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आधुनिक विज्ञान ने जब हवाई जहाज दे दिया, तब मोदी जी या फिर सत्यपाल सिंह की कल्पना में रामायण काल का विमान आ जाता है, इसीलिए इंडियन साइंस कांग्रेस के एजेंडा में पुरातनवादी और धार्मिक विज्ञान गहरी पैठ जमा चुका है…

हेंद्र पाण्डेय, वरिष्ठ लेखक

कर्नाटक स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हलेबिडू का एक चित्र है जिसमें एक महिला हाथ में दर्पण लेकर आपने सौंदर्य को देख रही है। संभव है, किसी दिन किसी बड़े बीजेपी नेता इसे देखें और इसे हजारों साल पहले सेल्फी लेती महिला का चित्र बताने लगें।

मेघालय में पिछले एक महीने से फंसे खान मजदूर आज तक नहीं निकाले जा सके है, और हमें अपने देश के विज्ञान और प्रोद्योगिकी की परंपरा पर गर्व है, जो वेदों जितनी पुरानी है। प्रधानमंत्री देश को नए साल पर बताते हैं कि गंगा साफ़ हो रही है और बिना किसी सन्दर्भ का हवाला देते हुए बताते हैं कि ऐसा अंतरराष्ट्रीय अध्ययन बताता है।

मजेदार तथ्य यह है कि ऐसा कोई सन्दर्भ पीएमओ की वेबसाइट पर भी मौजूद नहीं है। पीएमओ की वेबसाइट पर झूठ से झूठ खबर भी यदि सरकार के समर्थन में रहती है तो जरूर लगाई जाती है। अभी, राफेल विमानों के लिए भारतीय वायु सेना तरस रही है, पर हम पुष्पक विमान समेत अनेक तरीके के विमान बनाते थे और मल्टी गाइडेड मिसाइल तो विष्णु के समय से है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे मात्र दस वैज्ञानिक दुनिया के 4000 प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों में शुमार हैं। पहले वैज्ञानिक शोध पत्रों को प्रकाशित करने के मामले में हम विश्व में तीसरे स्थान पर थे, पर अब प्रधानमंत्री के अनुसार पांचवें स्थान पर पहुँच गए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने वाले छात्र लगातार सुविधाएं नहीं मिलने के कारण सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं।

हमारे प्रधानमंत्री, बड़बोले मंत्रियों, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों, भाजपा सांसद और नेताओं, और यहाँ तक कि कुछ वैज्ञानिकों को वेदों, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में विज्ञान खोजने की लत लग गयी है। हरेक वर्ष जनवरी के आरम्भ में आयोजित किया जाने वाला प्रतिष्ठित भारतीय साइंस कांग्रेस भी अब तो पूरी तरह ऐसे ही विज्ञान की चपेट में आ चुका है।

इस वर्ष 3 से 7 जनवरी तक इंडियन साइंस कांग्रेस का 106वां अधिवेशन पंजाब के फगवाड़ा में आयोजित किया गया और इसमें जो कुछ भी हुआ उसे विज्ञान के तिरस्कार के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।

आन्ध्र यूनिवर्सिटी के उपकुलपति जी नागेश्वर राव ने साइंस कांग्रेस के एक अधिवेशन में बताया कि स्टेम सेल और टेस्ट ट्यूब बेबी का विज्ञान तो महाभारत काल से चला आ रहा है, और 100 कौरवों का जन्म इसी विधि से हुआ था। उन्होंने बच्चों के इस अधिवेशन में बताया कि किस तरह से अंडे को निषेचन के बाद मिटटी के बर्तनों में रखा गया और इनसे कौरव पैदा हुए। नागेश्वर राव ने आगे ज्ञान देते हुए कहा कि रावण के पास 24 प्रकार के वायुयान थे और श्रीलंका में आज भी वायुयान उतरने की हवाई पट्टी मौजूद है। राम गाइडेड मिसाइल का उपयोग करते थे और विष्णु के पास मल्टी-वारहेड्स थे।

एक दूसरे वक्ता और तथाकथित वैज्ञानिक, तमिलनाडु के डॉ केजे कृष्णन ने इसी कांग्रेस में महान वैज्ञानिकों आइजाक न्यूटन और अल्बर्ट आइंस्टीन के बारे में नयी जानकारी उजागर की कि इन लोगों को भौतिक विज्ञान की जरा भी जानकारी नहीं थी। इनसे बड़े वैज्ञानिक तो प्रधानमंत्री मोदी और विज्ञान मंत्री डॉ हर्षवर्धन हैं। कृष्णन तो इन दोनों के विज्ञान के प्रति समर्पण से इतने प्रभावित हैं कि यह सुझाव भी दे डाला, गुरुत्वाकर्षण तरंगों को “नरेंद्र मोदी तरंग” और चंद्रशेखर वेंकट रमन के नाम पर रखे गए “रमन प्रभाव” को “हर्षवर्धन प्रभाव” का नाम देना चाहिए।

