बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूछा महाराष्ट्र सरकार से क्या वजह है पानसरे मामले की धीमी जांच की और क्या मामले की धीमी जांच उनके लिए चिंता का विषय नहीं है, तर्कवादी गोविंद पानसरे हत्याकांड की जांच के लिए अपनाए गए तरीके नहीं हैं सही…

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

जनज्वार। बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार 14 मार्च को महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए तल्ख टिप्पणी की कि तर्कवादी गोविंद पानसरे हत्याकांड की जांच के लिए अपनाए गए तरीकों को लेकर सरकार हंसी का पात्र बन गई है।

जस्टिस एससी धर्माधिकारी तथा जस्टिस बीपी कोलाबावाला की एक पीठ ने महाराष्ट्र के गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव को मामले की धीमी जांच का कारण बताने के लिए 28 मार्च को तलब किया है। पीठ ने कहा कि यदि नेता देश की जनता की सुरक्षा नहीं कर सकते है तो वे चुनाव न लड़े। पीठ ने कहा कि यदि अपराध की जांच सिर्फ अदालत के हस्तक्षेप के बाद की जाएगी तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रकरण दर प्रकरण सिर्फ न्यायपालिका ही संरक्षक के रूप में आगे आएगी तो इससे पुलिस की जनता के मन में क्या छवि बनेगी?

पीठ ने राज्य के मुख्य सचिव को स्पष्ट करने को कहा है कि पानसरे मामले की धीमी जांच की वजह क्या है और क्या मामले की धीमी जांच उनके लिए चिंता का विषय नहीं है? हम चाहते हैं सरकार भी इस मामले में दबाव महसूस करे और एक दिन वह भी इसका परिणाम भुगते।

पीठ ने यह भी कहा कि अक्सर देखा गया है कि आपराधिक मामलों की जांच करनेवाली पुलिस बिना किसी जिम्मेदारी के बच निकलती है, उन्हें न कोई मेमो जारी किया जाता है और न ही उनसे कोई सफाई मांगी जाती है। हद तो यह है कि उन्हें अपराध की जांच कैसे प्रभावी तरीके से की जाए इसका समय-समय पर सेवानिवृत्त अधिकारियों के माध्यम से प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता।

इससे पहले पीठ ने पानसरे व सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर मामले की जांच को लेकर लेकर पेश की गई प्रगति रिपोर्ट को देखने के बाद कड़ी अप्रसन्नता व्यक्त की। राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) पानसरे मामले की जांच कर रही है, जबकि सीबीआई दाभोलकर प्रकरण की तहकीकात कर रही है।

खंडपीठ ने रिपोर्ट पर गौर करने के बाद पाया कि पानसरे मामले में फरार आरोपियों की तलाश के लिए पुलिस सिर्फ आरोपियों के रिश्तेदारों से पूछताछ कर रही है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि एसआईटी इस बात को समझे की पानसरे हत्या मामले को चार साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है। ऐसे में इस बात की संभावना बहुत कम है कि आरोपी महाराष्ट्र में होंगे। वे देश के दूसरे हिस्से में जाकर भी रह सकते हैं। आरोपी की सिर्फ पुणे में अचल संपत्ति है, इसका मतलब वह यहां आएगा इसकी संभावना कम ही है। वह देश के किसी भी कोने में जा सकता है। फिर भी पुलिस आरोपी के रिश्तेदारों से पूछताछ कर रही है।

कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा यह कोई हिंदी फिल्म नहीं
हाईकोर्ट ने कहा जांच का यह तरीका जगहंसाई व उपहास का पात्र बनाने वाला है। पुलिस की निष्क्रियता के चलते जनता के मन में यह धारणा बनती है अपराध करके बचा जा सकता है। यह मामला कोई हिंदी फिल्म नहीं है। जैसे फिल्मों में पुलिस घटना के बाद घटना स्थल पर पहुंचती है। वह ऐसे मामले में मूकदर्शक नहीं रह सकती।

महाराष्ट्र जैसे प्रगतिशील राज्य को अपने यहां के विचारकों, तर्कवादियों व लेखकों पर गर्व करना चाहिए। इस दौरान खंडपीठ ने पानसरे मामले की जांच कर रहे आईपीएस अधिकारी टी. काकडे को भी कड़ी फकार लगाई। गौरतलब है कि साल 2013 में पुणे में सामाजिक कार्यकर्ता दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जबकि 16 फरवरी 2015 को कोल्हापुर में पानसरे की गोली मारकर हत्या की गई थी।

पीठ ने नरेंद्र दाभोलकर की 2013 की हत्या की जांच कर रही केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को भी निर्देश दिया कि वह बिना और देरी के अपनी जांच को ख़त्म करे। सीबीआई ने 14 मार्च को अदालत के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत किया कि दाभोलकर मामले में हमलावरों को गिरफ्तार किया गया था, चिन्हित किया गया था और आरोप पत्र दायर किया गया था, इसके लिए कुछ अतिरिक्त मुद्दों की जांच के लिए कुछ समय की आवश्यकता थी, जैसे कि हथियार और आरोपी द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियार की जांच।

सीबीआई और राज्य सीआईडी दाभोलकर और पानसरे की हत्याओं की जांच कर रहे हैं। पानसरे को 16 फरवरी 2015 को कोल्हापुर में गोली मार दी गई थी. उन्होंने 20 फरवरी को अस्पताल में दम तोड़ दिया था। दाभोलकर की पुणे में 20 अगस्त 2013 को सुबह की सैर के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

चार हत्या में एक लिंक पर एक ही एजेंसी जांच करे
इसके पहले दिसम्बर 18 में सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, पत्रकार गौरी लंकेश और तर्कवादी एम. एम. कलबुर्गी की हत्या केस की जांच पर उच्चतम न्यायालय की जस्टिस उदय यू ललित और जस्टिस नवीन सिन्हा की पीठ ने अहम निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यदि इन चारों ही हत्या में एक लिंक है तो एक ही एजेंसी सभी हत्याकांड की जांच कर सकती है।

इससे पहले 26 नवंबर को उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक सरकार की खिंचाई की थी और कहा था कि वह जांच में कुछ नहीं, बस दिखावा कर रही है। साथ ही न्यायालय ने संकेत दिया था कि वह मामले को बॉम्बे उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर सकती है।

प्रख्तात शिक्षाविद और तर्कवादी कलबुर्गी की 30 अगस्त, 2015 को धारवाड़ में हत्या कर दी गई थी, जबकि सामाजिक कार्यकर्ता पानसरे की भी उसी साल 16 फरवरी को हत्या की गई थी। पत्रकार गौरी लंकेश की पांच सितंबर, 2017 को बेंगलुरु में हत्या की गई, जबकि एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता और तर्कवादी दाभोलकर को 20 अगस्त, 2013 को मौत के घाट उतार दिया गया था।


जन पत्रकारिता को सहयोग दें / Support people journalism


Facebook Comment