file photo

जन्म के आधार पर नीच माने गये लोग श्रेष्ठ और निकृष्ठ होने के ब्राह्मणवादी मानदण्डों को खारिज करने बजाय उसी में अपने लिए श्रेष्ठ स्थान की तलाश में लगे रहे….

राकेश कुमार गुप्ता, अधिवक्ता

भारतीय समाज के संदर्भ में जब भी पिछड़ेपन की बात की जाती है तो उसका मुख्य आधार वर्ण व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था में देखा जाता है। उक्त व्यवस्था को जाति-धर्म या ब्राह्मण धर्म का भी नाम दिया जाता रहा है जो हिन्दू धर्म के नाम से अब ज्यादा लोकप्रिय हो गया है।

मगर इस जाति व्यवस्था की व्याप्ति हिन्दू धर्म से इतर अन्य धर्मों के अनुयायियों में भी रही है यथा भारत में इस्लाम, इसाई या सिख धर्मों को मानने वाले लोग भी अपने भीतर जातियों के विभाजन के कारण उपरोक्त ब्राह्मणवाद के शिकार रहे हैं।

ब्राह्मण धर्म या ब्राह्मणवाद की सर्वप्रमुख विशेषता है- जन्म के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या निकृष्ट मान लेना और जाति के हिसाब से पेशों का वर्गीकरण। यह जाति व्यवस्था सर्वथा अपरिवर्तनीय रही है। यानि यहाॅं अपना धर्म तो कोई बदल सकता है, परन्तु जाति नहीं बदल सकता। इस प्रकार एक बार यदि कोई ‘नीच कुल’ या जाति में पैदा हो गया तो सदा सर्वदा वह ’नीच’ ही बना रहेगा और जो ‘ऊँचे कुल’ में पैदा हो गया उसके क्या कहने। उसके लिए ‘पुजऊँ विप्र सकल गुन-हीना’ है ही।

इस जाति व्यवस्था के भीतर एक गुॅंजाइश हमेशा से ही रही है कि ‘नीच जाति’ वाले अपने को ‘ऊँची जाति’ में शामिल करा सके। इसके लिए दो मार्ग रहे हैं। पहला, चोरों की तरह से सेंधमारी करके अपनी फर्जी वंशावलियां बनवाकर स्वयं को किसी उच्च कुल का साबित करना तथा इसकी मान्यता प्राप्त करना, जो देने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण को था। ब्राह्मण ने यह विशेषाधिकार सिर्फ राजाओं के लिए सुरक्षित कर रखा था। यदि निम्न जाति का कोई व्यक्ति अपने पराक्रम से राजसत्ता पर अधिकार कर लेता था तो उससे भारी रिश्वत लेकर ब्राह्मण उसे ‘क्षत्रिय’ बनाता था।

इसका अद्यतन उदाहरण छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक में देखा जा सकता है। जबकि वाराणसी के एक भट्ट ब्राह्मण ने ढाई मन सोना रिश्वत लेकर शिवाजी को ‘छत्रपति’ की उपाधि से विभूषित किया था। फिर भी उस ब्राह्मण का श्रेष्ठता भाव इतना गहरा था कि शिवाजी का तिलक उसने अपने बांये पैर के अंगूठे से किया। इस प्रक्रिया में सिर्फ वह परिवार उच्च जाति का हिस्सा होता रहा है जो राज परिवार का हिस्सा रहा है। यह अनायास नहीं है कि समय के साथ राजपूत (यानी कि राजा का पुत्र) शब्द ‘क्षत्रिय’ के पर्याय के रूप में स्वीकार किया जाने लगा।

दूसरा मार्ग रहा है अपनी पूरी की पूरी जाति का ही उत्थान करके जाति व्यवस्था में अपनी पूरी जाति को उच्च स्थान दिलाना और द्विजों को उच्च स्थान दिलाना और द्विजों की श्रेणी में शामिल होने का प्रयास करना।

इस मार्ग का अनुसरण कर उच्च जातियों की श्रेणी में शामिल होने का अद्यतन उदाहरण यहाॅं पर उल्लेखनीय हैं- कायस्थ जाति का है। ऐतिहासिक रूप से यह जाति ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य किसी वर्ण का हिस्सा नहीं रही है। यानी कि यह जाति निश्चित रूप से ‘शूद्र’ वर्ण का हिस्सा रही है।

