Last Update On : 08 05 2018 11:07:00 AM

डीयू, जामिया, बीएचयू, एएमयू आदि विश्वविद्यालयों जैसी शिक्षा के स्टैंडर्ड वाले निजी कॉलजों ने कर दी है बीए की फीस 25 से 30 लाख, जबकि देश की प्रति व्यक्ति औसत कमाई है सवा लाख सालाना से भी कम

उच्च शिक्षा से अगर सरकार हाथ खींचती रही तो आने वाले चंद वर्षों में सिर्फ पूंजीपतियाें और पैसे वालों के ही बच्चे ले पाएंगे बीए-एमए जैसी मामूली डिग्रियां भी, बता रहे हैं प्रोफेसर रवीन्द्र गोयल

साल का वो समय फिर आ गया है जब हर वो अभिभावक जिसके बेटा या बेटी ने कक्षा 12 की परीक्षा दी है, वह आगे की पढाई की आकांक्षा और पढाई की संभावनाओं के बीच तालमेल बैठाने की कवायद में उलझा है।

माना जाता है कि स्तरीय उच्च शिक्षा न केवल गरीबी से मुक्ति का महत्वपूर्ण मार्ग है, बल्कि एक अर्थपूर्ण जीवन की कुंजी भी। उच्च शिक्षा के सामाजिक फायदों को यदि छोड़ भी दिया जाये आज की सेवा आधारित अर्थव्यवस्था में सार्थक भूमिका अदा करने के लिए कम से कम बीए की डिग्री तक पढाई हर युवक-युवती के लिए अनिवार्य है।

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1948 के स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा आयोग की रिर्पोट में, आयोग अध्यक्ष डॉ। एस।राधाकृष्णन ने शिक्षा के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए लिखा था कि “भावी पीढ़ी की उच्चतर शिक्षा को हमें अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में रखना चाहिए।” साठ के दशक में डा। डी एस कोठारी की अध्यक्षता में गठित अगले शिक्षा आयोग ने भी इस आकांक्षा को ठोस रूप देने के लिए अपनी रिपोर्ट में सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की अपील की।

उच्च शिक्षा में आकांक्षा और संभावनाओं का अर्थशास्त्र
लेकिन दुनिया में सबसे तेज़ विकास करने वाले देश की नई सदी में शिक्षा सुविधा के मामले में हालत बहुत दयनीय है। पिछले कुछ सालों में शिक्षा पर किया जाने वाला खर्च सरकारी खर्च (केंद्र और राज्य सरकार दोनों का) राष्ट्रीय आय की तुलना में लगातार घटता जा रहा है। आज शिक्षा पर खर्च किया जा रहा सरकारी खर्च साथ के दशक में कोठारी आयोग द्वारा सुझाये गए 6 प्रतिशत का आधा भी नहीं है, उससे काफी कम है।

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सरकार, शिक्षा में कम खर्च का ठीकरा अपने पास साधनों की कमी के सर पर फोड़ती रही है। कोई इनसे पूछे की बैंकों को उद्योगपतियों की क़र्ज़ माफ़ी के लिए दिए जाने वाले 2 लाख करोड़ रुपया कहाँ से आ गए या धन्नासेठों पर और अधिक कर लगाने से उनको कौन रोकता है। अमेरिका में भी पूंजीपतियों के लिए अधिकतक आयकर की सीमा 40% से ऊपर है, फिर हम क्यों 30 % से ऊपर नहीं जा सकते।

शिक्षा पर घटते सरकारी खर्च और अर्थव्यवस्था में आये परिवर्तनों ने इस देश की युवा पीढ़ी के सामने विकट परिस्थति खड़ी कर दी है। हमारा देश पिछले 70 बरसों में मूलतः कृषि आधारित अर्थव्यस्था से सेवा आधारित व्यवस्था में बदल गया है। शिक्षित व्यक्तियों की जरूरत और भी ज्यादा बढ़ गयी है। आज हम ज्ञान आधारित भविष्य की अर्थव्यस्था में अपनी युवा जनसंख्या के आधार पर लाभान्वित होने के सपने पाल रहे हैं।

