Last Update On : 11 08 2018 05:24:42 PM

पीड़ित चिरंजीलाल कहते हैं, कई लोगों को देखा है जमीन का केस लड़ते। पीढ़ियाँ गुज़र जाती हैं फैसला आने में। कहाँ तो मैंने ख्वाब सँजोए थे कि रिटायरमेंट के बाद अपनी जमीन पर एक घर बनाऊँगा, ताकि ज़िंदग़ी के बचे हुए दिन आराम से कट सकें और कहाँ अब ये सब….

सुशील मानव की रिपोर्ट

इलाहाबाद, जनज्वार। आदमी अपना पेट काट-काटकर चार पैसे बचाता है। जमीन का एक टुकड़ा खरीदता है कि रिटायरमेंट के बाद जब सरकारी आवास छोड़ना पड़ेगा तो बुढ़ापे अपने और परिवार के रहने का कुछ तो ठौर-ठिकाना होना चाहिए। फिर तमाम उम्र ख्वाब बुनता रहता है कि रिटायरमेंट के बाद मिले फंड के पैसे से वो इसी जमीन पर एक मजबूत घरौंदा बनाएगा।

चिरौंजी लाल ने भी यही ख्वाब देखा था और उसे पूरा करने की योजना पर अमल करना करीब तीस साल पहले से ही शुरू कर दिया था, जब उन्होंने 1889 में जमीन का एक टुकड़ा अपने नाम से खरीदकर उसके चारों ओर बाउंड्री घेरवाकर छोड़ दिया था।

लेकिन उनके सारे ख्वाब तब धरे के धरे रह जाते हैं, जब जमीन माफिया अपनी नज़र उनकी जमीन पर गड़ा देता है। उनके सपने, उनकी जीवन भर की कमाई की बचत पूँजी, उनके बुढ़ापे का ठौर सब तब खतरे में पड़ गए जब उन्हें पता चला कि उनकी अपनी जमीन अब उनकी अपनी न रही उसका कोई और भी दावेदार तैयार हो चुका है।

चिरौंजी लाल की रिटायरमेंट की तारीख 31 जुलाई, 2017 के ठीक एक महीने बाद 29 अगस्त 2017 को उनकी जमीन फर्जी तरीके से किसी और के नाम रजिस्ट्री कर दी गई है। अब अपनी जमीन पर घर बनाना तो दूर उस पर अपना हक़ साबित करने के लिए भी कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

बता दें कि चिरौंजी लाल 6 भाई हैं। दो भाई इलाहाबाद के एजी ऑफिस में थे, जबकि खुद चिरौंजी लाल जी ऑडिट विभाग में नौकरी करते थे। बाकी के भाई रामचौरा रोड आनापुर गाँव में रहते ते। जबकि ये तीनों भाई पिताजी के साथ 21 कानपुर रोड सिविल लाइन इलाहाबाद में रहते थे।

1989 में ही चिरौंजी लाल जी की नौकरी रेलवे विभाग में लग गई और वो रेलवे विभाग में ऑफिस सुपरिटेंडेंट होकर पहली पोस्टिंग में अंबाला चले गए। चिरौंजी लाल जी के डिपार्टमेंट में उनके साथ थे राजेश कुमार श्रीवास्तव। दोनों सहकर्मियों ने भविष्य की प्लानिंग करके प्लॉट लेने का निर्णय करके एक दिन इलाहाबाद आये, और 10 नवंबर 1989 में रवि सहकारी समिति और निर्माण नामक सोसायटी से अपने अपने नाम पर एक एक प्लॉट खरीद कर रजिस्ट्री करा ली।

उसके चारों ओर बाउंड्री घेरवाकर एक टीनशेड डालकर छोड़ दिया। एक तो नौकरी की व्यस्तता, घर परिवार की जिम्मेवारियों व बच्चों की पढ़ाई-लिखाई परवरिश शादी-ब्याह और दूसरे दुनियादारी के फरेबों से अनभिज्ञता के चलते उन्होंने दाखिल खारिज नहीं करवाया। या यूँ कि ज़रूरत ही नहीं समझी।

रेलवे विभाग में 28 साल की लंबी संवा देने के बाद फिर आया सेवानिवृत्ति का दिन। 31 जुलाई 2017 को रिटायर होकर चिरौंजी लाल अपने पैतृक गाँव आनापुर इलाहाबाद आ गए। तब तक जमीन की चारदीवारी का एक हिस्सा गिर गया था। इससे पहले कि वो अपनी जमीन पर कुछ निर्माण कार्य करते 29 अगस्त, 2017 को उनकी जमीन शफ़ात अहमद ख़ान और शफीक़ अहमद ख़ान ने मुट्ठीगंज और बलवाघाट के राम जी केसरवानी और सुशील कुमार केसरवानी के नाम पर रजिस्ट्री कर दी।

