Last Update On : 01 10 2018 01:02:21 PM
प्रतीकात्मक

मौत को गले लगाने से पहले महिला पुलिसकर्मी ने लिखा पत्र, विभागीय अधिकारियों और सहयोगियों पर तमाम आरोप लगाने के साथ मां—पिता से मांगी माफी कि ले रही हूं अपनी जान…

लखनऊ, जनज्वार। मुख्यमंत्री योगी के राज में जहां एक तरफ एक पुलिसवाले ने 28 सितंबर की देर रात एप्पल कंपनी के एरिया मैनेजर विवेक तिवारी को लखनऊ में गोलियों से भून डाला, तो दूसरी तरफ लखनऊ के बगल के जिले बाराबंकी की हैदरगढ़ कोतवाली में तैनात एक दलित महिला पुलिसकर्मी ने स्टाफ में मौजूद पुरुष अधिकारियों की मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली।

शुरुआती छानबीन के बाद सामने आया है कि हरदोई जिले की मूल निवासी मोनिका 2016 बैच की सिपाही थी। करीब एक साल से कोतवाली में तैनात मोनिका किराये के मकान में रह रही थी। शुरुआती जांच में दलित महिला सिपाही के कमरे से उसके शव के पास से एक सुसाइड नोट भी बरामद किया है, जिसमें उसने संबंधित थाने के एसएचओ और कुछ पुलिसकर्मियों पर उसे मानसिक रूप से परेशान करने और छुट्टियां न देने का आरोप लगाया गया है।

इस मामले में एसपी ने प्रभारी निरीक्षक परशुराम ओझा और मुंशी रुखसार अहमद को लाइनहाजिर कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस क्या जांच करेगी और दोषियों को क्या सजा मिलेगी यह दूसरी बात है, मगर एक जिंदगी जरूर विभागीय टॉर्चर से असमय मौत के मुंह में समा गई।

मोनिका का पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसने पुलिस विभाग द्वारा अपने विभाग की महिलाओं के भी उत्पीड़न से बाज न आने की कलई खोलकर रख दी है।

आइए पढ़ते हैं महिला आरक्षी मोनिका का पत्र कि उसने क्यों लगाया मौत को गले

मैं मोनिका थाना हैदरगढ़—बाराबंकी में आरक्षी के पद पर नियुक्त हूं। मैं कार्यालाय में सीसीटीएनएस पर कार्यरत हूं। बावजूद इसके बार—बार बाहर ड्यूटी लगाकर मुझे टॉर्चर किया जाता है। जबकि बाकी सीसीटीएनएस पर कार्यरत लोगों की कहीं बाहर ड्यूटी नहीं लगती है।

मानसिक प्रताड़ना से तंग फांसी लगाकर आत्महत्या करने वाली मोनिका का सुसाइड नोट

इस डिपार्टमेंट में अगर कुछ खुद के साथ गलत हो रहा है तो उसका विरोध करना गुनाह है। जो भी हो रहा है चुपचाप सहते जाओ, तब ही शायद सभी खुश रहते हैं। जब मैंने इस चीज का विरोध किया तो कार्यालय में मौजूद कांस्टेबल मो. रूखसार अहमद और एसएचओ परशुराम ओझा द्वारा और ज्यादा उसे मानसिक तौर पर परेशान किया जाने लगा। यही नहीं रजिस्टर पर गैर हाजिरी भी लगा दी गई।

आज 29/9/2018 को जब अपनी छुट्टी लेकर एसएचओ परशुराम ओझा के पास गई तो उन्होंने रजिस्टर फेंक दिया और बोले हम छुट्टी नहीं देंगे। मुझे समझ नहीं आता है कि आखिर जिन छुट्टियों पर हमारा हक है उनके लिए भी हमें उच्च अधिकारियों के सामने भीख मांगनी पड़ती है। आखिर कब तक यह सब कर्मचारियों को झेलना पड़ेगा?

अगर मुझे आज छुट्टी दी गई होती तो शायद यह कदम नहीं उठाना पड़ता और रोना और परेशान नहीं होना पड़ता।

सॉरी मम्मी—पापा जो भी आप लोगों के साथ गलत किया, हो सके तो माफ कर देना। सॉरी!