आज भी 80 फीसदी युवा नहीं पहुंच पाते कॉलेज-विश्वविद्यालय
लेकिन हमारे यहाँ उच्च शिक्षा की सुविधाएँ बहुत सीमित हैं। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि कॉलेज जाने वाले युवाओं (18 -23 वर्ष) में से केवल 20 या 21 प्रतिशत युवा ही कॉलेजों में पढ़ रहे हैं। यानी के देश के 18-23 वर्ष की आयु के बीच के नौजवानों का तकरीबन 80% हिस्सा उस शिक्षा से महरूम हैं, जो उनके लिए अनिवार्य है।

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नतीजा, अपने आपको आज के ज़माने के हिसाब से सक्षम बनाने के लिए नौजवान इधर-उधर धक्के खा रहे हैं और शिक्षा लुटेरों का धंधा चल निकला है। उनके धंधे को चमकाने के लिए अब तो सरकारी शिक्षण संस्थाओं में भी फीस बढ़ोतरी का अभियान बड़े जोर शोर से जारी है।

सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ। आज जब समाज में स्तरीय और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की जरूरत सबसे ज्यादा है और शोध दर्शाता है कि यह कार्य बहुजन के हित में राज्य पोषित शिक्षा द्वारा ही किया जा सकता है, सरकार ने शिक्षा से अपना हाथ खींचकर यह काम भिन्न भिन्न रंग की दुकानों पर छोड़ दिया है।

खोल दी दुकानें और बेची जाने लगी शिक्षा
शिक्षा के काम को भिन्न भिन्न रंग की दुकानों पर छोड़ देने का काम क्रमशः संपन्न किया गया है। स्कूली शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने का काम तो 60 के दशक में ही शुरू हो गया था और अब सारतः पूरा हो चुका है। अब उच्च शिक्षा की बारी है। यह नीति इस देश नौजवानों को किस अंधी गली में धकेलेगी इस पर चर्चा से पहले यह जान लेना अच्छा होगा की आज विश्व में कहाँ शिक्षा सबसे अच्छी स्थिति में है और इसका मुख्य कारण क्या है।

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आज दुनिया में सबसे अच्छी शिक्षा व्यवस्था क्यूबा की मानी जाती है जो शिक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का 13 प्रतिशत खर्च करता है। 1959 में, क्रांति के उपरांत,उसने सबसे पहले कदम के रूप में प्राइवेट स्कूल और कॉलेजों का राष्ट्रीयकरण किया। अब शिक्षा वहां पूर्णतया राज्य पोषित है और पूर्णतया मुफ्त है।

शिक्षा पर उचित जोर देने के चलते क्यूबा ने दुनिया को दिखा दिया है कि उच्च स्तर का ज्ञान और प्रशिक्षण सभी नागरिकों को उपलब्ध कराना संभव है। विश्व बैंक (जिसे किन्ही भी अर्थों में वामपंथी नहीं कहा जा सकता) ने भी अपनी 2014 की एक रिपोर्ट में स्वीकारा की आज क्यूबा में लैटिन अमेरिका और कैरेबियन के देशों में सबसे अच्छी शिक्षा प्रणाली है और मजबूत शैक्षिक प्रतिभा, उच्च मजदूरी और उच्च पेशेवर स्वायत्तता उसकी विशेषताएँ हैं।

घटता जा रहा है साल दर साल शिक्षा का बजट
भारत में उच्च शिक्षा के लिए सरकारी बजट में कटौती, शिक्षा की सुविधाओं के विस्तार में रोक लगा कर शिक्षा को नए पुराने धनी लोगों को सौंपने की मुहिम की शुरुआत अस्सी के दशक के शुरू से नव उदारवादी उभार के साथ मानी जा सकती है। 1986 में, (राजीव गांधी के शासन काल में), शिक्षा मंत्रालय का नाम बदल कर मानव संसाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया।