1 सितंबर को राम रामजी केसरवानी और सुशील कुमार केसरवानी ने उस जमीन पर दीवार उठवा दी। वहाँ पड़ोसियों ने चिरौंजी लाल के बेटे अंकित शर्मा को फोन करके पूछा कि आपने अपना प्लॉट किसी को बेंच दिया क्या। बेटा चौंका, नहीं तो। तो पड़ोसी बताने लगे कि आपके प्लाट में कोई दीवार खड़ी कर रहा है।

अगले दिन चिरौंजी लाल और उनके बेटे ने आकर पुलिस में शिकायत की। पुलिस ने कहा कि दीवार तोड़ दो और उन्होंने दीवार तोड़ दी। फिर अगले रोज लोगो ने फोन करके उन्हें थाने में बुलाया गया वहाँ विरोधी पार्टी यानी रामजी, सुशील कुमार केसरवानी लोग पहले से मौजूद थे, चार-पाँच एसआई और वकील लोग बैठे थे।

परिवार के साथ चिरौंजीलाल की तस्वीर

सबकी मौजूदगी में केसरवानी ने कहा कि हम उस जमीन पर निर्माण करने जा रहे हैं। चिंरौजी लाल ने आपत्ति की कि आप ऐसे कैसे बना सकते हैं। तो थाने में जोर जबर्दस्ती पुलिसवालों ने चिरौंजी लाल से एक समझौते पर साइन करवाया गया कि जिसका दाखिल खारिज पहले होगा जमीन उसकी होगी और उक्त जमीन पर वही घर बनाएगा। कहीं न कहीं वो अपनी दाखिल खारिज को लेकर निंश्चित थे।

इस बीच अपनी भूल को सुधारते हुए चिरौंजी लाल ने दाखिल खारिज के लिए अपील कर दी। उनके बाद ही विरोधी पार्टी ने भी उनकी दाखिल खारिज पर आपत्ति याचिका लगाकर अपनी दाखिल खारिज की अपील दायर कर दी, तो चिरौंजी लाल ने भी उसकी दाखिल खारिज के खिलाफ याचिक देकर आपत्ति लगा दी।

चिरौंजी लाल जी भावुक होकर कहते हैं मेरा भगवान ही मेरे साथ दे रहा था कि तहसीलदार ने उसकी आपत्ति को खारिज करते हुए 7 जून, 2018 को मेरी दाखिल खारिज स्वीकार करते हुए जमीन हमारे नाम कर दी और तहसीलदार ने मेरे हक़ में आदेश में लिखा कि विरोधी पार्टी का बैनामा संदिग्ध है, और मैं उसकी आपत्ति को खारिज करते हुए चिरौंजी लाल वल्द राम लखन का दाखिल खारिज करता हूँ क्योंकि इनका बैनामा तीस साल पुराना है।

चिरौंजी लाल फिर आवेशित होकर आगे कहते हैं कि, कुछ रोज बाद जाने कौन सा शैतान सवार हो गया उस तहसीलदार अजय कुमार कटियार पर कि मुझसे विरोधी की दाखिल खारिज की याचिका कैंसिल करने के लिए 50 हजार रुपए की मांग करने लगा। मैंने उसे पैसे देने से मना कर दिया तो मेरी दाखिल खारिज के डेढ़ महीने बाद मेरी आपत्ति को खारिज करते हुए तहसीलदार कटियार ने 24 जुलाई 2018 को विरोधी पार्टी यानि केसरवानी परिवार की भी दाखिल खारिज कर दी।

फिर विरोधी पार्टी केसरवानी द्वय के आदेश में तहसीलदार ने लिखा कि अभी 245 के खाते में शेष जमीन बाकी है और उनका बैनामा 245-46 में है इनका 245 में हैं तो मैं इनका भी बैनामा कर देता हूँ। एक जगह तो वो तहसीलदार डिनाई करता है कि नहीं ये गलत है और दूसरी जगह उस विरोधी पार्टी को सही बताकर वो हमको गलत बता देता है। अब हमारा दाखिल खारिज खारिज करके उनका स्वीकार कर रहा है।

इस पर हमने उक्त तहसीलदार को याचिका दी आप मौके का मुआयना करिए। आप जमीन पर चलकर सारी हकीकत पहले देख लीजिए। यहाँ बैठे क्या हैं, आप इसका फैसला कैसे कर सकते हो। पर उसने मेरी एक भी दलील न सुनी और केसरवानी द्वय से पैसा ऐंठकर हमारी जमीन पर उनका भी दाखिल खारिज कर दिया। अब विरोधी पार्टी को लड़ने का बेस मिल गया।

