मनु और अन्य ब्राह्मण धर्मग्रंथों ने स्त्रियों की पूरी तरह मूक पशु में बदल दिया, मनु का तो आदेश है पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को स्त्रियों को चौबीस घंटे नियंत्रण में रखना चाहिए, क्योंकि उन्हें कैसा भी पुरुष मिले वे उसके साथ भोगरत हो जाती हैं….

ब्राह्मणवाद और मनुवाद स्त्रियों के सबसे बड़े दुश्मन किस तरह हैं, पढ़िए युवा दलित चिंतक रामू सिद्धार्थ का विश्लेषण

आंबेडकर का मानना है कि हिंदू महिलाओं की दासता, दोयम दर्जे की स्थिति और गरिमाहीन अपमानजनक जीवन के लिए ब्राह्मणवाद जिम्मेवार है।

कोई पूछ सकता है कि हिंदू कहां महिलाएं कहां दोयम दर्जे की स्थिति में हैं, इसका जवाब भारतीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत केवल इस आंकड़े के आधार पर दिया जा सकता है कि 6 करोड़ 30 लाख लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर दी गई, लड़के की चाह में। इतना ही नहीं 2 करोड़ 10 लाख ऐसा लड़कियों ने जन्म लिया, जिन्हें उनके माता-पिता जन्म नहीं देना चाहते थे।

इतना बड़ा जनसंहार जैसा कुकृत्य और चारों ओर शान्ति, जैसे कोई खास बात न हो। अधिकांश हिंदुओं के लिए यह कोई खास बात है भी नहीं, क्योंकि उनकी नस-नस में पुरुष की श्रेष्ठता और स्त्री के दोयम दर्जे का प्राणी होने का विचार भरा हुआ है।

महिलाओं के प्रति हिंदुओं के नजरिये का सबसे गहन और व्यापक अध्ययन डॉ. आंबेडकर ने किया है। 24 वर्ष की उम्र में 1916 में अपना पहला निबंध ‘भारत में जातियां : उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ ( कॉस्ट इन इंडिया: देयर मैकेनिज्म, जेनेसिस एंड डेवलपमेंट) शीर्षक से कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया था।

इस निबंध में उन्होंने यह स्थापित किया था कि जाति को बनाये रखने की अनिवार्य शर्त यह है कि स्त्रियों की यौनिकता पर पूर्ण नियंत्रण कायम किया जाय। इसके लिए जरूरी था कि स्त्रियों को पूरी तरह पुरूषों की अधीनता में रखा जाय। इस निबंध में आंबेडकर ने लिखा है कि सजातीय विवाह की व्यवस्था के बिना जाति की रक्षा नहीं की जा सकती है, इसीलिए जाति से बाहर विवाह पर कठोर प्रतिबंध लगाया गया। विशेषकर प्रतिलोम विवाह के संदर्भ में।

सती प्रथा, विधवा प्रथा और बाल विवाह जैसी क्रूर प्रथाओं के जन्म के पीछे भी मुख्य वजह जाति की शुद्धता की रक्षा थी। जो कोई भी भारत में स्त्रियों के दोयम दर्जे के स्थिति को समझा चाहता है, उसका प्रस्थान बिन्दु यही निबंध हो सकता है।
आंबेडकर अपने इस निबंध में यह स्थापित करते हैं कि जाति और स्त्री पर पुरूष का प्रभुत्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

आगे चलकर आंबेडकर ने इस विषय पर एक मुकम्मिल किताब लिखी कि भारत में महिलाओं की दासता और दोयम दर्जे की स्थिति के लिए ब्राह्मणवाद ही जिम्मेदार है। उस किताब का नाम है- ‘हिंदू नारी उत्थान और पतन’। इस किताब विस्तार से आंबेडकर ने ब्राह्मणवादी शास्त्रों को उद्धृत करके बताते हैं कि कैसे हिंदू धर्मशास्त्र स्त्रियों की दासता और गरिमाहीन अपमानजनक स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं।

इस किताब में आंबेडकर लिखते हैं कि “भारतीय इतिहास इस बात को निर्विवाद रूप से सिद्ध कर देता है कि एक ऐसा युग था, जिसमें स्त्रियां सम्मान की दृष्टि से देखी जाती थीं।….जनक और सुलभा, याज्ञवल्क्य और गार्गी, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी आदि के संवाद यह दर्शाते हैं कि मनुस्मृति से पहले के युग में स्त्रियां ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में उच्चतम शिखर पर पहुंच चुकी थीं।