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यही वो समय भी है जब विश्व बैंक उपलब्ध साधनों के बेहतर उपयोग के नाम पर सरकार के शिक्षा क्षेत्र से हटने की वकालत कर रहा था और कह रहा था कि “छात्र अपनी फीस खुद निकालें, सरकारें शिक्षा ऋण शुरू करें”। और अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलाव के चलते यहाँ के पूंजीपतियों को भी शिक्षा के क्षेत्र में अकूत मुनाफे की सम्भावनाएं दिखाई देने लगी।

वर्ष 2002 में बिड़ला अम्बानी टास्क फोर्स की शिक्षा सम्बन्धी रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि शिक्षा क्षेत्र बेहद फायदेमंद बाजार है और उस पर निजी पूंजीपतियों का कब्जा होना चाहिए। रिपोर्ट का मानना है कि “जो उपभोग करे वो खर्च उठाये। उच्च शिक्षा में पूरे खर्च की वसूली की ओर क्रमशः बढ़ा जाय और स्ववित्तपोषी निजी क्षेत्र को आगे आने को लिए प्रोत्साहित किया जाय।”

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साल और शिक्षा पर खर्च
2012 – 13 – 3।1%
2014- 15 – 2।8%
2015- 16 – 2।4%
2016- 17 – 2।6%
स्रोत- आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18

इस नीति का नतीजा क्या है इसके लिए दिल्ली का उदाहरण लिया जा सकता है। पिछले साल दिल्ली क्षेत्र में करीब 270000 छात्रों ने कक्षा 12वीं की परीक्षा दी थी, इस साल लगभग तीन लाख छात्रां ने परीक्षा दी। पिछले साल दो लाख से ऊपर छात्र पास हुए, लेकिन दिल्ली में सरकारी संस्थाओं में मुश्किल से एक लाख छात्रों के दाखिले की सुविधाएँ हैं और दिल्ली के सरकारी कॉलेजों पर देश के अन्य हिस्सों से आने वाले छात्रों का बोझ भी होता ही है।

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यह एक दुखद सच्चाई है की दिल्ली की आबादी में बेतहाशा वृद्धि के बावजूद पिछले कई सालों से दिल्ली में कोई सरकारी कॉलेज नहीं खुला है। AAP की सरकार ने वादा किया था कि वो 20 कॉलेज खोलेंगे और दिन में चल रहे कॉलेजों में संध्या की कक्षाएं खोलेंगे। पर कोई नतीजा नहीं। ऐसे में पढ़ने के इच्छुक ज्यादातर विद्यार्थियों के सामने दो ही रास्ते हैं या तो रंग-बिरंगी निजी दुकानों में दाखिला ले या पत्राचार कार्यक्रम के जरिये अपनी पढाई जारी रखे।

यहां बीए की डिग्री के लिए चाहिए 25 से 30 लाख रुपए
पाठकों को यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए की आज दिल्ली के विभिन्न पत्राचार कार्यक्रमों में लाखों छात्र पढ़ रहे हैं और निजी विश्वविद्यालयों के विज्ञापनों की न केवल अख़बारों में बल्कि दिल्ली की दीवारों पर भरमार है। आने वाले समय में यह और बढ़ेगी।पत्राचार कार्यक्रमों से पढाई कोई आसान नहीं हैं क्योंकि वह स्वयं अध्ययन का ही एक रूप है। और यह भी सच है की पत्राचार कार्यक्रमों से पढ़े छात्रों की क्षमताओं को रोजगार के बाजार में कम कर के आँका जाता है। लेकिन इन निजी दुकानों पर पढ़ना सबके लिए संभव नहीं है। कारण यहाँ फीस इतनी ज्यादा है कि बिना क़र्ज़ के कोई उनमे पढ़ ही नहीं सकता। दिल्ली की सरहद में ही खुले दो निजी विश्वविद्यालयों की फीस इस प्रकार है।