नगर निगम प्रोपर्टी टैक्स जेनरेट हुआ है। नगर निगम में आईडी बनी है। बिजली और पानी का बिल मेरे नाम पर चल रहा है। कब्जा मेरा है, लेकिन नहीं अब तो हर जगह पैसा चल रहा है। पैसे के बल पर पुलिस और तहसीलदार को खरीदकर केसरवानी लोग जबर्दस्ती मेरी जमीन हथिया रहे हैं। हो सकता है इसके पीछे कोई ताकतवर नेता भी हों। तो मैं न्याय के लिए अब कहाँ जाऊँ। कहाँ है न्याय। एक चीज जो पहले ही बेची जा चुकी है, दोबारा उसे कोई दूसरा कैसे बेच या खरीद सकता है।

चिरौंजी लाल बताते हैं दरअसल आज से बत्तीस साल पहले यानि कि 1987 से पहले यहाँ पर अब्दुल वहाब खान S/O अब्दुल रहीम ख़ान के 9 बीघे खेत होते थे। ये अब्दुल वहाब खान शफात और शफीक अहमद खान के बाबा थे। तो अब्दुल वहाब खान ने 10 फरवरी 1987 को अपने 9 बीघे खेत में से 2 बीघे जमीन रवि शेखर सहकारी आवास एवं निर्माण समिति को बेचकर उनके नाम रजिस्ट्री कर दी थी, जिनका दफ्तर 63 ए मुट्ठीगंज में थी।

आज के वक्त इस एड्रेस पर एसबीआई का बैंक है, जबकि उक्त सोसायटी के सेक्रेटरी कमलेश कुमार प्रसाद वहीं पहले फ्लोर पर रहते हैं। उक्त सोसायटी ने प्लॉटिग करके ग्राहकों को रजिस्ट्री कर दी, तो चिरौंजी लाल और उनके सहकर्मी मित्र राजेश कुमार श्रीवास्तव ने एक साथ, एक ही दिन उक्त सोसायटी से अलग अलग जमीन खरीदी थी। उसमें मुझे प्लाट नंबर 11 आवंटित हुई जिसकी चौहद्दी पर लिखा था कि 10 नंबर एक साइड और दूसरी साइड 12 नंबर का प्लॉट है।

सामने बीस फीट चौंड़ा रोड और पीछे दूसरों की प्रोपर्टी है, जिसकी रजिस्ट्री 21 कानपुर रोड सिविल लाइंस के पते पर हुई थी। जोकि हमारे पिताजी का निवास था। छोटे भाई लोग अब भी रहते हैं वहाँ। जिसे आज तीस साल बाद मरहूम वहाब ख़ान के पोतों शफ़ात ख़ान और शफीक़ ख़ान ने फ़र्जीवाड़ा करते हुए मुट्ठीगंज और बलवाघाट के राम जी केसरवानी और सुशील कुमार केसरवानी के हाथों बेच दी।

चिरौंजी लाल ने तहसीलदार के खिलाफ एसडीएम के यहाँ केस डाला और उसकी दाखिल खारिज कैंसेलेंशन के लिए भी सिविल कोर्ट में केस फाइल कर रखा है। भर्राये गले से चिरौंजी लाल कहते हैं कि मैंने कई लोगो को देखा है जमीन का केस लड़ते। पीढ़ियाँ गुज़र जाती हैं फैसला आने में। कहाँ तो ख्वाब सँजोए थे कि रिटायरमेंट के बाद अपनी जमीन पर एक घर बनाऊँगा, ताकि ज़िंदग़ी के बचे हुए दिन आराम से कट सकें और कहाँ अब ये सब।

बुढ़ापे में अब कोर्ट कचहरी के धक्के और फंड के पैसे से चिरौंजी लाल को वकील की फीस भरनी होगी। तहसीलदार अजय कुमार कटियार ने अगर विरोधी पार्टी की दाखिल खारिज से पहले मौके का मुआयना कर लिया होता तो मैं इस बुढ़ापे में कितने कष्टों से बच जाता।

दुनियादार लोग कहते हैं मैंने तहसीलदार की बात मानकर उसे पचास हजार रुपए दे दिए होते तो ये सब नहीं होता। मैं उन्हें कैसे बताऊँ कि ये सब तब भी होता, विरोधी पार्टी ने उसे ज्यादा पैसा दिए हैं। तहसीलदार दोनो पार्टी से पैसा खाना चाहता था। कोर्ट कचहरी जमीन के फर्जी रजिस्ट्री के केसों से पटी पड़ी हैं। कई कई केस में पचासों साल से फैसला नहीं आय़ा है।

सरकार जमीन के फ्रॉड और माफियाओं से लोगो को छुटकारा दिलाने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती। ताकि हम जैसे सीधे सादे लोगों को जीवनभर की अपनी कमाई जमीन में घर के सपने में इन्वेस्ट करने के बाद यूँ उससे लुटता हुआ तो न देखना पड़े।