मगर जब शूद्रों के लिए वर्जित रही ‘शिक्षा’ को प्राप्त कर पाने का मार्ग कायस्थों के लिए प्रशस्त हुआ तब धीरे-धीरे इस समूची जाति का उत्थान होने लगा। परन्तु इस जाति के लोगों में भी अपनी श्रेष्ठता की तलाश उसी ब्राह्मणवादी दायरे में ही थी और अपने लिए यह परिचय तैयार किया कि ‘कायस्थ हिन्दुस्तान में रहने वाले सवर्ण हिन्दू ‘चित्रगुप्त’ वंशी क्षत्रिय है।’ कायस्थ यह सोचकर गर्व का अनुभव करता है कि ब्राह्मण को भी ‘श्री अथाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय नमः’ कहना पड़ता है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि जन्म के आधार पर नीच माने गये लोग श्रेष्ठ और निकृष्ठ होने के ब्राह्मणवादी मानदण्डों को खारिज करने बजाय उसी में अपने लिए श्रेष्ठ स्थान की तलाश में लगे रहे।

स्वयं के लिए श्रेष्ठता की इस तलाश में यह आवश्यक था कि ऐसे लोग ऐतिहासिकता और तार्किकता को खारिज करके पौराणिक आख्यानों के ’श्रेष्ठों’ मे से किसी एक का स्वयं को वंशज साबित करें।

इसके लिए यह आवश्यक था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुरूप श्रेष्ठता के मूल्य के रूप में ‘परजीविता’ और ‘हरामखोरी’ को स्थापित करें। शोषक चरित्र और आततायीपन को गौरवान्वित करें तथा श्रम की महत्ता को खारिज करें, क्योंकि वे समस्त व्यवसाय जो मूलतः श्रम, कौशल एवं सेवा से जुड़े हुए थें, तथा समस्त उत्पादन का कारण थे, उन्हें निम्न मानते हुए उससे जुड़ी जातियों को नीच जाति, नान्ह, या शूद्र और अन्त्यज कहा गया। इस अर्थ में समाज में जो अन्नदाता और पालनहार था उसे ही निकृष्ट मान लिया गया।

आज के समय में जो जातियां पिछड़े वर्ग में शुमार की जाती हैं, ऐतिहासिक रूप से मनुवादी व्यवस्था के भीतर उनका स्थान शूद्र या अन्त्यज का रहा है। वर्ण-व्यवस्था एवं उससे उद्भूत जाति-व्यवस्था में श्रेष्ठता का मानदण्ड गैरतार्किक, गैर वैज्ञानिक एवं अमानवीय था।

पिछले कुछ दशकों में पिछड़ी जातियों में जबरदस्त उभार देखा गया है। उनमें से अन्त्यजों ने तो डाॅ. भीमराम अम्बेडकर के प्रभाव के कारण ब्राह्मण धर्म से स्वयं को मुक्त करके अन्य मार्ग अपना लिया है। परन्तु अन्य पिछड़ी जातियों या शूद्रों ने अभी भी अपने लिए ऊँचता और नीचता की इस व्यवस्था में स्वयं को किसी पौराणिक श्रेष्ठ का वंशज बताते हुए अपने लिए ‘महान’ होने का मार्ग चुना है। जो अपने किसी पौराणिक ’महान’ से नहीं जोड़ पा रहे हैं वे प्राचीन भारत के किसी ऐतिहासिक महान को अपनी जाति का साबित करने में अपनी समस्त शक्ति झोंक दे रहे हैं।

कई दलित बुद्धिजीवियों यह आरोप सही ही है कि, ‘शूद्र अपने को शूद्र नहीं मानते हैं।’ कुछ उदाहरण यहाॅं उल्लेखनीय हैं- जिस लुहार का हथौड़ा श्रमिक वर्ग का प्रतीक माना जाता है, उस लोहार जाति के लोगों ने स्वयं को ‘विश्वकर्मा’ को वंशज बताते हुए ब्राह्मण घोषित कर दिया और शर्मा और विश्वकर्मा की उपाधियाँ धारण करने लगे और इस प्रकार स्वयं को द्विजों में शामिल करने का जी-तोड़ यत्न करते हुए कुछ ने तो यज्ञोपवीत भी धारण करना शुरू कर दिया।

इसी प्रकार कुम्हार जो श्रम और कला की प्रतिमूर्ति है, ने स्वयं को दक्ष प्रजापति से जोड़ते हुए ‘प्रजापति’ की उपाधि धारण कर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने में लगे हुए हैं। कोइरी जाति के लोगों ने स्वयं को चन्द्रगुप्त मौर्य से जोड़ते हुए मौर्य उपाधि धारण कर स्वयं को मौर्य वंशीय क्षत्रिय घोषित कर दिया है।

सामान्य जनश्रुति में जिन तेलियों का मुंह देखना भी पाप समझा जाता है, वह भी गुप्त, साहू, सिंह राठौर, राठौर, मोदी, शाह, धावडे़ इत्यादि उपाधियाॅं धारण करते हुए स्वयं को क्षत्रिय या वैश्य साबित करने में लगा हुआ है। इस पूरी प्रक्रिया में अहीर या यादव जाति के लोगों को नही भुलाया जा सकता, जिन्होंने स्वयं को कृष्ण का वंशज बताते हुए यदुवंशी क्षत्रिय होने का दावा किया है। जबकि महाभारत की ही कथा के अनुसार कृष्ण के जीवनकाल में ही गांधारी के शाप के कारण समस्त यदु वंश का ही नाश हो गया था।

