Last Update On : 27 10 2018 09:25:09 PM

स्वामी सानंद ने प्रधानमंत्री को लिखे गए अंतिम पत्र में स्पष्ट तौर पर कहा था कि नितिन गडकरी को ना तो गंगा की समझ है और ना ही इसके प्रति कोई श्रद्धा….

पर्यावरण विश्लेषक महेंद्र पांडेय

बहुचर्चित चारधाम हाईवे पर काम फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने रोकने का आदेश सुनाया है. पर्यावरण को रौदने वाले प्रोजेक्ट में यह अग्रणी था. हिमालय के अति संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र वाले क्षेत्र में बन रहे इस हाईवे के उदघाटन के समय प्रधानमंत्री ने गडकरी को श्रवण कुमार बता दिया था.

इस तुलना ने इतना तो साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री को पौराणिक कथाओं के केवल नाम पता है, किसने क्या किया यह तो पता ही नहीं है. शायद प्रधानमंत्री को ही यह पता हो कि श्रवण कुमार ने अपने कंधे पर नहीं बल्कि हाईवे बनवाकर बड़ी कार से अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा करवाई हो.

श्रवण कुमार ने अपनी यात्रा में एक भी पेड़ काटा हो यह तो नहीं पता पर तथाकथित श्रवण कुमार के प्रोजेक्ट में आधिकारिक तौर पर 33000 से अधिक पेड़ काटे जाने हैं. प्रधानमंत्री जी, श्रवण कुमार इसलिए महान बने क्यों कि उन्होंने उस समय मौजूद संसाधनों और पगडंडियों का उपयोग कर कठिन यात्रा की, जबकि आपके तथाकथित श्रवण कुमार तो किसी भी कीमत पर हाईवे और जलमार्ग बनाना जानते हैं, चाहे पर्यावरण का कितना भी विनाश हो रहा हो. इस विनाश का संज्ञान तो अब एनजीटी और सर्वोच्च न्यायालय ने भी लिए है, और फिलहाल तथाकथित श्रवण कुमार की परियोजना पर रोक लगा दी गयी है.

चारधाम आल वेदर हाईवे प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है और इसके नाम पर वोट बटोरने के लिए मार्च 2019 तक पूरा करने का लक्ष्य था, जो शायद अब पूरा न हो पाए. कुल 889 किलोमीटर लम्बे इस हाईवे की कुल लागत 11700 करोड़ रुपये है. इसकी शुरुआत 27 दिसम्बर 2016 को प्रधानमंत्री ने किया था और नितिन गडकरी भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे.

चारधाम परियोजना में सबसे बड़ा घपला यह है कि इस पूरी परियोजना का पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन नहीं किया गया है. इस मामले में नितिन गडकरी का मंत्रालय लगातार झूठ बोलता रहा है और पर्यावरण और वन मंत्रालय हरेक झूठ पर पर्दा डालने का प्रयास करता रहा है

आधिकारिक तौर पर इस परियोजना में 33000 पेड़ काटे जाने हैं और 373 हेक्टेयर वन भूमि की जरूरत पड़ेगी. यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह पूरे परियोजना गंगा के हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, और प्रधानमंत्री नमामि गंगे का जाप करते हैं और नितिन गडकरी लगातार निर्मल और अविरल गंगा की बात करते हैं.

प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक के एस वाल्डिया ने भी इस परियोजना की आलोचना की है और इसे अनावश्यक बताया है. देश के पर्यावरण के लगभग सभी जानकारों ने इस परियोजना का विरोध किया था. गंगा के लिए अनशन करते हुए आपनी जान देने वाले स्वामी सानंद और अब तक अनशन पर बैठे स्वामी गोपाल दास भी लगातार इस परियोजना का विरोध करते रहे हैं.

इस परियोजना में सबसे बड़ा घपला यह है कि इस पूरी परियोजना का पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन नहीं किया गया है. इस मामले में नितिन गडकरी का मंत्रालय लगातार झूठ बोलता रहा है. हमेशा की तरह पर्यावरण और वन मंत्रालय हरेक झूठ पर पर्दा डालने का प्रयास करता रहा है.

