Last Update On : 28 10 2018 09:13:36 PM
गांव में पीड़ित परिवारों से बातचीत करते जांच दल के सदस्य : आखिर क्या इसे ही कानून का राज कहते हैं

यह किसी लोकतंत्र में सातवें आसमान जैसी घटना होनी चाहिए पर यह हमारे देश के हुक्मरानों के लिए दो टके के बात है कि एक ही गांव में एक ही दिन में 280 लोगों पर यूएपीए जैसा काला कानून लगा दिया जाता है और मीडिया चुप्पी साध लेती है…

मनावाधिकार संगठन NCHRO के दखल के बाद पुलिस अधीक्षक ने कहा देखते हैं क्या है पूरा मामला, जांच दल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सौंपेगा अपनी जांच रिपोर्ट, एफआईआर सांप्रदायिक मंशा से गयी है लिखी 

उत्तर प्रदेश, बहराइच। दिल्ली के मानवाधिकार संगठन NCHRO ने साम्प्रदायिक तनाव के बाद आज गाँव खैरा बाजार इलाके का दौरा कर तथ्य जुटाए। पिछले दिनों इस इलाके में हुए साम्प्रदायिक तनाव के बाद पुलिस ने अल्पसंख्यक समुदाय के 80 नामजद और 200 अज्ञात लोगों पर आतंकवाद के मामले इस्तिमाल किया जाने वाला काला कानून यूएपीए लगा दिया है।

जांच के बाद प्रेस को संबोधित करते जांच दल के सदस्य

पुलिस दबिश देकर गरीबों—मज़दूरों को धड़ल्ले से गिरफ्तार कर रही है। दौरे के बाद पुलिस अधीक्षक से मुलाकात में जांचदल के सामने उन्होंने माना कि हम यूएपीए लगाने के मामले को दुबारा देखेंगे। जांचदल ने इस मौके पर पत्रकारवार्ता को सम्बोधित किया। पत्रकारवार्ता में संगठन के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष एंव जांच दल के सदस्य एड्वोकेट अमित श्रीवास्तव ने बताया कि एफआईआरकर्ता को कोई अस्सी हमलावरों के नाम तो याद है लेकिन अपने घायल साथियों का नाम उसे याद नहीं है।

जांच दल के सदस्य और रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव ने कहा कि ‘यूएपीए के तहत मुकदमा ठोको, वीडियो वायरल करो’ योगी सरकार का चुनावी हथकंडा है। जांच दल शामिल में दिल्ली की मानवाअधिकार कार्यकर्ता बलजीत कौर ने बताया कि पूरी एफआईआर में जिसका जिक्र नहीं, उस देशविरोधी नारे का वीडियो तीन दिन बाद कहां से आया, ये बढ़ा सवाल है। एफआईआर पढ़ने से लगता है योगी सरकार में घटना से पहले एफआईआर दर्ज हो गई है।

जांच दल के सदस्य एड्वोकेट अन्सार इन्दौरी ने बहराइच के खैरा बाजार सांप्रदायिक तनाव मामले में यूएपीए के तहत दर्ज एफआईआर और विवादित वीडियो को अल्पसंख्यकों के खिलाफ सोची समझी साजिश बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि एफआईआर में पुलिस ने यूएपीए के तहत जो मुकदमा दर्ज किया उससे साबित होता है कि मुसलमानों को देश विरोधी घोषित करने का षडयंत्र पहले से तय था। एफआईआर में ऐसा कोई आरोप नहीं था जो यूएपीए के तहत आता हो।

फासीवादी विरोधी मोर्चा के सदस्य कृपाशंकर ने बताया कि अब वीडियो वायरल कर इसे तूल दिया जा रहा है। सवाल है कि घटना के तीन दिन बाद वीडियो कहां से आया। जांच दल में शामिल रहे रिहाई मंच के रॉबिन वर्मा ने कहा कि बहराइच जिले के थाना बौंण्डी में 20/10/2018 को दर्ज एफआईआर के अवलोकन से उसमें दर्ज घटना पूरी तरह संदेह के घेरे में है।

