Last Update On : 12 04 2018 11:41:00 PM

सामाजिक कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों ने कहा ममता सरकार कर रही है जन आंदोलन और लोकतंत्र पर हमले, सरकारी दमन के खिलाफ सख्ती दिखाने की की गई मांग

कोलकाता, जनज्वार। पश्चिम बंगाल के भांगर में भारी सरकारी दमन और तृणमूल के असामाजिक तत्वों द्वारा किए जा रहे हमलों के बीच पिछले डेढ़ साल से पॉवरग्रिड के खिलाफ जमीन जीविका के लिए हजारों किसान संघर्षरत हैं। स्थिति यह है कि 6 अप्रैल को पंचायत चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए भांगर जमीन जीविका कमेटी के 20 प्रार्थी जब बीडीओ आफिस पहुँचे तो पुलिस के संरक्षण में तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने उन पर आक्रमण कर दिया। किसी को भी नामांकन दाखिल नहीं करने दिया गया।

दूसरी तरफ तृणमूल के गुंडों को पूरी तरह पुलिस की सह है, इसलिए उन्हें छोड़ दिया गया। 6 अप्रैल को ही भांगर आंदोलन के संगठक अमिताभ भट्टाचार्य, विश्वजीत हाजरा, शंकर दास को गिरफ्तार कर लिया। 8 अप्रैल को छात्र, नौजवान व मज़दूर कार्यकर्ता रातुल बनर्जी को बंगाल पुलिस ने उनके निवास स्थान से आधी रात को उठा लिया। इन सभी पर आर्म्स एक्ट समेत कई खतरनाक धाराओं और रातुल पर अनलाॅफुल एक्टिवीटिज (प्रिवेंशन) एक्ट (यूएपीए) सहित 18 धाराएंं लगाई गई हैंं। रातुल को जेल कस्टडी में और बाकी तीन साथियों को पुलिस कस्टडी में रखा गया है।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के भांगर इलाके में पिछले डेढ़ साल से हजारों की संख्या में जनता तृणमूल (टीएमसी) सरकार और पाॅवर ग्रिड काॅरपोरेशन आॅफ इंडिया लिमिटेड द्वार जमीन हड़पने के खिलाफ आन्दोलनरत है। पश्चिम बंगाल सरकार और टीएमसी के गुंडों ने वर्ष 2013 से इस इलाके में गाँववासियों को डरा धमकाकर लगभग 80 बीघा जमीन छीन ली थी। उस जमीन पर केन्द्र सरकार द्वारा संचालित पाॅवर ग्रिड कारपोरेशन, 400 वाॅट का पाॅवर ग्रिड बना रही है। सत्ता में आने के बाद 2013 से, टीएमसी सरकार भांगर में गाँववासियों को गुंडों और ठेकेदारों के हाथों धमकाते हुए जमीन हड़पने की प्रक्रिया चला रही है।

2016 के अक्टूबर महीने में भांगर के इन हड़प लिए जाने वाले जमीनों पर 8-10 पहिये वाले वाहन, ट्रांसमीटर प्लांट लेते हुए गाँव में घुसने लगे। जबकि गाँववासियों को तृणमूल सरकार या कारपोरेशन द्वारा पाॅवर ग्रिड बनने के बारे में कोई सूचना नहीं दी गयी थी।

क्यों आन्दोलित हैं गाँववासी?
पाॅवर ग्रिड बन जाने पर जो विद्युत उत्पन और संचालन होगा, उससे इस पूरे इलाके में एक विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र बन जाने की सम्भावना है। उस इलाके में 3 फसली खेती और भारी मात्रा में तालाबों में मछली उत्पादन होता है। गाँववासियों को कोई जानकारी नहीं दी गयी कि पाॅवर ग्रिड बनने पर उनके स्वास्थ्य या खेतों और तालाबों पर क्या असर होगा? इससे ग्रामीणों में रोष व्याप्त होने लगा और यहीं से शुरू हुआ संघर्ष का दौर। जबरन जमीन अधिग्रहण, जीविका का संकट, पर्यावरण का खतरा के साथ सत्ताधारी दल और राजकीय आतंक व दमन इस आन्दोलन का जन्म दिया है।

दमन के बीच आन्दोलन
भांगर के ग्रामीणों ने अक्टूबर के महीने से विकास के नाम पर चले जमीन अधिग्रहण के खिलाफ जबरदस्त आन्दोलन खड़ा किया। इसी के साथ सरकार द्वारा दमन का सिलसिला भी तेज हो गया। नवम्बर, 2016 में पुलिस ने गाँव वासियों पर हमले शुरु कर दिये, कई ग्रामीणों को पीटा और गिरफ्तार किया गया, जिनमें महिलाओं की संख्या काफी थी।

