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क्या दिल्ली पुलिस और केन्द्रीय गृह मंत्रालय को यह जानकारी नहीं थी कि देशद्रोह के चार्जशीट को दाखिल करने के पहले दिल्ली सरकार की अनुमति जरूरी है? या केवल गोदी मीडिया द्वारा देशद्रोह का मामला उछालकर राजनीतिक गोटियाँ बिछाने के लिए दिल्ली पुलिस पर दबाव डाल बिना अनुमति के चार्जशीट दाखिल करायी गयी…

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दिल्ली सरकार की अनुमति लिए बिना ही जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) देशद्रोह मामले में चार्जशीट दाखिल करने पर दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा है कि इस मामले में चार्जशीट दाखिल करने से पहले उन्होंने नियमों और कानून के तहत केजरीवाल सरकार से इजाजत क्यों नहीं ली? अदालत ने पूछा कि क्या आपके पास लीगल डिपार्टमेंट नहीं है?

अदालत ने कहा कि जब तक दिल्ली सरकार इस मामले में चार्जशीट दाखिल करने की इजाजत नहीं दे देती है, तब तक वो इस पर संज्ञान नहीं लेंगे। कानून का दुरुपयोग को रोकने के लिए सीआरपीसी की धारा-196 में प्रावधान किया गया है कि देशद्रोह से संबंधित मामले में दर्ज मामले में पुलिस को चार्जशीट के वक्त मुकदमा चलाने के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार से संबंधित प्राधिकरण से मंजूरी लेना जरूरी है। दिल्ली पुलिस और मोदी सरकार के लिए ये एक करारा झटका है, क्योंकि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है।

दरअसल यहीं पूरे मामले का पेंच फंसा हुआ है, क्योंकि केजरीवाल सरकार की ओर से कराई गई मजिस्ट्रेट जांच में कन्हैया को क्लीनचिट मिली थी। मजिस्ट्रेटी जांच की रिपोर्ट में कहा गया था कि जेएनयू परिसर में आयोजित हुए एक विवादित कार्यक्रम में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की ओर से भारत-विरोधी नारेबाजी करने का कोई सबूत नहीं मिला है। अब ऐसे में यदि दिल्ली पुलिस केजरीवाल सरकार से चार्जशीट दाखिल करने की इजाजत मांगती तो सरकार के लिए इजाजत देना आसान नहीं होता।

पटियाला कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से यह भी पूछा कि आखिर आप दिल्ली सरकार की इजाजत के बिना चार्जशीट क्यों दाखिल करना चाहते हैं? हालांकि कोर्ट से फटकार के बाद दिल्ली पुलिस ने कहा कि वो इस मामले में 10 दिन के अंदर केजरीवाल सरकार से अनुमति ले लेगी। इसके बाद कोर्ट ने मामले की सुनवाई 6 फरवरी तक के लिए टाल दी। साथ ही कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि वो पहले इस चार्जशीट पर दिल्ली सरकार की अनुमति लेकर आएं।

दिल्ली पुलिस ने जेएनयू मामले में 14 जनवरी 2018 को 1200 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। दिल्ली पुलिस ने जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार, छात्र नेता उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को मुख्य आरोपी बनाया है। इस मामले में इन तीनों को जेल भी जाना पड़ा था। हालांकि बाद में कोर्ट से इनको जमानत मिल गई थी। इन तीनों के अलावा 7 कश्मीरी छात्रों को भी आरोपी बनाया गया है, जिनमें मुजीर (जेएनयू), मुनीर (एएमयू), उमर गुल (जामिया), बशरत अली (जामिया), रईस रसूल (बाहरी), आकिब (बाहरी) और खालिद भट (जेएनयू) शामिल हैं।

साथ ही 36 लोगों को कॉलम नंबर 12 में आरोपी बनाया गया है, जिन पर घटनास्थल पर मौजूद रहने के आरोप हैं। इन 36 आरोपियों में शेहला राशिद, अपराजिता राजा, रामा नागा, बनज्योत्सना, आशुतोष और ईशान आदि शामिल हैं। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में सबूत के तौर पर वीडियो फुटेज और 100 से ज्यादा प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पेश की है। दिल्ली सरकार ने कहा कोर्ट के इस फैसले के बाद दिल्ली सरकार ने कहा कि अभी तक जेएनयू मामले में किसी तरह के अभियोजन की इजाजत नहीं ली गई है। अगर दिल्ली पुलिस ऐसा कोई दावा करती है, तो वह पूरी तरह से झूठ बोल रही है और कुछ छिपा रही है।