हरेक देश अपने प्राचीन ज्ञान का आदर करता है और उस ज्ञान के भण्डार को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर आगे बढता है। इतना तो सभी मानते हैं कि प्राचीन ज्ञान तत्कालीन आबादी और परिस्थितियों के लिए प्रेरक रहा होगा और आधुनिक विज्ञान आज कि परिस्थितियों को सुगम बनाता है। वर्तमान में संभवतः भारत ही इकलौता देश होगा जहाँ सरकार आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिकों की उपेक्षा कर प्राचीन ग्रंथों में विज्ञान खोजने में लगी है।

पर, यहाँ के पूरे सरकारी तंत्र को यह पता ही नहीं है कि इसकी प्रेरणा भी उन्हें आधुनिक विज्ञान ही दे रहा है। कल्पना कीजिये, आधुनिक विज्ञान ने इंटरनेट नहीं दिया होता, हवाई जहाज नहीं होते, रॉकेट नहीं होते, परमाणु परीक्षण नहीं होते, राडार नहीं होते, प्लास्टिक सर्जेरी नहीं होती – तो फिर हमारे नेता और कुछ वैज्ञानिक किस चीज को आधार मान कर बयान देते?

महीनों पहले त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने तो महाभारत काल में इन्टरनेट खोज लिया है। यही नहीं, उनके अनुसार उनके वक्तव्य का मजाक उड़ाने वाले पूरे त्रिपुरा का मजाक उड़ायेंगे। बिप्लब देब को यह मालूम होना चाहिए कि मुख्यमंत्री के बेवक़ूफ़ होने का मतलब यह नहीं है कि पूरी जनता बेवक़ूफ़ होगी। बिप्लब देब ने शायद सोचा ही नहीं होगा कि आज इंटरनेट है, इसीलिए वो यह बयान देने के काबिल हुए हैं। खैर, बिप्लब देब के अनुसार तो बत्तख के पानी में तैरने से पानी प्रदूषण मुक्त हो जाता है।

कुछ दिनों पहले प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जयंत विष्णु नार्लीकर ने एक लेख में नागरिकों में वैज्ञानिक प्रवृत्ति विकसित करने पर जोर दिया। पर जब हम समाज में आपने आसपास देखते हैं तो स्पष्ट होता है कि हम भारतीयों को आधुनिक विज्ञान पर आधारित उपकरणों के उपयोग में कोई समस्या नहीं है, जबकि उसके सिद्धांत को मानने से परहेज करते हैं।

समस्या यह है कि एक बड़ी जनसंख्या के साथ साथ पूरी सरकार का मत है कि वेदों के बाहर कोई विज्ञान नहीं है। हाल ही में मानव संसाधन मंत्रालय ने इंजीनियरिंग के कोर्स में वेदों और पुराणों के अध्ययन को अनिवार्य कर दिया है।

कुछ दिनों पहले मानव संसाधन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को पाठ्यक्रमों से निकालने की वकालत कर डाली। उनके अनुसार किसी प्राचीन भारतीय ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं है और किसी ने बंदर से मनुष्य बनते नहीं देखा। उनके इस बयान का मजाक अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी बनाया गया। आश्चर्य की बात है कि जिस उदाहरण को उन्होंने दिया, लगभग वैसा ही उदाहरण हनुमान का है, जो कपीश भी हैं और पवनसुत भी हैं। डॉ नार्लीकर ने आपने लेख में लिखा है कि डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत विकास के हरेक जवाब देने में सक्षम हो या न हो, पर आज की तारीख में विकास पर सबसे ज्यादा जवाब देने वाला सिद्धांत यही है और तथ्यों पर आधारित है।

यदि प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में होना और किसी के देखने से ही विज्ञान के किसी सिद्धांत का होना या न होना निर्भर करता है तब तो मंत्री जी को डायनासोर सरीखे जानवरों का अस्तित्व भी पाठ्यक्रम से बाहर करा देना चाहिये। जब डायनासोर पृथ्वी पर थे तब मनुष्य पृथ्वी पर नहीं था, इसलिये किसी ने देखा नहीं होगा और इनका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी नहीं है।

सत्यपाल सिंह पहले भी विज्ञान के तथ्यों को झुठला चुके हैं। करीब एक साल पहले दिल्ली में इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों के सामने वे बता चुके हैं कि हवाई जहाज का आविष्कार राईट बंधुओं से आठ साल पहले ही शिवाकर बालाजी तलपड़े नामक भारतीय ने किया था। समस्या यहीं खत्म नहीं होती, सिंह साहब यह बताना भी नहीं भूलते कि रामायण में पहली बार हवाई जहाज का जिक्र किया गया है।

