हमेशा से ही आंदोलन में फूट डालना शोषकों की प्राथमिक रणनीति रही है और 200 रोस्टर पर अध्यादेश के साथ ही इस बार भी अपने मकसद में कामयाब होते दिख रहे हैं…

सुशील मानव

200 रोस्टर पर अध्यादेश लाने की मोदी कैबिनेट में आज 7 मार्च को मंजूरी मिलने के बाद बहुजन समुदाय में हर्षोल्लास है। कई जगह विजय जुलूस भी निकाले जा रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 13 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर निकले सभी विज्ञापन रद्द होंगे या नहीं। इस दौरान जिन पदों को भरा गया है उनका क्या होगा? सरकार द्वारा लाया जा रहा अध्यादेश किस तारीख से लागू होगा।

गौरतलब है कि 22 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद 11 जनवरी को हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, 25 जनवरी को राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, 11 फरवरी को चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय, 25 फरवरी को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, 26 फरवरी को जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया, 28 फरवरी को बांदा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी और 1 मार्च को वीर बहादुर सिंह विश्वविद्यालय जौनपुर आदि में 13 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर भर्तियों के विज्ञापन आये हैं।

इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल ये है कि अध्यादेश की मियाद 6 महीने तक ही होती है। यदि केंद्र सरकार इस अध्यादेश को दोनों सदनों से पास नहीं करवाकर राष्ट्रपति से हस्ताक्षर नहीं करवाती तो यह कानून 6 महीने में अपने आप समाप्त हो जाता है। जाहिर है 16वीं लोकसभा की आखिरी बैठक 13 फरवरी को ही खत्म हो चुकी है। अब किसी भी दिन चुनाव की घोषणा होने के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो सकती है।

अंदेशा ये भी है कि चुनाव को ध्यान रखकर सरकार ने बहुजनों को सिर्फ सिर्फ फौरी राहत देने का भ्रम फैलाया है। संघर्ष के समय एक ऐसे मोड़ पर बहुजन समाज का सबसे उर्वर तबका अगर जीत का जश्न मनाने में डूब जाएगा तो बहुजन संघर्ष को आगे ले जाने में यह अपने आप में बहुत बड़ी बाधा साबित होगी। जबकि 5 मार्च के बंद के  कम से कम दो मुद्दों, 10 प्रतिशत सवर्ण रिजर्वेशन और आदिवासियों की बेदखली पर तो सरकार ने कान ही नहीं दिया है। जातीय जनगणना, EVM से चुनाव पर वीवीपैट की गिनती, न्यायपालिका में आरक्षण, प्रोमोशन में आरक्षण तथा आरक्षण का विस्तार जैसे मुद्दे तो अभी बहुत दूर की कौड़ी है।

यहां ध्यान देने की बात ये भी है कि 5 मार्च के देशव्यापी बंद में जो तीन मुख्य मामले थे, वे अलग-अलग समूहों समुदायों से जुड़े हुए हैं। लेकिन सरकार ने तीन मामलों में से सिर्फ एक रोस्टर मामले पर अध्यादेश लाने की बात कहकर न सिर्फ बहुजन लोगों के फोकस को डायवर्ट कर दिया, बल्कि बहुजन संघर्ष को एक तरह से अलग-थलग कर दिया है। मीडिया में भी 200 प्वाइंट रोस्टर पर सरकार के अध्यादेश लाने की खबर को हाईलाइट किया जा रहा है, ताकि बहुजन व आदिवासियों के अन्य मामलों पर लोगो का ध्यान ही न जाए।

रोस्टर मामला सिर्फ उच्च शिक्षा तक सीमित है। सरकार द्वारा दो अन्य अति महत्वपूर्ण मामलों से इसे ऊपर रखकर दलित पिछड़े और आदिवासियों की एकजुट संघर्ष को डिवाइड कर दिया गया। जबकि आदिवासी समेत कई तबकों ने इस साझा संघर्ष में एकजुटता दिखायी थी। हमेशा से ही आंदोलन में फूट डालना शोषकों की प्राथमिक रणनीति रही है और इस अध्यादेश के साथ ही वो इस बार भी अपने मकसद में कामयाब होते दिख रहे हैं।


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