इस चित्र के तीन बेबस और लगभग बेज़ुबान भारतीय लड़कियों की विशिष्टता ही अमृता शेर-गिल के चित्रों की ‘भारतीयता’ है, जिसकी कल्पना उनके पहले किसी भारतीय चित्रकार ने नहीं की थी…

अशोक भौमिक, वरिष्ठ चित्रकार और लेखक

बीसवीं सदी की भारतीय चित्रकला की धारा, जिसका विकास बंगाल में 1900 के बाद से आरम्भ हुआ था; देवी-देवताओं की लीला कथाओं के चित्रण से भरा हुआ था। बंगाल के कलाकारों ने अजंता से लेकर मुग़ल कला के अनुसरण में ही ‘भारतीयता’ की खोज करने की कोशिश की और इस लिए विषय के स्तर पर उनकी कला अपने पूर्ववर्ती कलाओं से भिन्न नहीं थीं।

ऐसे समय में भारतीय चित्रकला में अमृता शेर-गिल का आगमन एक बड़ी घटना थी, जिसने युगों से चली आ रही भारतीय चित्रकला के मुहावरे को ही बदल दिया। एक उदार और उन्मुक्त कला-दृष्टि से जहाँ एक ओर उन्होंने पाश्चात्य के कला से परहेज नहीं किया, वहीं उन्होंने अपने चित्रों में देवी-देवताओं, राजा-रानियों के स्थान पर परिचय और सन्दर्भविहीन आम लोगों को बार बार चित्रित किया।

उनके चित्रों की भारतीयता, उनके चित्रों में आये भारतीय आमजनों के चेहरों, वेशभूषा और स्थानीयता में है। उनके चित्रों में आये लोगों के नामों से या उनसे जुड़े किसी सन्दर्भ से हम परिचित नहीं हैं, पर बावजूद इसके वे सभी हमारे जाने-पहचाने से लगते हैं और निश्चय ही भारतीय लगते हैं।

‘तीन लड़कियाँ’ शीर्षक के इस चित्र में हम तीन युवतियों को एक साथ बैठे पाते हैं, पर एक साथ होते हुए भी अमृता शेर-गिल ने उन्हें तीन स्वतंत्र लड़कियों के रूप में दिखाया है। उनके वस्त्रों के रंग तो भिन्न हैं ही, साथ ही उनके चेहरों के रंग भी भिन्न हैं। इन तीनों में कोई भी गोरी तो नहीं है, वे एक समान साँवली भी नहीं हैं।

चित्र में तीनों लड़कियों के चेहरों पर कोई स्पष्ट भाव नहीं दिखता और तीनों ही अपने-आप में इस हद तक खोये से लगते हैं कि हमें लगता है मानो उनके पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं है।

इन सबके साथ साथ वे तीनों कुछ असहज सी मुद्रा में चित्रकार से मुँह फेरे बैठी सी दिखती हैं। अमृता शेर-गिल के चित्रों में विदेशी चित्रकला के प्रभावों को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं, पर वास्तव में इस चित्र के तीन बेबस और लगभग बेज़ुबान भारतीय लड़कियों की विशिष्टता ही अमृता शेर-गिल के चित्रों की ‘भारतीयता’ है, जिसकी कल्पना उनके पहले किसी भारतीय चित्रकार ने नहीं की थी।

अमृता शेर-गिल (1913-1941) का जन्म हंगेरी की राजधानी बुडापेस्ट में हुआ था। बचपन से ही उनकी चित्रकला में रुचि थी। 1921 में भारत आने के बाद उन्होंने शिमला में चित्रकला में आरंभिक शिक्षा लेनी शुरू की, पर जल्द ही बहुत कम उम्र में वह इटली के फ्लोरेंस में चित्रकला में शिक्षा लेने गयीं। बाद में (1930 से 1932 ) उन्होंने एकोल नेशनल दे बूज़ आर्ट्स में प्रोफेसर लूसिएन साइमन की देख रेख में कला अध्ययन किया। 1934 में अमृता शेर-गिल ने फ्रांस से भारत लौटकर अमृतसर में कुछ समय बिताया था। ‘तीन लड़कियाँ’ चित्र उसी दौरान बनाया हुआ है।

अमृता शेर-गिल की कला पर यूरोप के कई कलाकारों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था, पर उन्होंने शिमला, अमृतसर, गोरखपुर, केरल के साथ साथ अनेक भारतीय शहरों और उनके लोगों के रहन-सहन और संस्कृति को जानने समझने की कोशिश की, इसलिए उनके चित्रों में बार—बार भोले—भाले आम भारतीय लोगों का विविधवर्णी चित्रण पाते हैं। उन्होंने विशेष रूप से भारतीय महिलाओं को अपने चित्र का विषय बनाया।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अमृता शेर—गिल लाहौर में रहीं और वहीं 1941 में केवल सत्ताईस वर्ष की कम उम्र में उनका निधन हुआ।


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