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स्त्री को केवल बोझ और भोग की वस्तु समझना बंद करें। उसको मारकर, बलात्कार करके कुछ भी हासिल न होगा। समाज बेहतर बनाने के लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी…

इस्क मास मीडिया सोल्यूशंस प्रा. लि. की ‘कपड़े नहीं सोच बदलो’ डाॅक्यूमेंटरी फिल्म औरतों के अधिकारों के हित में बनाई गई है। मुंबई निवासी निर्माता इंदरजीत सिंघ कुन्नर की ये छोटी सी कोशिश अपनी मां को समर्पित है।

कुन्नर के मुताबिक बचपन से अपनी माॅं को औरतों और बच्चियों के लिए निडरता से खड़े होते देख फिल्म बनाने की प्रेरणा ली। इस फिल्म में उठाए गये सवाल बहुत ही अहम हैं। अगर हम अपने समाज को सही दिशा देंगे, तभी आने वाली पीढ़ी एक स्वस्थ समाज को प्राप्त करेगी।

कुन्नर कहते हैं आज स्त्री समाज में कई मुश्किलों से जूझ रही है। घर-बाहर सभी जगह उसे अपमान का सामना करना पड़ता है, और इसका कारण है हमारी व्यवस्था और रूढ़ीवादी सोच। हम अपने लड़कों को उॅंचा और लड़कियों को नीचा समझते हैं। हम हर अपराध का कारण एक स्त्री को ही मानते हैं। और अंत में उसके कपड़ों का दोषी बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। उसी पीड़ा को दर्शाते हुए, उसी वेदना से इस डाॅक्यूमेंटरी फिल्म का शीर्षक ‘कपड़े नहीं सोच बदलो’ दिया गया।

समाज को इस बात से अवगत कराना होगा कि एक स्त्री को समाज में उसका मान प्राप्त हो। एक स्त्री की अपनी पहचान है और वो समाज को बेहतर बनाने में सक्षम है। स्त्री को केवल बोझ और भोग की वस्तु समझना बंद करें। उसको मारकर, बलात्कार करके कुछ भी हासिल न होगा। समाज बेहतर बनाने के लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी।

‘कपड़े नहीं सोच बदलो’ फिल्म में समाज के कई जागरूक व्यक्तियों ने हिस्सा लिया हैं। स्कूल के प्रधान-अध्यापक, समाजसेवी, राजनीतिज्ञ, धर्मिक नेता और आम नागरिक शामिल हैं। आओ हम सब मिलकर, जन-जन तक यह संदेश पहुॅंचाएं कि नारी इस समाज का हिस्सा है, और हमेशा रहेगी। आओ हम सब मिलकर एक आवाज़ में कहें ‘कपड़े नहीं सोच बदलो’।