एक सेवानिवृत्त पायलट और पायलट ट्रेनिंग केन्द्र में कार्यरत कैप्टन आनंद बोडस तो और भी आगे हैं, उनके अनुसार ॠषि भारद्वाज ने 7000 वर्ष पहले ही हवाई जहाज ही नहीं बल्कि राकेट और राडार भी बना लिया था। डॉ नार्लीकर के अनुसार यदि इतने पहले हवाई जहाज थे तो ये लोग इसका सिद्धांत क्यों नहीं बताते? आनंद साहब ने यह नहीं बताया कि 7000 साल पहले और कितने देशों में हवाई जहाज थे, यदि नहीं थे तो राडार क्यों बना था।

अब जरा रामायण के हवाई जहाज की बात करें। इसके आधारित चित्रों में यह एक प्लेटफार्म जैसा दिखता है। जिस पर सीता विलाप करते खड़ी रहती हैं और रावण सिंहासन पर बैठा रहता है। अब जरा उसके गति की कल्पना कीजिये जिसके उड़ते समय लोग खड़े रह सकते थे, वह ऊपर से बंद नहीं था और इतनी ऊंचाई पर उड़ान भरता था कि विलाप जमीन तक सुनाई दे सके। इसके आसपास गिद्ध भी उड़ान भरते थे, जैसा जटायु ने किया था। सीता उड़ान भरते अपने गहने भी नीचे गिरा रहीं थीं। यह विमान घने जंगल में भी उतर जाता था।

जरा दिमाग लगाकर सोचिये, क्या ऐसा विमान हो सकता है? पर, आधुनिक विज्ञान ने जब हवाई जहाज दे दिया, तब मोदी जी या फिर सत्यपाल सिंह की कल्पना में रामायण काल का विमान आ जाता है।

प्रधानमंत्री भी ऐसी बातें खूब करते हैं। 2014 में मुंबई के एक अस्पताल के किसी कार्यक्रम में उन्होंने गणेश को कास्मेटिक सर्जरी का जन्मदाता बताया था और शूरवीर कर्ण को जेनेटिक इंजीनियरिंग की देन। प्रधानमंत्री जी को भी अपनी कल्पना पर आधारित बयान के लिए आधुनिक विज्ञान का शुक्रगुजार होना चाहिए। वैसे आधुनिक विज्ञान भी आदमी के शरीर पर हाथी के सिर को लगाने की कल्पना भी नहीं करता होगा। हाँ, अवैध तरीके से जन्म देने को जेनेटिक इंजीनियरिंग का नाम देना हास्यास्पद जरूर है। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कहा था, राम ने पहला पुल बनाया था।

रमेश पोखलियाल बताते हैं, कनड नामक योगी ने पहला परमाणु टेस्ट ईसापूर्व तीसरी शताब्दी में किया था। पोखालियाल जी को यह जरूर बताना चाहिए कि परमाणु टेस्ट किस जगह किया गया, कितने लोग विकिरण से प्रभावित हुए और यदि आबादी प्रभावित हुई तो वह राक्षस थे या मनुष्य। यदि, आधुनिक विज्ञान के कारण परमाणु टेस्ट आज का हकीकत नहीं होता, तब पोखालियाल जी क्या कहते।

डॉ नार्लीकर ने उदहारण दिया कि तथाकथित ब्रह्मास्त्र को लोग परमाणु हथियार मानते हैं, यदि उस समय परमाणु हथियार बनाये गए तो चुम्बकीय शक्ति और विद्युत् का विस्तृत अध्ययन किया गया होगा, पर इसके कोई सबूत नहीं हैं। गाय सांस के साथ आक्सीजन छोड़ती है, यह बताने वाले नेताओं की भरमार है।

इसी साइंस कांग्रेस में डॉ हर्षवर्धन के उदबोधन में भी जितनी विज्ञान की चर्चा नहीं थी, उससे अधिक तो प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की चर्चा थी। बीबीसी के अनुसार इंडियन साइंस कांग्रेस के एजेंडा में पुरातनवादी और धार्मिक विज्ञान गहरी पैठ जमा चुका है। हालाँकि साइंस कांग्रेस के आयोजकों ने सभी विवादित बयानों से पल्ला झाड़ लिया है, पर सवाल तो यही है कि ऐसे वक्ता इतने प्रतिष्ठित मंच पर कैसे पहुंचते हैं।

आधुनिक विज्ञान के बहुत लाभ हैं, पर इससे जिस तरह का अवैज्ञानिक लाभ हमारे राजनेता और कुछ वैज्ञानिक ले रहे हैं, उसकी शायद ही किसी ने कल्पना की हो। कुछ भी हो, पर इतना तो तय है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ऐसी खबरों को एक चुटकुले की तरह प्रकाशित करता है। विज्ञान किसी को तो हंसने का मौका दे रहा है, और यही भारतीय विज्ञान की उपलब्धि है।


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