Last Update On : 25 05 2018 08:47:00 AM

सप्ताह की कविता में आज हिंदी के ख्यात कवि अरुण कमल की कविताएं

अरुण कमल की कविताओं की धजा जमीनी विस्तार और प्रकृति से संबद्ध कविताओं में ज्‍यादा खुलती-खिलती है। ‘आतप’ और ‘आश्विन’ उनकी ऐसी ही कविताएँ हैं – ‘ऐसा क्या है इस हवा में /जो मेरी मिट्टी को भुरभुरा बना रहा है /धूप इतनी नम कि हवा उसे सोखती जाती है पोर-पोर से /सिंघाड़ों में उतरता है धरती का दूध और मखानों के फूटते लावे हैं /हवा में धान का एक-एक दाना भरता है /और हरसिंगार खोलता है, रात के भेद चारों तरफ /रुएक धूम है एक प्यारा शोरगुल रोओं भरा। (आश्विन)’

जमीनी विस्तार का यह सौरभी स्पर्श हिंदी कविता में कम लोगों के पास है। अरुण कमल की कविताओं में विविधता काफी है और ब्रेख्त से लेकर शमशेर, मुक्तिबोध और आलोक धन्वा तक के ध्वनि-प्रभावोंवाली कविताएँ भी वहाँ मिल जाएँगी एक साथ। कुछ पंक्तियाँ देखें- ‘जब भी हमारा जिक्र हो कहा जाए /हम उस समय जिये जब सबसे आसान था चंद्रमा पर घर /और सबसे मोहाल थी रोटी…(अपनी पीढ़ी के लिए)’ या ‘क्या है इस छोटी सी बात में /आज मुझे व्याकुल कर रहा है (दोस्त)’ या ‘वह क्यों रुक गया था उस रात वहाँ उस मोड़ पर /सुफेद मकान के आगे जो बत्ती की रोशनी में /और भी सुफेद लग रहा था…(फरमाइश)’

अरुण कमल की ‘अनुभव’ शीर्षक कविता तो शमशेर की कापी-सी लगती है। उनके तीसरे कविता संग्रह ‘नए इलाके में’ का आत्मविगलित, रूदन कविता के अकादमिक गुण ग्राहकों को पसंद आया था, जो बाद की कविताओं में काफी कम है – ‘मेरे पास कुछ भी तो जमा नहीं/ कि ब्याज के भरोसे बैठा रहूँ (डोर)’ निर्ब्याज, खाली हाथ होने का यह जो दुख है कवि का वह पुराना है। पहले संग्रह ‘अपनी केवल धार’ की कविता निस्पृह का भी यही भाव है। यूँ पहले संग्रह के बाद कवि ने काफी कुछ हासिल किया है। तमाम पुरस्कारों से लेकर विदेश यात्राओं तक, एक नौकरी भी ठोकी-ठेठायी है ही।

फिर यह दुख कैसा है – ‘वे काँसा भी नहीं पायेंगे सोना तो दूर /मैं हीरे का तमगा छाती में खोभ /खून टपकाता फिरूंगा महंगे कालीनों पर…। /सब कुछ पाने के बाद भी तुम इंतजार करोगे /रात के अंधेरे लंबे सुनसान गलियारे के पार किवाड़ के पीछे /उस साँवली स्त्री का…’  क्या कवि को पता नहीं कि जब तक वह अपने सीने में हीरे का तमगा खोभे फिरेगा, साँवली दुष्प्राप्य रहेगी। फिर रो-रोकर इस तरह हलकान होने के मायने – ‘…पता नहीं आज भी आयेगी या नहीं और तड़केगा रोम-रोम /बलतोड़ की पीड़ा से तसर वस्त्र के भीतर। /मेरे दिल में इतनी मेखें हैं कि तन सकते हैं प्यार के हजार शामियाने /पर हाय जिस किसी काग को कासिद बनाया /वही कंकाल पर ठहर गया। (मेख)’

प्यार के शामियाने के लिए मेखें ही काफी नहीं हैं, कवि, थोड़ा खम भी पैदा करो। यूं अरुण कमल के आकलनों में एकूरेशी का अभाव अक्सर खटकता है। जैसे, वे लिखते हैं – कोटि-कोटि गाडि़यों के नीचे… दुनिया की किसी भी व्यस्त सड़क पर एक जगह कोटि-कोटि (करोड़ों-करोड़) गाडि़याँ खड़ी नहीं हो सकतीं। यह कीर्तनियों की शब्दावली है, जिसका वे भाववाचक प्रयोग करते हैं, संख्यावाचक नहीं। ऐसे कई जोर-जबर से किये गए प्रयोग अच्छी बनती कविताओं का भी कबाड़ा कर देते हैं। जैसे सड़कें भरी रहतीं कंठ तक या सिगरेट की ठूंठ आदि।

