कम्युनिस्ट जब बुर्के, पगड़ी, दाढ़ी, साड़ी, सिन्दूर, छठ, हज आदि जैसे पाखंडों के पक्ष में खड़े होते हैं तो आश्चर्य होता है…

शमशाद इलाही शम्स

बुर्कों की जली थी होली उज़्बेकिस्तान में

बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में सोवियत संघ के मुखिया रहे कामरेड स्टालिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने 1920 के मध्य एशियाई गणराज्यों में बुर्के के खिलाफ एक जन आन्दोलन चलाया था, जिसका नाम था हुजूम ‘खुदजुम।’

बोल्शेविक पार्टी परदे या बुर्के को पितृसत्ता के दमन, अज्ञानता और पिछड़ेपन का एक रूप मानते थे। लेनिन की पत्नी और बोल्शेविक पार्टी की नेता क्रुप्स्काया और क्लारा जेटकिन जैसी मार्क्सवादी चिंतकों ने कम्युनिस्ट पार्टी की महिला इकाई में जो विचारधारात्मक बहसों को ‘जिनोदेल’ जैसे मंचो पर अंजाम दिया था, ‘हुजूम’ उन्हीं विचारों को ज़मीन पर उतारने का एक कार्यक्रम था।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च 1927 को जुलूस जब उज़्बेकिस्तान में पहुंचा, तब इस आन्दोलन में शिरकत करते हुए मुस्लिम महिलाओं ने उज़्बेकिस्तान के अंदिजान शहर सहित पूरे इलाके में सार्वजनिक रूप से अपने बुर्कों की होली जलाई थी। उन दिनों उज्बेकिस्तान में 10 साल की उम्र से ही लड़कियाँ सर से पैर तक बुर्के में बंद रहा करती थीं।

इस आन्दोलन की उस समय के समाज में दो तरह से प्रतिक्रियाएं हुईं।

बुर्का उतार चुकी कई महिलाओं के क़त्ल उनके रिश्तेदारों अथवा कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा कर दिए गए। दूसरे कुछ महिलायें बुर्का पहनती रहीं क्योंकि वे सोवियत विचारधारा के प्रति अपनी असहमति व्यक्त कर सकें।

शुरुआत में यह मुहीम छह महीने के लिए ही निर्धारित थी लेकिन यह मुहीम दूसरे विश्वयुद्ध तक जारी रही।

आजकल के कम्युनिस्टों को मैं जब बुर्के, पगड़ी, दाढ़ी, साड़ी, सिन्दूर, छठ, हज आदि जैसे पाखंडों के पक्ष में कहीं भी खड़ा देखता हूँ तब कामरेड स्टालिन से क्षमा मांग लेता हूँ।

(इस जानकारी को शमशाद इलाही शम्स ने फेसबुक पर शेयर किया है और फोटो क्रेडिट Great Soviet encyclopedia, New York: Macmillan, 1973 को दिया है।)


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