इन शूद्रों की इस महानता की यात्रा ने हमारे समाज में निम्नलिखित प्रकार के संकट उत्पन्न किये हैं :

1- ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता के मानदण्डों पर स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की चाह ने अभी भी हमारे समाज में बड़े आदमियत या महानता के लिए परजीविता, हरामखोरी और आततायीपन को ही श्रेष्ठ मूल्य के रूप में संजो रखा है।
2- अभी भी श्रम, कौशल एवं सेवा को कमतर या निकृष्ट समझे जाने के कारण इनकी महत्ता समाज में श्रेष्ठ मूल्य के रूप में नहीं हो पा रही है।
3- श्रम, कौशल और सेवा से जुड़े लोग भी उन्हीं मूल्यों को स्वीकार करने के कारण स्वयं में जातीय हीनता बोध से ग्रस्त हैं।

इन्हीं परिस्थितियों के अन्तर्गत होने वाला आधुनिक विकास भी अनेक असाध्य व्याधियों से ग्रस्त है। जैसे कि आज के समाज में श्रेष्ठ होने के लिए सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी, न्यायधीश, वकील, प्रोफेसर, डाक्टर होना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उसके साथ उसकी जातीय पहचान भी अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है और उसी जातीय पहचान के कारण भी वह अपने को श्रेष्ठ या निकृष्ट मानने लगता है तथा समाज में दूसरे लोग भी उसके साथ वैसा ही आचरण करने का यत्न करते हैं।

यह पूरी प्रक्रिया एक साथ कई संक्रामक और असाध्य रोगों को जन्म देती है, जो समाज को एक लोकतांत्रिक या जनवादी समाज बनने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आ रही है। ऐसी परिस्थिति हमारे समाज के बहुलांश का न्यूनतम मानवाधिकार भी सुरक्षित नहीं है।

यह हीनता बोध इस हद तक है कि इनमें से कई जातियों के लोग स्वयं की जाति बताने में भी अपमान का अनुभव करते हैं तथा यदि कोई उनकी जाति पूछ ले तो भय और शर्म के कारण उससे बचने का यत्न करते हैं। यह दिमागी गुलामी और जकड़न आज इस समुदाय और सही अर्थाें में पूरे समाज को ही एक सामान्य मानवीय जीवन से वंचित कर रहा है। यह वंचना असह्य एवं पीड़ादायी है। इस पीड़ा से पूरा समाज कराह रहा है, फर्क सिर्फ महसूस करने के स्तरों में है।

इस असह्य पीड़ा से मुक्त होने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिए-
1- श्रेष्ठता के ब्राह्मणवादी मानदण्डों को खारिज कर नये मानदण्डों की स्थापना जिसमें श्रेष्ठता के मूल्य रूप में श्रम, कौशल और सेवा को स्थापित किया जाय।
2- परजीविता, हरामखोरी एवं आततायीपन को निकृष्टतम मूल्य मानते हुए उसका तिरस्कार किया जाय।
3- पिछड़ी जातियों के लोग अपनी छदम महानता की यात्रा से बाहर निकल सच्ची महानता की ओर अग्रसर हो और ऐतिहासिक रूप से उत्पादकों, श्रमिकों, कुशलों और सेवकों का वंशज होने के नाते स्वयं के समस्त समाज का अन्नदाता होने का गर्व अनुभव करें।
4- जाति-व्यवस्था की अतार्किकता, अवैज्ञानिकता औार अमानवीयता से बाहर निकल ‘जाति तोड़ो-देश जोड़ो’ के नारे के स्वीकार कर एक सच्ची सामाजिकता और राष्ट्रीयता के विकास में स्वयं को अग्रसर करें।
5- अंतरजातीय विवाहों से प्रारम्भ करते हुए जाति प्रथा के समूल नाश की ओर अग्रसर हों।
6- स्वयं के लिए श्रेष्ठतम जनवादी या लोकतान्त्रिक मूल्यों को अभीष्ट मानते हुए उसे अपने आत्मिक जीवन का आदर्श माने।

अंत में निष्कर्षतः ‘हम जाति से जमात और जमात से जनतंत्र’ की यात्रा में आगे बढ़े। सभी प्रकार के जातीय हीनता या श्रेष्ठता के बोध से मुक्त होते हुए एक जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए आगे बढ़े।

श्रेष्ठतम मूल्य के रूप में श्रमजीविता, जनवाद और मानवीयता को स्थापित करें।

(राकेश कुमार गुप्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकील और जनज्वार के विधि सलाहकार हैं।)


जन पत्रकारिता को सहयोग दें / Support people journalism


Facebook Comment