दरअसल पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन की जरूरत वर्तमान हाईवे को चौड़ा करने और 100 किलोमीटर तक आगे बढ़ाने में नहीं पड़ती है. इस क्षेत्र में पहले से कुछ हाईवे थे, इसलिए सड़क परिवहन मंत्रालय ने इस पूरे परियोजना को सुविधानुसार 50 से अधिक हिस्सों में बाँट दिया जिससे पूरी परियोजना एक नहीं समझी जाए और किसी भी खंड में वर्तमान हाईवे से 100 किलोमीटर से कम दूरी बढानी पड़े.

हिमालय के अति संवेदनशील क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर घपले के बाद भी पर्यावरण मंत्रालय आँखे बंद किया बैठा रहा और प्रधानमंत्री के पर्यावरण-विरोधी सपने को पूरा करता रहा.

गडकरी जी गंगा के मामले में भी लगातार बयान बदलते रहते हैं. स्वामी सानंद की मौत के कुछ दिनों पहले उन्होंने कहा था, हमने गंगा सफाई का 80 प्रतिशत से अधिक काम कर लिया है. इस वक्तव्य का विरोध स्वामी सानंद ने और जल-पुरुष के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह ने भी किया था.

हाल में ही गडकरी जी ने कहा गंगा का लगभग 80 प्रतिशत काम मार्च 2019 तक पूरा हो जाएगा. उनके अनुसार 22000 करोड़ रुपये की लागत से कुल 227 परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमे से घाटों से सम्बंधित 151 परियोजनाएं और श्मशान घाटों से सम्बंधित 54 परियोजनाएं मार्च 2019 तक पूरी हो जायेंगी. यह सब सुनाने और पढ़ने में प्रभावी लगता है, पर जरा सोचिये घाट बनाने से गंगा कैसे निर्मल और अविरल होगी?

इस पूरे वक्तव्य से इतना तो स्पष्ट है कि गंगा सफाई के लिए वास्तविक योजना तो मात्र 22 योजनायें हैं, जो अभी पूरी नहीं होंगी. अगस्त में गडकरी जी के अनुसार गंगा के लिए कुल 221 परियोजनाएं हैं, जिनमें से 194 परियोजनाएं सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, स्वच्छता और बायोडायवर्सिटी से सम्बंधित हैं.

मार्च में उन्होंने कुल 195 परियोजनाओं का हवाला दिया था और केवल निर्मल गंगा के बारे में कहा था. उनके अनुसार अविरल गंगा का काम इसके बाद किया जाएगा. 18 सितम्बर को बागपत की एक सभा में गडकरी ने कहा था, दिसम्बर 2018 तक ही गंगा 70 से 80 प्रतिशत तक साफ़ हो जायेगी.

इस बीच में एनजीटी ने गंगा प्रदूषण पर सुनवाई करते हुए कहा, सरकार को जनता को यह बताना चाहिए कि गंगा नहाने लायक भी नहीं है. स्वामी सानंद ने प्रधानमंत्री को लिखे गए अंतिम पत्र में स्पष्ट तौर पर कहा था कि नितिन गडकरी को ना तो गंगा की समझ है और ना ही इसके प्रति कोई श्रद्धा.

स्वामी सानंद तो गंगा के लिए अनशन करते हुए मर गए, इसके बाद स्वामी गोपाल दास भी नाजुक हालत में पीजीआई चंडीगढ़ में एडमिट हैं. अब, एक युवा स्वामी, 22 वर्षीय स्वामी आत्मबोधानन्द ने प्रधानमंत्री को पत्र 24 अक्टूबर से आमरण अनशन आरम्भ करने के बारे में लिखकर सूचित किया है. एक-एक कर लोग गंगा के नाम पर जान देते रहेंगे, और (तथाकथित श्रवण कुमार) गडकरी जी लगातार अपने बयान बदलते रहेंगे. हाँ, गंगा की हालत वैसी ही रहेगी.