी के लिए बताया गया कारण उसकी गर्भावस्था नहीं है।

यह फैसला यूरोपियन कोर्ट ने स्पेनिश अदालत की एक याचिका के जवाब में दिया। 2013 में एक स्पैनिश कंपनी ने बड़े पैमाने छंटनी के भाग के रूप गर्भवती महिलाओं को भी बर्खास्त किया था. उसकी कड़ी आलोचना होने पर स्पेनिश अदालत ने यूरोपियन कोर्ट से स्पष्टीकरण के लिए गुहार लगायी।

इस स्पष्टीकरण के साथ कि एक गर्भवती कर्मचारी की बर्खास्तगी तब तक स्वीकार्य है, जब तक कि उसकी बर्खास्तगी के लिए बताया गया कारण उसकी गर्भावस्था नहीं है, यूरोपियन कोर्ट ने गर्भवती महिलाओं को काम से निकालने की मालिकों की मुहिम को कानूनी मान्यता दे दी है। तय है कि अब गर्भवती महिलाओं को काम से निकालने की गति में तेज़ी आएगी, क्योंकि निकालने के लिए सिर्फ यही तो तर्क देना है कि उसको निकालने का कारण उसका गर्भवती होना नहीं है।

हम जानते हैं कि इसके इतर कितने तर्क गढ़े जा सकते हैं- उसका काम अच्छा नहीं है, वो धीरे काम कर रही है, उसकी धीमे काम की गति और काम करने वालों पर गलत प्रभाव डाल रही है आदि आदि।

स्वाभाविक तौर पर इस फतवे का यूरोप में प्रगतिशील तत्व विरोध कर रहे हैं। ग्रीस की कम्युनिस्ट पार्टी (KKE) ने सही ही कहा है ‘यह फैसला कोर्ट और यूरोपीय संघ संस्थानों द्वारा एक ऐसा फैसला है जो सामाजिक बर्बरताओं की सभी सीमाओं को लांघ रहा है।’

हिंदुस्तान में भी हमें इस मजदूर विरोधी निर्णय की निंदा करनी चाहिये और विरोध करना चाहिए। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय कोर्ट भी किसी ऐसे फैसले पर मुहर लगा दे।