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अशोका यूनिवर्सिटी सोनीपत में बीए की प्रति वर्ष फीस निम्न है :
ट्यूशन                7, 00, 000
निवास शुल्क         1,25,000
सुरक्षा जमा           50,000
प्रवेश शुल्क          35, 000
कुल रुपये केवल    9,10,000 सालाना (भोजन शुल्क अतिरिक्त)

इसी प्रकार एक और विश्वविद्यालय है ओपी जिंदल विश्वविद्यालय सोनीपत की फीस सालाना फीस 650000 रुपये है, आवेदन शुल्क, निवास शुल्क, भोजन और कपड़े धोने का खर्च अतिरिक्त होगा।

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इसका अर्थ हुआ की इन जगहों पर यदि पढ़ना है तो किसी भी छात्र के अभिभावक को बीए की डिग्री के लिए क़म से क़म 25 से 30 लाख रुपये खर्च करना होगा। अब यह कोई राकेट विज्ञान नहीं है कि जिस देश में सालाना प्रतिव्यक्ति आय एक लाख रुपये के आस पास हो (2017 – 2018 में 1,11,782 रुपये) वहां इतनी मोटी फीस की मांग आम जन की पहुँच से बाहर है।

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यह सही है की सभी निजी शिक्षण संस्थाएं इतनी महंगी नहीं हैं, पर फिर भी ज्यादातर लोगों के लिए यदि ऐसी जगह पढ़ना है तो क़र्ज़ लेना ही होगा। और इसका क्या मतलब होता है यह यदि समझना है तो हमें अमेरिका का उदाहरण देखना होगा। वहां औसतन बीए पास छात्र के ऊपर 35000 डॉलर (20 से 25 लाख रुपये) का क़र्ज़ है, जबकि एम ऐ पास छात्र के ऊपर 75000 डॉलर (45 से 50 लाख रुपये) का क़र्ज़ है।

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जानकार लोगों का कहना है कि यदि इससे ज्यादा लम्बा कोर्स करना हो तो क़र्ज़ की मात्रा ज्यादा हो सकती है। इतने भारी क़र्ज़ के बोझ के साथ ज़िन्दगी शुरू करना कोई बहुत आकर्षक नहीं ही होता है। इसलिए वहां एक नए किस्म की गुलामी का उदय हुआ है। क़र्ज़ के बोझ से मुक्त होने के लिए “सभी किस्म की सेवा” उपलब्ध कराने वाले लड़के और लड़कियां sugar mummy या sugar daddy खोज लेते हैं, जो उस सेवा के बदले में इन्हें पैसा उपलब्ध करते हैं।

इस कार्य में मदद करने के लिए कई वेबसाइट्स काफी लोकप्रिय हैं। हिंदुस्तान में यह प्रवृति अपनी शुरुआती चरण में है परन्तु यदि सरकार शिक्षा के अवसर उपलब्ध नहीं कराती तो यह प्रवृत्ति बढ़ेगी और हावी होगी। और यह देश की तरुणाई या देश के भविष्य के प्रति बहुत आशावादी सम्भावना नहीं है।

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शायद महाप्राण निराला ने जो आजादी के समय सपना संजोया था वो आने वाले कई दशकों तक यूँ ही अधूरा रहेगा। उन्होंने कहा था :

जल्द -जल्द पैर बढ़ाओ, आओ, आओ
आज अमीरों की हवेली किसानों की होगी पाठशाला,
धोबी, पासी, चमार, तेली खोलेंगे अंधरे का ताला,
एक पाठ पढेंगे, टाट बिछाओ|

(सामाजिक संघर्षों में सक्रिय रवीन्द्र गोयल दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक रह चुके हैं।)