कृपाशंकर ने कहा कि यदि ढाई तीन सौ व्यक्ति प्रतिमा विसर्जन यात्रा पर हमला करने के लिए छुपे होते तो किसी व्यक्ति द्वारा देख ही लिए गए होते। आशीष कुमार शुक्ला ढाई तीन सौ लोगों में शामिल 80 लोगों का नाम लिखाते हैं लेकिन चोट खाने वालों में केवल तीन लोगों का नाम लिखाने के बाद 50-60 चोट खाने वालों का नाम याद नहीं रख पाते। जिस व्यक्ति को अपने जुलूस के लोगों और वह भी घायल लोगों का नाम याद नहीं उसे दूसरे पक्ष के लोगों का नाम कैसे याद हो सकता है। यह इस बात को भी पुष्ट करता है कि पहले से चिन्हित किए गए लोगों का नाम दर्ज करवाया गया।

मुकदमे के आरोपक आशीष कुमार शुक्ला ने तहरीर में घटना का समय नहीं लिखा है। फिर भी प्रथम सूचना रिपोर्ट में घटना का दिनांक तथा समय 20/10/2018 को 00ः00 बजे लिखा है। तो फिर प्रथम सूचना रिपोर्ट 21ः38 पर कैसे दर्ज हो गई।

जांच दल में शामिल भगत सिंह छात्र एकता मंच की राजवीर कौर ने कहा कि थाना बौंण्डी की पुलिस तथा क्षेत्र के सांप्रदायिक तत्वों ने मिलकर आपस में राय मसवरा करने के बाद फर्जी रिपोर्ट तैयार की है। एफआईआर में कुल 80 व्यक्ति नामजद किए गए हैं और उनके साथ 100-200 की अतिरिक्त संख्या बल बताई गई है जो विश्वसनीय नहीं प्रतीत होती।

चेहरे पर गुस्सा बताता है कि मुल्क गरीबों को नागरिक मानने को तैयार नहीं है, भले ही वह निर्दोष हों

उन्होंने कहा कि घटना के तकरीबन तीन दिन बाद अपर पुलिस अधीक्षक बहराइच द्वारा दिया गया बयान जिले की पुलिस और सांप्रदायिक तत्वों के षडयंत्र को उजागर करता है। आशीष कुमार शुक्ला की एफआईआर में नारेबाजी की घटना नहीं है। अपर पुलिस अधीक्षक द्वारा तथाकथित वीडियो जारी होने के बाद बयान दिया गया है। यदि घटना वाले दिन कोई नारेबाजी हुई होती तो एफआईआर में उसका जिक्र जरुर किया गया होता।तथाकथित वीडियो वायरल हुआ और तब अपर पुलिस अधीक्षक ने बयान जारी किया।

जांच दल ने यूएपीए के तहत दर्ज किए गए मुकदमे को साजिश का हिस्सा बताया। आशीष कुमार शुक्ला द्वारा दर्ज कराई गई रिपोर्ट में कोई ऐसा तथ्य नहीं है जो घटना को आतंककादी घटना बता सके तो पुलिस ने किस आधार पर यूएपीए की धारा लगाई। यह मुसलमानों को देशद्रोही बताने की भाजपा की साजिश की ताजा कड़ी है। गौरतलब है कि पूरे अवध क्षेत्र में प्रतिमा विसर्जन के दौरान सांप्रदायिक तत्वों के सामने प्रशासन नतमस्तक रहा।

बहराइच के खैरा बाजार में सांपद्रायिक तत्वों द्वारा जामा मस्जिद के सामने जुलुस रोककर शोर-शराबे के बीच गुलाल फेंकेने के चलते तनाव हुआ। देखते-देखते दुकानों को निशाना बनाया गया, ईदगाह की दीवार तोड़ दी गई। इस दौरान पुलिस मौजूद रही और वीडियो भी उसने रिकार्ड किया पर गुनहगारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। पुलिस ने मुस्लिम समुदाय के घरों में दबिश के नाम पर तोड़फोड़ की और मुसलमानों की गिरफ्तारियां की।