Last Update On : 17 08 2018 10:50:14 PM

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एसपीजी सुरक्षा में रहे पूर्व आईपीएस और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ वीएन राय कर रहे हैं उनके साथ के अनुभव को साझा…

जनज्वार। अटल बिहारी वाजपेयी (1924-2018) को युग पुरुष घोषित करने की होड़ के बीच उनका एक सरसरी सम्यक मूल्यांकन भी संभव है। उनके 1998-2004 के प्रधानमंत्री के अंतिम एक वर्ष को छोड़कर मुझे उनकी सुरक्षा एजेंसी, एसपीजी में काम करने का मौका मिला। सुरक्षाकर्मियों के लिए वाजपेयी स्वयं मृदुभाषी और सहज रहे; नखरे दिखाने को दामाद रंजन भट्टाचार्य और कभी झल्लाने के लिए मंत्री प्रमोद महाजन होते थे। सुरक्षा घेरे के लिए मोदी को दूर रखने के इशारे थे।

प्रधानमंत्री वाजपेयी के कार्यकाल में एनरान और यूटीआई घोटाले; परमाणु बम विस्फोट का रणनीतिक आत्मघात; ग्रैहम स्टेंस जैसा हिंदुत्व धर्म परिवर्तन केन्द्रित कांड; कश्मीर पहल, लाहौर बस यात्रा, कारगिल युद्ध, मुशर्रफ आगरा शिखर वार्ता जैसे जमीनी पाकिस्तान सन्देश; संसद पर अपमानजनक हमला; सफल कारोबारी क्लिंटन शिखर वार्ता; टोल हाई वे पालिसी; आडवाणी से तनाव; गुजरात संहार का धक्का और राज धर्म सलाह की गूंज के साथ शाइनिंग इंडिया से साक्षात्कार और शासन पर दामाद की जकड़ से भी इत्तेफाक हुआ।

आडवाणी ने प्रधानमंत्री अमले में अपना ‘गुर्गा’ घुसा रखा था और दामाद के साथ एक न्यूनतम राशि उद्धृत किये जाने का चलन था। बेहद हास्यास्पद होता जब राजीव गाँधी की नकल में वाजपेयी के जन्मदिन-नववर्ष धमाल आयोजित किये जाते। केरल के कुमारकम में तो दिन गुजरने मुश्किल हो गए। वैसे उन्हें स्वयं ख़ुशी मनाली के घर पर पहाड़ों की धूप में वक्त बिता कर ही होती। वहां रची गयी सतही कविताई पर उस दौर के हर भाजपायी भक्त और बौद्धिक चाटुकार को नाज करते देखा जा सकता था।

जैसा भोजन प्रेम उनका था, शायद वे ताऊ देवी लाल को भी पिछाड़ देते। विदेशों में औपचारिक रात्रिभोज की शाम कभी-कभी आप उन्हें तीन बार डिनर करते पा सकते थे। और फिर आधी रात में पाचक दवाएं लेते भी। इसलिए वजन पर नियंत्रण नहीं था और इसलिए दोनों घुटने बदलवाने पड़े। चलने में दर्द इस कदर बढ़ गया था कि न्यूयॉर्क में पहली बार व्हीलचेयर दी गयी तो ख़ुशी-ख़ुशी बैठ गए और इस अनुभव के चलते काफी समय गोल्फ कार्ट के सहारे गुजरा।

प्रधानमंत्री के रूप में भी उनकी हाजिर जवाबी और श्रोताओं को बांधने की कला के तो सभी कायल होंगे। राष्ट्रपति क्लिंटन के साथ व्हाइट हाउस में समां बंध गया जब वाजपेयी ने कोलंबस वाली टिप्पणी की- कहीं गलती से कोलंबस ने बजाय अमेरिका के भारत को खोज निकाला होता तो आज हम भारतीय कहाँ होते!

लेकिन अटल के व्यक्तित्व में गहन प्रेम का पक्ष प्रायः चर्चा में नहीं लाया गया। हालाँकि, वे इस मामले में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की तरह ‘लाउड’ कभी नहीं हुये। मीडिया की चुप्पी ने भी इस ब्रम्हचारी की ‘नैतिक’ कवायद में पूरा साथ दिया।

2004 में वाजपेयी की हार को गुजरात संहार और यूटीआई घोटाले ने संभव किया था। कहीं तब गुजरात की मोदी सरकार बर्खास्त कर दी गयी होती, और यूटीआई घोटाले में तो शाइनिंग इंडिया के कट्टर समर्थक मध्य वर्ग का ही पैसा डूबा था! अटल भी इस कर्म फल को टाल नहीं सके- मोदी को बचाने में संघ ने आडवाणी को आगे कर दिया और यूटीआई में दामाद रंजन का नाम उछलने पर स्वयं वाजपेयी ने इस्तीफे की धमकी दे डाली।

अटल के लिए मोदी राजनीतिक उद्दंड रहे, लेकिन चुनौती नहीं। मोदी के लिए अटल हमेशा राजनीतिक चुनौती का आदर्श बने रहेंगे। यह भी स्पष्ट है, न वक्तृता और विश्वसनीयता में और न स्वीकार्यता में मोदी को अटल के समकक्ष रखा जायेगा। इसलिए, अटल को श्रद्धांजलि के अवसर पर, 2019 के नतीजों के सूत्र भी 2004 चुनाव के सन्दर्भ में तलाशा जा सकता है।

जो ‘पप्पू’ तब मुकाबले में था, वही आज भी है। जब भारतीय वोटर अटल को हरा सकता है, मोदी को क्यों नहीं।