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अपने छोटे शिक्षामंत्री पर बोका बिल्कुल सटीक बैठता है। बंगाली भाषा में बोका बहुत ही लोकप्रिय शब्द है जो बकलोलों के लिए उपयोग किया जाता है, लेकिन भोजपुरी के प्रसिद्ध गायक बलिया के बालेश्वर यादव ने ‘बोकवा’ का उपयोग बकरे के लिए किया था…

दिल्ली, जनज्वार। डार्विन के सिद्धांत को गलत ठहरा कर देश भर में हीरो बने अपने छोटे शिक्षा मंत्री सत्यपाल सिंह फिर से एक बार अपने महती बयानों के लिए सुर्खियों में हैं।

वैसे तो शिक्षा को लेकर केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह जिस तरह के वक्तव्य देते हैं, उसके मद्देनजर लगता है कि इनका डिपार्टमेंट ओझा—सोखा मंत्रालय होना चाहिए था। खैर! मोदी जी की कोई मजबूरी रही होगी जो उन्होंने ऐसे बोका को शिक्षामंत्री का पद दिया है।

पर इस मजबूरी के बारे में उनसे पूछे कौन? क्योंकि एक मजबूरी पर पूछने का नहीं है। फिर तो ये भी पूछना पड़ेगा कि कौन सी काबिलियत उन्होंने स्मृति ईरानी में देखी थी जो बोका शिक्षामंत्री का पूरा मंत्रालय ही हाईस्कूल पास स्मृति के हिस्से कर दिया था।

सत्यपाल सिंह ने सरकार के उच्चतम सलाहकार निकाय की बैठक में कहा कि भारत में पहले से ऐसे मंत्र हैं जो न्यूटन द्वारा खोजे जाने से पहले ‘गति के कानून’ को संहिताबद्ध थे, इसलिए यह आवश्यक है कि परंपरागत ज्ञान हमारे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। यानी मंत्री महोदय ने यह ज्ञान न सिर्फ बांटा, बल्कि यह भी कहा कि इसे स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल कर देना चाहिए।

उससे पहले ये पूर्व आईपीएस अधिकारी और वर्तमान छोटा शिक्षा मंत्री महोदय इंसानों के विकास से जुड़े डार्विन के सिद्धांत को गलत ठहरा चुके हैं और इस पर भी कह चुके हैं कि स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में इसमें बदलाव करने की जरूरत है।

अति आत्मविश्वास से लबरेज सत्यपाल सिंह ने कहा कि डार्विन का जैविक विकासवाद का सिद्धांत पूरी तरह गलत है, क्योंकि हमारे पूर्वजों सहित किसी ने भी लिखित या मौखिक रूप से यह नहीं कहा है कि उन्होंने लंगूर को इंसान में बदलते देखा। यानी डार्विन गलत हैं और हमारे पुराणों में वर्णित फल खाकर बच्चा पैदा करने या फिर मंत्रों की ताकत से किसी का जन्म हो सकता है। हो सकता है अगली बार मंत्री महोदय बयान दे दें कि बच्चा पैदा करने के लिए स्त्री—पुरुष की जरूरत नहीं, बल्कि मंत्रोच्चारण से ही बच्चे पैदा हो जाएंगे।