Last Update On : 08 09 2018 02:27:24 PM

केन्द्रीय श्रम उपायुक्त ने भी दिया आश्वासन गर विश्वविद्यालय प्रशासन पीड़ित सुरक्षाकर्मियों का समायोजन नहीं करता है तो विश्वविद्यालय प्रशासन के ऊपर उचित कानूनी कार्यवाही की जायेगी….

गुजरात, जनज्वार। कहते हैं जहाँ चाह होती है वहाँ राह, जरूर कुछ न कुछ समाधान निकलता है। ऐसा ही कुछ हुआ गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के सामने अनशन कर रहे सत्याग्रही सुरक्षा कर्मियों के साथ, जब वे अनशन के दौरान अपनी फ़रियाद लेकर केन्द्रीय श्रम आयुक्त कार्यालय, अहमदाबाद पहुंचे तो वहाँ केन्द्रीय श्रम उप-आयुक्त मौजूद मिले।

इससे पहले भी ये सुरक्षाकर्मी राज्य स्तरीय सबंधित श्रम विभाग को पूरे मामले को लिखित रूप से अवगत कराया था, लेकिन सी. यू. जी. का एक केन्द्रीय संस्थान होने के नाते, वह उनके कार्य क्षेत्र से बाहर था इसलिए वहाँ कोई सुनवाई नहीं हो पायी थी।

लेकिन वहीं केन्द्रीय श्रम उपायुक्त ने बड़ी गंभीरता के साथ पीड़ित सुरक्षाकर्मियों के मामले को लिखित रूप से संज्ञान में लिया और उनकी मांग को जायज भी माना तथा उन्होंने भरोसा दिलवाया कि अगर विश्वविद्यालय प्रशासन पीड़ित सुरक्षाकर्मियों का समायोजन नहीं करता है तो विश्वविद्यालय प्रशासन के ऊपर उचित कानूनी कार्यवाही की जायेगी।

इसके लिए केन्द्रीय श्रम उपायुक्त की सलाह पर, एक आखिरी बार विश्वविद्यालय कुलपति को लिखित रूप से अपनी मांग को रखते हुए जिसमें 10 दिन का अल्टीमेटम देने का सुझाव दिया।

क्या है 10 दिन का अल्टीमेटम
अगर विश्वविद्यालय प्रशासन 10 दिन के भीतर इन सत्याग्रही सुरक्षाकर्मियों के समायोजन की मांग नहीं मानता तो वे आन्दोलन को और तेज करेंगे और आमरण अनशन तक के लिए जा सकते है और इसके लिए विश्वविद्यालय के गेट के सामने से अगले 10 दिनों तक के लिए अनशन को रोक दिया है।

इसके लिए अनशनकारी सुरक्षाकर्मियों ने लिखित रूप से आखिरी बार विश्वविद्यालय कुलपति के नाम से आवेदन दिया है। मगर कुलपति प्रो. एस. ए. बारी की गैर-मौजूदगी में विश्वविद्यालय के किसी स्टाफ़ ने लिखित रूप से लेने से इनकार कर दिया। कहा की वे जब सोमवार को आये तो आप लोग उन्हें ही सीधे आवेदन देना।

मगर मांगों को लेकर इस तरह से नजरअंदाज करना, प्रशासनिक अमले का एक तरह की असंवेदनशीलता एवं अमानवीयता दर्शाता है, जो बेहद दुखद: है। सभी अनशनकारी सुरक्षाकर्मियों ने डाक के माध्यम से अपना आवेदन प्रशासन को रजिस्ट्री कर दिया है और उसकी प्रतिलिपि केन्द्रीय श्रम आयुक्त कार्यालय को भी सौंप दी है।

क्यों है नई सुरक्षा कम्पनी सकते में
इससे पहले अब तक गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के मातहत सेवा प्रदान करने वाली Unique Delta Force Security Pvt. Ltd. जो नवम्बर, 2015 से 31 अगस्त, 2018 तक सेवारत रही है, वह एक नामी-गिरामी कंपनी है जो काफी बड़े स्तर पर सुरक्षा-सम्बन्धी सेवायें प्रदान करती है।

लेकिन इस बार नए टेंडर के तहत सितम्बर 2018 से विश्वविद्यालय में सुरक्षा सम्बन्धी सेवा प्रदान करने वाली कंपनी Shree Security Pvt. Ltd. बिल्कुल नई कंपनी है, जिसका नाम खुद सत्याग्रही सुरक्षाकर्मियों ने कभी सुना है।

जैसा कि श्रम आयुक्त कार्यालय से पता चला है और ऐसा माना भी जा रहा है कि यह तथाकथित नई कंपनी कानूनी रूप से रजिस्टर्ड नहीं है जो एक केन्द्रीय संस्थान अपनी सेवा दे सकने के लिए सारे नियम-कायदे पूर्ण कर सके। अगर ऐसा वाकई में है तो यह तय है कि नियमों का हेर-फेर करके या फिर, सभी नियमों को ताक़ पर रखकर यह कांट्रेक्ट देने का फैसला लिया गया होगा, जो एक तरह की भ्रष्ट्र गतिविधि की तरफ इशारा कर रहा है, गहरा सवालिया निशान खड़ा करता है। यही वजह है नई सुरक्षा कंपनी इस मसले पर बिल्कुल सन्नाटे में है।

अनशन के तीसरे दिन तो असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा ही पार हो गयी
कल तीसरे दिन सुबह, जब सभी सत्याग्रही सुबह लगभग 10:30 A.M. अनशन के लिए विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के सामने वाले लेन की दूसरी तरफ धरना स्थल पर पहुंचे तो अमानवीयता और असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा पार हो गई। कुछ अज्ञात लोगों ने, न जाने क्यों जान-बूझकर या फिर, किसी के इशारे पर धरनास्थल पर सुबह से अपनी फोर व्हीलर SUV और कारें खड़ी कर दीं, जिससे वे सभी वहाँ पर धरना न कर सकें.

इसी वजह से मजबूरन वे सभी सत्याग्रही अपना बैनर टांगकर बगल में स्थित चाय की दुकान पर बैठकर देर दोपहर बाद तक गाड़ियों के हटने का इंतज़ार करते रहे, लेकिन गाड़ियां वहां से नहीं हटाई गईं।

मगर यह सत्याग्रह जिस तरह संवैधानिक दायरे में, लोकतांत्रिक तरीके से शातिपूर्वक चल रहा है। इसका कुछ न कुछ अंजाम तक पहुंचना तय है, अगर अल्टीमेटम के भीतर इनकी बात नहीं मानी गयी तो उसके बाद फिर एक आखिरी लड़ाई जो आर-पार की होगी, जिसमें एक तरफ सुरक्षाकर्मियों के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। क्योंकि वे पहले अपनी नौकरी गवां चुके हैं। जो भी कुछ मिलेगा, वह एक लम्बे संघर्ष से हासिल होगा।

लेकिन दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन, जिसका अब तक एक असंवेदनशील, अमानवीय एवं छद्म चरित्र उजागर हुआ है जब समस्त विश्वविद्यालय समुदाय के सामने आएगा तो बचा-खुचा छद्म आभामंडल स्वत: खत्म हो जाएगा और सदैव के लिए यह विश्वविद्यालय प्रशासन नैतिकता के धरातल पर ध्वस्त हो जाएगा।