Last Update On : 17 05 2018 09:16:00 PM

शेख चिल्ली की हवाई दुनिया में ही रहना है स्त्री सुरक्षा को! पाक्सो एक्ट, त्वरित न्यायालय, महिला थाना, फांसी की सजा जैसी युक्तियों के बाद सीसीटीवी के भरोसे भी…

पढ़िए पूर्व आईपीएस वीएन राय का विश्लेषण

सीसीटीवी से यौन हिंसा पर लगाम लगाने का दिल्ली सरकार का दावा बरबस ध्यान आकर्षित करता है। गैर सरकारी संगठन ‘सेव द चिल्ड्रेन’ के सर्वेक्षण ‘विंग्स 2018 : वर्ल्ड ऑफ़ इंडियाज गर्ल्स’ के हाल में जारी आंकड़ों के अनुसार देश में हर तीन में से एक किशोरी सार्वजनिक स्थानों पर यौन हिंसा के डर के साये में जीने को मजबूर होती है।

सर्वेक्षण में महाराष्ट्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, असम और मध्य प्रदेश के साथ रेप कैपिटल के नाम से कुख्यात दिल्ली-एनसीआर को भी शामिल किया गया था।

इसके बरक्स सरसरी नजर भी डालिए तो पायेंगे यौनिक हिंसा रोकने के नाम पर सरकारी पहल कम नहीं हुई हैं। वर्मा कमीशन, पाक्सो एक्ट, त्वरित न्यायालय, महिला थाना, फांसी की सजा इत्यादि भारी भरकम कवायदें ही नहीं, तमाम फुटकर किस्म की व्यस्तता भी दिख जाएगी! मसलन,दिल्ली पुलिस इस बार फिर स्कूली छुट्टियों में लड़कियों के लिए आत्मरक्षा के वार्षिक जूडो-कराते अभ्यास आयोजित कर रही है। वर्षों से वे यह दिलचस्प कवायद करते आ रहे हैं, हालाँकि यौनिक हिंसा पर इसके किसी असर से बेखबर।

इस बीच सर्वोच्च न्यायालय ने छह माह में पाक्सो ट्रायल समाप्त करने के निर्देश जारी कर दिए, जबकि मोदी सरकार बारह वर्ष से कम पीड़ित के मामले में फांसी की सजा का संशोधित प्रावधान लेकर आ गयी। इसी क्रम में, दिल्ली की निर्वाचित केजरीवाल सरकार और मोदी सरकार के थोपे हुए उप राज्यपाल के बीच, सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी लगाने में हो रही देरी को लेकर परस्पर दोषारोपण का सिलसिला तूल पकड़ गया है।

स्त्री सुरक्षा के नाम पर मुख्यमंत्री को धरने पर बैठे देखना और उप राज्यपाल को जवाब में नियमित प्रेस विज्ञप्तियां जारी करना, रोज-रोज नहीं होता। बेशक इनका नतीजा टांय-टांय फिस्स ही क्यों न हो।

विसंगति देखिये कि करीब अठारह सौ करोड़ के खर्च से प्रस्तावित दिल्ली सरकार की सीसीटीवी योजना में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो यौन हिंसा की रोकथाम में सहायक हो।हाँ, अपने मौजूदा स्वरूप में, कुछ हद तक, सीसीटीवी का जाल यौन हिंसा के बाद पुलिस की छानबीन में अवश्य सहायक हो सकता है। यानी सीसीटीवी के बाद भी, यौन हिंसा की आवृत्ति और असुरक्षा की आशंका ज्यों की त्यों बनी रहेगी।

पाक्सो एक्ट 2012, त्वरित न्यायालय, महिला थाना और फांसी की सजा जैसे प्रावधानों में भी संभावित यौन हिंसा से बचाव का पहलू नदारद रहा है। पाक्सो एक्ट का पूरा नाम प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ओफेंसेज है। लेकिन यह एक्ट भी अपराध होने के बाद ही गति पकड़ सकता है। लिहाजा, इसकी मार्फत प्रोटेक्शन हो पाने का यानी यौन हिंसा से बचाव का सवाल कहाँ से पैदा होगा भला?

इसी तरह, त्वरित न्यायालय और फांसी की सजा भी पीड़ित के बचाव के उपाय नहीं, अपराधी को दंड थमाने की कवायद हुये। दुनिया में कोई अध्ययन ऐसा नहीं है जो इनका यौन अपराध की रोकथाम से कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बन्ध जोड़ पाता हो। यह भी छिपा नहीं कि अलग से महिला थाना बनाने का प्रयोग, स्त्री संवेदी पुलिस दे पाने में सरकारी नाकामी पर ढक्कन लगाना मात्र सिद्ध हुआ है।

सीसीटीवी का हश्र भी इन उपायों से भिन्न नहीं होगा। दरअसल, अपने आप में सीसीटीवी एक वीडियो रिकॉर्डिंग की युक्ति भर है, जो पीड़ित के बचाव का नहीं, अपराध के अनुसंधान का साधन होती है। केजरीवाल सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल या तो इस बुनियादी तथ्य को समझते नहीं या उनकी दिलचस्पी स्त्री सुरक्षा के नाम पर महज राजनीति करते रहने में है।