जब कथ्य अस्पष्ट हों, तो इस तरह के प्रयोग अच्छे लगते हैं, जैसे ‘छाती खोले समुद्र’ या ‘हाथी सी चीन की दीवार’ आदि। यूँ भाषा की ये गड़बडि़याँ भाव के अभाव के चलते नहीं, बल्कि जल्दबाजी के चलते होती हैं। अरुण कमल के यहाँ मुक्ति का संघर्ष तो नहीं है, हाँ मुक्ति का स्वप्न जिलाये रखने का जतन है वहाँ, मुक्ति न भी मिले तो बना रहे, मुक्ति का स्वप्न। ‘आत्मकथा’ कविता में कवि लिखता है- ‘न लेखक गृह का एकांत न अनुदान वृत्ति का अभ्यास/ जितनी देर में सिझेगा भात बस उतना ही अवकाश।’ इस दुखड़े के क्या मानी, जब ‘लू शुन की कोठरी’ कविता में कवि लिखता ही है – इतनी छोटी कोठरी में कैसे अंटा इतना बड़ा देश। आइए पढते हैं अरुण कमल की कुछ कविताएं – कुमार मुकुल

मातृभूमि
आज इस शाम जब मैं भींजता खड़ा हूँ आसमान और धरती
के बीच
तब अचानक मुझे लगता है यही तो तुम हो मेरी माँ मेरी
मातृभूमि
धान के पौधे ने तुम्हें इतना ढँक दिया है कि मुझे रास्ता तक
नहीं सूझता
और मैं मेले में खोये बच्चे सा दौड़ता हूँ तुम्हारी ओर
जैसे वह समुद्र जो दौड़ता आ रहा है छाती के सारे बटन खोले
हहाता
और उठती है शंखध्वनि कंदराओं के अन्धकार को हिलोड़ती
ये बकरियाँ जो पहली बूंद गिरते ही भागीं और छिप गयी पेड़
की ओट में
सिन्धु घटी का वह सांढ़ चौड़े पट्टे वाला जो भींगे जा रहा है
पूरी सड़क छेंके
ये मजदूर जो सोख रहे हैं बारिश मिट्टी के ढेले की तरह
घर के आँगन में वो नवोढ़ा भींगती नाचती
और काले पंखों के नीचे कौवों के सफ़ेद रोएँ तक भींगते
और इलाएची के छोटे-छोटे दाने इतने प्यार से गुत्थमगुत्था
ये सब तुम्हीं तो हो
कई दिनों से भूखा प्यासा तुम्हें ही तो ढूंढ़ रहा था चारों तरफ
आज जब भीख में मुट्ठी भर अनाज भी दुर्लभ है
तब चारों तरफ क्यों इतनी भाप फैल रही गर्म रोटी की
लगता है मेरी माँ आ रही नक्काशीदार रूमाल से ढँकी
तश्तरी में
खुबानियाँ अखरोट मखाने और काजू भरे
लगता है मेरी माँ आ रही है हाथ में गर्म दूध का गिलास लिए
ये सारे बच्चे तुम्हारी रसोई की चौखट पर कब से खड़े हैं माँ
धरती का रंग हरा होता हिया फिर सुनहला फिर धूसर
छप्परों से इतना धुंआ उठता है और गिर जाता है
पर वहीँ के वहीँ हैं घर से निकाले ये बच्चे तुम्हारी देहरी पर
सिर टेक सो रहे माँ
ये बच्चे कालाहाँडी के
ये आंध्र के किसानों के बच्चे ये पलामू के पट्टन नरौदा पटिया
के
ये यतीम ये अनाथ ये बंधुआ
इनके माथे पर हाथ फेर दो माँ
इनके भींगे केश संवार दो अपने श्यामल हाथों से-
तुम किसकी माँ हो मेरी मातृभूमि ?
मेरे थके माथे पर हाथ फेरती तुम्हीं तो हो मुझे प्यार से तकती
और मैं भींज रहा हूँ
नाच रही धरती नाचता आसमान मेरी कील पर नाचता नाचता
मैं खड़ा रहा भींजता बीचोंबीच।

यह वो समय
यह वो समय है जब
कट चुकी है फसल
और नया बोने का दिन नहीं

खेत पड़े हैं उघारे
अन्यमनस्क है मिट्टी सहसा धूप में पड़ कर –
हर थोड़ी दूर पर मेंड़ों की छाँह-
चमकती हैं कटी खूँटियाँ
दूर पर चरती भेड़ों के रेवड़
और मूसकोल
और चींटियों के बिल के बाहर मिट्टी चूर

यह वो समय है जब
शेष हो चुका है पुराना
और नया आने को शेष है।

अनुभव
और तुम इतना आहिस्ते मुझे बांधती हो
जैसे तुम कोई इस्तरी हो और मैं कोई भीगी सलवटों भरी कमीज़
तुम आहिस्ते-आहिस्ते मुझे दबाती सहला रही हो
और भाप उठ रही है और सलवटें सुलट-खुल रही हैं
इतने मरोड़ों की झुर्रियाँ-
तुम मुझ में कितनी पुकारें उठा रही हो
कितनी बेशियाँ डाल रही हो मेरे जल में
मैं जल चुका काग़ज़ जिस पर दौड़ती जा रही आख़िरी लाल चिंगारी
मैं तुम्हारे जाल को भर रहा हूँ मैं पानी।