मनु और अन्य ब्राह्मण धर्मग्रंथों ने स्त्रियों की पूरी तरह मूक पशु में बदल दिया। मनु का आदेश है कि पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को स्त्रियों को चौबीस घंटे नियंत्रण में रखना चाहिए-
अस्वतंत्रा: स्त्रिया : कार्या: पुरूषौ: स्वैर्दिवनिशम्।
विषयेषु च सज्ज्न्त्य: संस्थाप्यात्मनों वशे।। (9,2)

तुलसी दास भी कहते हैं कि नारी स्वतंत्र होकर बिगड़ जाती है- ‘जिमि स्वतंत्र होई,बिगरहि नारी”

मनु स्त्रियों से इस कदर अविश्वास करते हैं, घृणा करते हैं कि वे लिखते हैं – “पुरुषों में स्त्रियां न तो रूप का विचार करती हैं, न उसकी आयु की परवाह करती हैं। सुरूप हो या कुरूप, जैसा भी पुरुष मिल जाय, उसी के साथ भोगरत हो जाती हैं।” (मनु, 9,14)।

यह कोई आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। राम सीता के चरित्र पर विश्वास नहीं करते हैं और सीता से कहते हैं कि रावण ने अवश्य ही तुम्हारे साथ शारीरिक संबंध बनाया होगा (इसके विस्तार के लिए बाल्मिकि रामायण का उत्तरकांड देख लें।)।

‘हिंदू नारी उत्थान और पतन शीर्षक’ अपनी इसी किताब में आंबेडकर यह भी प्रमाणों के साथ स्थापित करते हैं कि बौद्ध धम्म में स्त्रियों को समानता का अधिकार प्राप्त था। इसके लिए वे थेरी गाथों का उद्धरण देते हैं और अन्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

डॉ. आंबेडकर ने हिंदू स्त्रियों को ब्राह्मणवादी व्यवस्था और विचारधारा के चंगुल से मु्क्त कराने के लिए हिंदू कोड बिल पेश किया, जिसमें यह प्रावधान था कि कोई भी लड़की या लड़का यदि वयस्क है तो वह अपनी मर्जी से बिना अपने माता-पिता की इजाजत के किसी भी जाति में जाति कर सकता है। इस बिल में उन्होंने महिलाओं को तलाक और संपत्ति में हिस्दारी का भी प्रावधान किया था।

इस बिल को विरोध में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंन्द्र प्रसाद, सरदार बल्लभभाई पटेल, संघ परिवार और उसके संगठन सभी एकजुट हो गए और कहने लगे, लेकिन इससे तो हिंदुओं की सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी, हिंदू संस्कृति का विनाश हो जायेगा। नेहरू भी पीछे हट गए। आखिर आंबेडकर ने निराश होकर विधि मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

1916 के अपने पहले निबंध से लेकर हिंदू कोड बिल पेश करते समय तक डॉ. आंबेडकर, महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए लड़ते रहे। उनका यह मानना पूरी तरह सही था कि जैसे जाति के विनाश के साथ ही स्त्री मुक्ति का रास्ता पूरी तरह साफ होता है और इसके लिए ब्राह्मणवाद से पूरी तरह से मुक्ति अनिवार्य है। जाति और स्त्री की मुक्ति का प्रश्न एक दूसरे से जुड़ा है, यह सीख डॉ.आंबेडकर को अपने गुरु ज्योतिबाराव फुले से भी मिली थी।

वर्तमान समय में बहुत सारी महिला अध्येता फुले और आंबेडकर के विचारों के आलोक में भारतीय पितृसत्ता को ब्राह्मणवादी पितृसत्ता कहने लगी हैं। इनमें उमा चक्रवर्ती और शर्मिला रेगे जैसी अध्येता शामिल हैं। इस विषय पर शर्मिला रेगे की किताब ‘मनु का पागलपन’ (मैडनेस ऑफ मनु) जरूर पढ़नी चाहिए।

(रामू सिद्धार्थ फॉरवर्ड प्रेस पत्रिका से जुड़े हुए हैं और दलित मसलों पर सक्रिय लेखन कर रहे हैं।)


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