Last Update On : 11 01 2018 08:31:00 PM

डॉक्टरों की अमानवीयता की भेंट चढ़े मां—बच्ची, परिजनों से कहा पहले जमा कराओ बिल फिर ले जाओ लाश, तब तक परिजन भर चुके थे 12 लाख का बिल

फरीदाबाद, हरियाणा। नामी प्राइवेट अस्पतालों की घोर लापरवाहियां और मरीजों के परिजनों से भारी—भरकम बिल वसूलने वाले नामी निजी अस्पतालों की लिस्ट में एक और नाम जुड़ गया है। यहां मरीज की लाश देने से पहले परिजनों को अस्पताल ने 18 लाख का बिल थमा दिया। इन सिलसिलों को देख लगता है कि शायद अब लोगों का प्राइवेट अस्पतालों से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। यहां बात किसी गलीछाप प्राइवेट अस्पताल की नहीं बल्कि देश के नामी—गिरामी हॉस्पिटलों की हो रही है।

नामी—गिरामी मैक्स हॉस्पिटल और फोर्टिज सुपरस्पेशिलिटी हॉस्पिटल की अमानवीयता की कड़ी में आज फिर एक ऐसा मामला सामने आया है कि सोचकर रूह कांप उठती है अस्पतालों में इलाज के नाम पर डॉक्टर नियुक्त हैं या मौत देते यमराज।

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राजधानी दिल्ली से सटे फरीदाबाद के एक निजी अस्पताल एशियन हॉस्पिटल में बुखार से पीड़ित गर्भवती श्वेता को परिजनों ने एशियन हॉस्पिटल में पिछले महीने 13 दिसंबर को भर्ती कराया था। मगर मामूली बुखार के कारण एडमिट हुई श्वेता का डॉक्टरों ने ऐसा इलाज किया कि उसके गर्भ में पल रहे 7 महीने के भ्रूण की मौत हो गई और उसके बाद डॉक्टरी लापरवाही के चलते श्वेता चल बसी। हद तो तब हो गई जब मां—बच्चे की मौत के बाद अस्पताल ने परिजनों को 18 लाख का बिल थमाते हुए कहा कि इसे तत्काल चुकता करो।

इलाज के दौरान डॉक्टरों की लापरवाही के चलते न तो श्वेता को बचाया जा सका और न ही उसके पेट में पल रहे 7 महीने के शिशु को।  मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक फरीदाबाद के नचौली गांव के रहने वाले सीताराम ने अपनी 20 वर्षीय गर्भवती बेटी को बुखार के बाद एशियन हॉस्पिटल में एडमिट कराया था।

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जब श्वेता को अस्पताल में भर्ती कराया गया उसके तीसरे—चौथे दिन ही इलाज के दौरान डॉक्टरों ने कहा कि श्वेता के गर्भ में पल रहे शिशु की मौत हो गई है, इसलिए श्वेता की जान बचाने के लिए आॅपरेशन करना पड़ेगा। आॅपरेशन के चार्ज के बतौर हॉस्पिटल ने साढ़े तीन लाख रुपए का एमाउंट जमा करने को कहा गया। श्वेता के परिजनों ने उसकी जान बचाने के लिए ये राशि जमा भी की, मगर तुरंत परिजन इतनी बड़ी राशि जमा नहीं करा पाए।

श्वेता के पिता सीताराम कहते हैं, एशियन हॉस्पिटल ने तब तक श्वेता का आॅपरेशन नहीं किया, जब तक कि पूरा पैसा जमा नहीं करा दिया गया। मैं लाखों मिन्नतें करता रहा कि उसका आॅपरेशन कर दीजिए मैं पाई-पाई जमा कर दूंगा, मगर हॉस्पिटल प्रशासन ने एक न सुनी।

जब तक श्वेता के परिजन साढ़े तीन लाख रुपए जमा करा पाते, तब तक मृत बच्चा पेट में होने के चलते इंफेक्शन फैल गया। इलाज के दौरान मर गई श्वेता के पीड़ित परिजन कहते हैं कि श्वेता की हालत जब लगातार बिगड़ने लगी तो उसे आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया। आईसीयू में भी लगातार पैसे जमा कराए जाते रहे और हमारी बच्ची की मौत के बाद भी लाश ले जाने से पहले हमें कुल 18 लाख का बिल थमा दिया गया।

यह मामला सीधे—सीधे अस्पताल की लापरवाही से जुड़ा है। जहां मरीज की जान से ज्यादा तरजीह पैसे को दी गई और पैसे जमा न होने पर इंफैक्शन बढ़ जाने दिया। श्वेता के परिजन अब मांग कर रहे हैं कि इस अस्पताल के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।

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सुरसा के मुंह की तरह मानवता को धंधे में तब्दील कर चुके इन यमराजों की अमानवीयता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब श्वेता के घरवालों ने और पैसे जमा करने से मना कर दिया तो उसके थोड़ी देर बाद श्वेता को मृत घोषित कर दिया गया और लाश ले जाने से पहले थमा दिया गया 18 लाख का बिल।

हालांकि अब एशियन हॉस्पिटल मामले से अपना पल्ला छुड़ाने की कोशिश कर रहा है कि हम लाख कोशिश के बाद भी श्वेता को नहीं बचा पाए, क्योंकि श्वेता की आंत में छेद था।