दिसम्बर, 2016 में लगभग 10000 गाँववासियों और उनके समर्थन में आये कई छात्र और प्रगितिशील संगठन के सदस्यों ने कोलकाता में एक विशाल जुलूस निकाला। जनवरी, 2017 में 30000 से अधिक गाँववासियों ने रास्ता रोको अभियान चलाया। इसके चलते ममता सरकार और उसकी पुलिस ने दमन और हिंसा का दूसरा दौर शुरू किया। 17 जनवरी, 2017 को पुलिस की गोलियों से गाँववासी और आन्दोलनकारी अलमगीर और मोफिजुल मोल्लाह की मौत हुई।

इस पुलिसिया हिंसा और दमन का सामना करते हुए ग्रामीणों ने संगठित तौर पर आन्दोलन को आगे बढ़ाया, जिसके चलते पुलिस गावों के अन्दर नहीं घुस पाई। मगर आन्दोलन को बाहर से खत्म करने के लिए सरकार और पुलिस अपनी एड़ी—चोटी का जोर लगाती रही। 25 जनवरी, 2017 को पुलिस ने भांगर के शहनवाज मोल्लाह तथा शर्मिस्ठा चौधुरी और प्रदीप सिंह ठाकुर को गिरफ्तार किया। शर्मिस्ठा और प्रदीप सिंह पर यूएपीए लगाये गए।

उसके कुछ ही हफ्तों बाद भांगर आन्दोलन के समर्थन में काम करने वाले संहति कमेटी के कन्वेनर कुशल देबनाथ और शंकर दास को गिरफ्तार किया गया, उन्हें पुलिस हिरासत में रखा गया, और उनपर भी यूएपीए लगा दिया गया। बंगाल पुलिस के दमन व तृणमूल के गुण्डों द्वारा ग्रामीणों पर हमले लगातार बढ़ते रहे।

इन सबके बावजूद भांगर में जन आंदोलन लगातार आगे बढ़ता रहा है और हजारों किसान और गाँववासी, सरकार और कॉरपोरेशन की मिलीभगत के खिलाफ तथा नव उदारवादी पूँजीवाद के चलते कथित ‘विकास’ के नाम पर चल रहे शोषण के खिलाफ संगठित हैं और आन्दोलनरत हैं। अभी बंगाल में 1, 3 व 5 मई को पंचायत चुनाव होने वाले हैं, जिसमें सत्ताधारी ममता बनर्जी सरकार ने एकतरफा चुनाव कराने के लिए ही हमलों और गिरफ्तारियों का नया दौर शुरू किया है। चार लोगों की गिरफ्तारी और ग्रामीणों पर हमला उसी की कड़ी है।

मगर हमलों के बावजूद भांगर में जनता की संघर्ष जारी है। समाज के अलग अलग हिस्सों से आंदोलन पर दमन के खिलाफ संघर्ष के समर्थन में और गिरफ्तार लोगों के रिहाई के लिए आवाज उठ रही है। 9 अप्रैल को कोलकाता में चुनाव आयोग के आफिस के सामने विरोध प्रदर्शन हुआ। 11 अप्रैल को जादवपुर विश्वविद्यालय में सैकड़ों छात्रों की रैली की गई।

डॉक्टर रातुल व अन्य संगठकों पर लगाये गए झूठे मामलों को वापस लेने के मांग के साथ 18 अप्रैल को कोलकाता में डॉक्टर और मेडिकल छात्रों द्वारा कन्वेंशन किया जाएगा। 19 अप्रैल को भांगर आंदोलन संहति कमेटी के तरफ से कोलकाता में प्रतिवाद रैली की आह्वान किया गया है।

13 अप्रैल को दिल्ली में बंग भवन के सामने दोपहर 2.30 बजे अलग अलग जन संगठनों का संयुक्त विरोध प्रदर्शन आयोजित होना है।

जन संगठन मांग कर रहे हैं कि अमिताभ भट्टाचार्य, शंकर दास, विश्वजीत हाजरा और कामरेड रातुल बनर्जी तथा आंदोलन के अन्य कार्यकर्ताओ को फौरन रिहा किया जाए और उन पर से झूठे मुकदमे वापस लिए जाएं। यूएपीए निरस्त कर सरकार इसे आन्दोलनकारियों पर थोपना बन्द करे।  पंचायत चुनाव में नामांकन के जनवादी अधिकारों पर ममता सरकार हमले करने बंद करे।