राजद्रोह धारा-124 ए
कोई भी आदमी यदि देश के खिलाफ लिखकर, बोलकर, संकेत देकर या फिर अभिव्यक्ति के जरिये विद्रोह करता है या फिर नफरत फैलाता है या ऐसी कोशिश करता है तब मामले में आईपीसी की धारा-124 ए के तहत केस बनता है। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान है। वहीं, इस कानून के दायरे में स्वस्थ आलोचना नहीं आती।

दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
राजद्रोह धारा-124 ए को लेकर उच्चतम न्यायालय ने कुछ फैसले सुनाए हैं और उससे साफ होता है कि कोई भी हरकत या सरकार की आलोचनाभर से देशद्रोह का मामला नहीं बनता, बल्कि उस विद्रोह के कारण हिंसा और कानून और व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो जाए, तभी देशद्रोह का मामला बनता है।

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में राजद्रोह की कुछ ऐसी व्याख्या की है। 1962 में केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया और उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में फेडरल कोर्ट ऑफ (ब्रिटिश) इंडिया से सहमति जताई थी। उच्चतम न्यायालय ने केदारनाथ केस में व्यवस्था दी कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासन पर टिप्पणी भर से देशद्रोह का मुकदमा नहीं बनता।

उच्चतम न्यायालय ने धारा-124 ए के दायरे को सीमित करते हुए कहा था कि वैसा ऐक्ट जिसमें अव्यवस्था फैलाने या फिर कानून व व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा करने या फिर हिंसा को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति या फिर मंशा हो तभी देशद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है। उच्चतम न्यायालय की सात जजों की संवैधानिक बेंच ने अपने आदेश में कहा था कि देशद्रोह के मामले में हिंसा को बढ़ावा देने का तत्व मौजूद होना चाहिए। महज नारेबाजी राजद्रोह नहीं।

उच्चतम न्यायालय ने 1995 में बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में कहा था कि महज नारेबाजी किए जाने से राजद्रोह का मामला नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक-दो बार कुछ लोगों द्वारा कुछ नारेबाजी किए जाने पर राजद्रोह का मामला नहीं बनाता। सरकारी नौकरी करने वाले दो लोगों ने देश के खिलाफ नारेबाजी की थी और तब पंजाब में चल रहे खालिस्तान की मांग के पक्ष में नारे लगाए थे।

उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि दो लोगों द्वारा बिना कुछ और किए दो बार नारेबाजी किए जाने से देश को किसी प्रकार के खतरे का मामला नहीं बनता। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी हरकत जिससे कि देश और समुदाय के खिलाफ विद्रोह और नफरत पैदा हो, तभी देशद्रोह का मामला बनेगा।

इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सीआरपीसी की धारा-196 में प्रावधान किया गया कि देशद्रोह से संबंधित मामले में दर्ज मामले में पुलिस को चार्जशीट के वक्त मुकदमा चलाने के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार से संबंधित प्राधिकरण से मंजूरी लेना जरूरी है।

क्या सरकार, पुलिस को कानून की जानकारी नहीं
लाख टके का सवाल है कि क्या दिल्ली पुलिस और केन्द्रीय गृह मंत्रालय को यह जानकारी नहीं थी कि देशद्रोह के चार्जशीट को दाखिल करने के पहले दिल्ली सरकार की अनुमति जरूरी है? तो केवल गोदी मीडिया द्वारा देशद्रोह का मामला उछालकर राजनीतिक गोटियाँ बिछाने के लिए दिल्ली पुलिस पर दबाव डालकर बिना अनुमति के चार्जशीट दाखिल करायी गयी। यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पुलिस ने चार्जशीट तैयार करने में ही तीन साल लगा दिए और चार्जशीट अदालत में बिना अनिवार्य अनुमति के दाखिल कर दिया। आखिर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को हुई किरकिरी के लिए कौन जिम्मेदार है।


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