दिल्ली पुलिस को, जो उपराज्यपाल से निर्देश लेती है न कि निर्वाचित सरकार से, इस सीसीटीवी परियोजना का असली कर्ता-धर्ता होना चाहिए था, लेकिन उसके तेवर ऐसे दिखते हैं जैसे मौजूदा विवाद से कुछ लेना-देना न हो। बिजली की व्यवस्था से अंधेरी जगहों को सुरक्षित करने में उसका सरकार से सामंजस्य पत्राचार में अटका रहता है।फ़िलहाल उसे मुख्यमंत्री आवास की मीटिंग में मुख्य सचिव पर धावा बोलने जैसे चिरकुट आरोप में केजरीवाल को उलझाये रखने में व्यस्त रहना ज्यादा मुफीद आ रहा है।

क्या सीसीटीवी का इस्तेमाल यौन हिंसा से बचाव के औजार के रूप में नहीं हो सकता? इसके लिए सीसीटीवी को मुख्यतः एक रिकॉर्डिंग युक्ति से एक रियल टाइम निगरानी एवं कार्यवाही युक्ति में बदलना होगा। यह सीसीटीवी लगाने की वर्तमान लागत से सैकड़ों गुना खर्चीला उपक्रम साबित होगा। और यह खर्च निरंतर चलने वाला होगा। यूँ समझ लीजिये कि नए सिरे से एक और अपराध रोकथाम की व्यवस्था, दिल्ली पुलिस के समानान्तर खड़ी करनी होगी।

समूची दिल्ली को कवर करने के लिए तो लाखों सीसीटीवी कैमरे चाहिए। आइये, केवल चालीस हजार कैमरों के लिए गणना करें। यदि चार कैमरों को एक व्यक्ति देखे तो दस हजार देखने वाले कर्मी प्रति शिफ्ट चाहिए। तीन शिफ्ट में चौबीस घंटे कैमरों पर नजर रखने के लिए यह संख्या होगी तीस हजार।

इनसे मिली सूचना से मौके पर पहुँच कर अपराध रोकने और तुरंत पकड़-धकड़ के लिए कम से कम एक हजार चल टीम चाहिए-मान लीजिये सौ वैन और नौ सौ मोटर साइकिल। प्रति वैन चार और प्रति मोटर साइकिल दो व्यक्ति यानी प्रति शिफ्ट बाईस सौ। तीन शिफ्ट के लिए छियासठ सौ। इस तरह हुए कुल छत्तीस हजार छह सौ व्यक्ति।

इस संख्या में एक प्रतिशत सुपरवाइजरी स्टाफ, एक प्रतिशत सपोर्ट स्टाफ और एक प्रतिशत टेक्निकल-मेन्टेनेंस स्टाफ शामिल कीजिये। मोटा-मोटा चालीस हजार का आंकड़ा। इसके ऊपर दस प्रतिशत लीव रिज़र्व भी। यानी कुल हुए चौआलिस हजार (44,000)।

इनकी ट्रेनिंग, हथियार और हाउसिंग का बंदोबस्त अलग से। दिल्ली पुलिस की मौजूदा नफरी है लगभग अस्सी हजार जिसके लिए भी ट्रेनिंग, हथियार और हाउसिंग का टोटा बना रहता है।

उपरोक्त अभी प्रस्तावित भी नहीं है। न केजरीवाल के अनुमान में और न उप राज्यपाल के ऐतराज में। अगर आज मोदी और केजरीवाल लड़ना छोड़कर यह सब कर दिखाने का बीड़ा उठा भी लें तो उनके अमले को दस वर्ष लगेगा इस व्यवस्था को जमीन पर साकार करने में। यानी शेख चिल्ली की हवाई दुनिया में ही रहना है स्त्री सुरक्षा को! पाक्सो एक्ट, त्वरित न्यायालय, महिला थाना, फांसी की सजा जैसी युक्तियों के बाद सीसीटीवी के भरोसे भी!

एक संजीदा सरकार क्या करे? सर्वप्रथम तो ऑडिट करे कि यौन हिंसा रोकने में किस युक्ति का कितना असर हो रहा है? इंदौर की एक अदालत ने 23 दिन के ट्रायल में बाल बलात्कारी हत्यारे को फांसी की सजा सुना दी। मुझे संदेह है कि यह फांसी उच्चतम न्यायालय के ‘रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर’ सिद्धांत पर खरी उतरेगी।

हिसार महिला थाना की महिला एसएचओ, जिसने अपने थाने को झूठे यौन आरोपों की आड़ में जबरन वसूली का अड्डा बना रखा था, गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार चल रही है। स्त्री के लिए सामाजिक सशक्तीकरण और संवेदी न्याय प्रणाली बहुत दूर की बाते हैं, कृपया स्त्री सुरक्षा के नाम पर सीसीटीवी जैसी दिशाहीन राजनीति तो बंद कीजिये!