मौलाना एजाज अरशद कासमी और सुप्रीम कोर्ट की वकील फरहा फैज के बीच हुई हाथापाई के बाद गिरफ्तार कर लिए गए थे मौलाना

अगर याद है… और उसपर अमल से कासिर हो तो… खुद को क्यों खलीफ-ए-रसूल कहते हो… शर्म नहीं आती

वकील फरहा फैज के साथ हुई मारपीट पर पत्रकार अब्दुल वाहिद आज़ाद की तल्ख टिप्पणी

ज़ी हिंदुस्तान के 26 मिनट के दौरानिए के पूरे वीडियो को बगौर देखा, सुना… कई जगहों पर दोबारा तिबारा देखा… जो कैफीयत तारी हुई, उसके हकीकी बयान के लिए हमारे पास अल्फाज नहीं हैं।

देखते हुए आंखें भर आईं, जिस्म लर्ज़ा उठा, दिल रो बैठा… मैं सोचने लगा कि मेरी परवरिश जिस इस्लामी घराने में हुई, जहां बड़े उलेमा की अज़मत के किस्से, उनके सब्र-व-तहमुल-व-ज़ब्त की कहानियां, उनके खौफ-ए-खुदा में डूबे रहने की बातें… उनकी खुश अखलाकी, हुस्न सुलूक और उनके सच्चे-पक्के कौल-व-उसूल और बेहतरीन किरदार की महफिलें सजती थीं… उनमें ज्यादातर तादाद देवबंदी उलेमा की होती थी।

आज बहुत ही रंज-व-अलम के साथ कहना पड़ रहा है… ये देवबंदी आलिम नंगे निकले.. इनकी अज़मत के किस्से झूठे साबित हुए… न कौल के पक्के हैं न किरदार से अच्छे… न जब्त है न सब्र है… ये बदमिजाज, बदतमीज़ हैं, बेहूदा हैं, ईमान बेचने वाले हैं. कुरान बेचने वाले हैं.. जुब्बा-व-दस्तार में इस्लाम के सौदागर हैं।

अफसोस ये है कि हमसे ये कहा जा रहा है कि जब कलम उठाएं तो तवाज़ुन रखें… आप क्या कहना चाहते हैं कि मैं इस्लाम की उस रिवायत से रौ गर्दानी कर जाऊं, जो मैंने अपनी परवरिश में सिखा, अपने मुतआले में पाया… मैं ये देखूं कि क्या उस खातून ने भी ग़लती की है? इस सवाल पर जाऊं कि पहला थप्पड़ किसने मारा?

ऐ मौलवियों! क्या तुम्हें इस्लाम ने यही सिखाया… क्या तुम्हें पैगमबर मोहम्मद के ऊपर कूड़े डालने वाली औरत का किस्सा याद नहीं? अगर याद है… और उसपर अमल से कासिर हो तो… खुद को क्यों खलीफ-ए-रसूल कहते हो… शर्म नहीं आती?

याद रखो मौलवियों! अब तुम बेशर्म कौम हो चले, हर जगह साजिश ढ़ूंढने निकल पड़ते हो, कहते हो मामला फिक्स था, इतने गिर गए हो तो तुम्हें अपने अज़मत-ए-रफ्ता का भी खयाल नहीं रहा…. अब तुम्हारी तालीम में बेहूदगी है, सच कबूल करना तुम्हारा वतीरा नहीं रहा है… झूठ, फरेब और मक्कारी तुम्हारे जीने का सलीका हो चला है… तुम गुफ्तार के ग़ाज़ी बनकर चाहते हो दुनिया में इस्लाम का हकीकी पैगाम आम हो जाए… अब ये तुम्हारा शेवा है.. तुम मुगालते में हो… और मेरे जैसा मुसलमान तुम जैसे मौलवी पर शर्मिंदा है… अब तुम फतवा देते रहो बेशर्मो!

#जारी

(अब्दुल वाहिद आज़ाद एबीपी डिजिटल में पत्रकार हैं और फेसबुक पर तल्ख और तथ्यगत टिप्पणियां लिखने के लिए चर्चित हैं।)