Last Update On : 03 11 2018 08:06:07 PM

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मांगा स्पष्टीकरण कि क्यों दी जा रही है पीलीभीत में अपराधियों को गलत तरीके से राजनीतिक पेंशन, जो गंभीर प्रकृति के आपराधिक केसों में पा चुके हैं सजा…

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपराधियों को लोकतंत्र सेनानी पेंशन देने के मामले में पीलीभीत के डीएम से स्पष्टीकरण मांगा है।ऐसे आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को सरकारी खजाने से राजनैतिक पेंशन देने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने डीएम पीलीभीत को जांच कर अपना व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने को कहा है। कोर्ट का कहना था कि गंभीर आपराधिक केसों में सजायाफ्ता लोगों को लोकतंत्र सेनानी अथवा अन्य राजनीतिक पेंशन देना उचित नहीं होगा।

यह आदेश न्यायमूर्ति ए.पी.शाही व न्यायमूर्ति अजीत कुमार की खण्डपीठ ने पीलीभीत के अशोक कुमार समसा व 21 अन्य द्वारा दायर जनहित याचिका पर दिया है। याची के अधिवक्ता का कहना था कि पीलीभीत में कई ऐसे लोगों को गलत तरीके से राजनीतिक पेंशन दी जा रही है, जो गंभीर प्रकृति के आपराधिक केसों में सजा पा चुके हैं।

कोर्ट ने ऐसे पेंशन पा रहे लोगों को भी नोटिस जारी कर उनसे जवाबी हलफनामा मांगा है तथा कहा है कि वे अपने हलफनामे में स्पष्ट करें कि उनके खिलाफ कितने केस हैं और किन-किन केसों में वे सजायाफ्ता हैं। अदालत ने डीएम पीलीभीत को भी छह सप्ताह में उनका व्यक्तित हलफनामा दायर करने को कहा है तथा यह निर्देश दिया है कि वह इस प्रकरण की जांच करने के बाद हलफनामा दाखिल करे।

आरोप है कि यहां के डीएम अखिलेश कुमार मिश्रा ने जेल में बंद 23 कैदियों को लोकतंत्र सेनानी पेंशन दे दी। हाईकोर्ट ने पूछा है कि इमर्जेंसी के दौरान राजनीतिक कैदियों को हर महीने दी जाने वाली 20,000 रुपये की पेंशन जेल में विभिन्न आपराधिक मामलों में बंद कैदियों को क्यों दी गई? हाईकोर्ट ने नोटिस जारी करके डीएम को जवाब दाखिल करने के लिए छह हफ्ते का समय दिया है।

हाईकोर्ट में यह जनहित याचिका (पीआईएल) लोकतंत्र रक्षक सेनानी संगठन द्वारा दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि जिला प्रशासन ने जेल में विभिन्न आपराधिक मामलों में बंद 23 कैदियों को गैरकानूनी ढंग से लोकतंत्र सेनानी पेंशन दी है। वर्ष 2006 में समाजवादी पार्टी ने यह पेंशन योजना शुरू की थी। 2007 में मायावती की बीएसपी सरकार ने इसे खत्म कर दिया था, लेकिन 2016 में फिर से समाजवादी पार्टी की सरकार ने यह योजना शुरू कर दी।

भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इसी साल जून में पेंशन को 15,000 से बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रतिमाह कर दिया। यह पेंशन यूपी सरकार ऐसे राजनीतिक बंदियों को देती है जिन्होंने 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए सक्रिय रूप से संघर्ष किया और आपातकाल के विरोध में डीआईआर और मीसा व अन्य धाराओं में जेल में भेजे गए।

दरअसल पीलीभीत के डीएम ने जिले में 150 लोगों को पेंशन जारी की। इनमें से 23 विभिन्न आपराधिक गतिविधियों में शामिल हैं। उन लोगों ने डीएम, सीएम और राज्यपाल सहित प्रधानमंत्री को इसका ज्ञापन दिया था। ज्ञापन में इस आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों का नाम लोकतंत्र सेनानी पेंशन की लिस्ट से हटाने को कहा गया था लेकिन उन लोगों की सुनवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा कि पीलीभीत के सीओ धर्म सिंह मर्छल ने पाया कि कई अपराधी लोकतंत्र सेनानी पेंशन ले रहे हैं। उन्होंने इस मामले में जांच कराने के लिए एसपी को 31 दिसंबर 2017 को लिखा था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

असलियत छिपाते हुए राजनीतिक बंदी होने का दावा
हुआ यह कि तत्कालीन सपा सरकार ने आपातकाल के दौरान जेल में सजा काटने वाले राजनीतिक बंदियों को जब पेंशन देने का एलान किया तो उस दौर में जेल में विभिन्न अपराधों में बंद हुए लोगों ने भी असलियत छिपाते हुए राजनीतिक बंदी होने का दावा कर दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने निर्वाचन संबंधी हाईकोर्ट का फैसला विपरीत आने के बाद विरोधियों की आवाज को दबाने के लिए 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू कर दिया था।

इस दौरान विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को घरों से पकड़कर जेलों में बंद किया था। वर्ष 2006 में उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने आपातकाल के दौरान जेलों में बंद रहे राजनीतिक बंदियों को लोकतंत्र रक्षक सेनानी का दर्जा देते हुए पांच सौ रुपये प्रतिमाह पेंशन दिए जाने की योजना लागू की थी। पेंशन के लालच में जिले में अनेक ऐसे अपराधियों ने भी लोकतंत्र सेनानी होने का दावा कर दिया जो वास्तव में विभिन्न अपराधों जैसे डकैती, हत्या, चोरी, कालाबाजारी, दुष्कर्म लिप्त होने के कारण उस दौर में जेल में बंद किए गए थे

दरअसल यह फर्जी स्वतंत्रता सेनानिओं के पेंशन घोटाले जैसा मामला है। चूंकि आपातकाल में समाजवादी और जनसंघी नेता और कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर मीसा और डीआईआर में जेलों में बंद कर दिए गये थे, इसलिए पेंशन के लाभार्थियों में सपा के साथ साथ भाजपा से भी जुड़े लोग हैं। इसलिए पेंशन योगी सरकार को भी सूट कर रहा है। लेकिन यदि प्रदेश स्तर पर इसकी व्यापक जांच करायी जाय तो बहुत बड़ी संख्या में फर्जी आपराधिक टाइप के लोग निकलेंगे, जो जनता के धन का दोहन कर रहे हैं।

बिना जांच पड़ताल पेंशन की संस्तुति
प्रशासन की चूक यह रही कि पूरी जांच पड़ताल किए बगैर लोकतंत्र रक्षक सेनानियों की सूची फाइनल कर पेंशन की संस्तुति के साथ शासन को भेज दी गई। अब जब सूची फाइनल होकर आ गई तो वास्तविक लोकतंत्र रक्षक सेनानियों ने इसको लेकर ऐतराज भी जताया। इतना ही नहीं डीएम को पच्चीस लोकतंत्र सेनानियों की सूची देकर उनकी जांच कराने का अनुरोध भी किया। यह भी कहा गया कि यह पच्चीस लोकतंत्र रक्षक सेनानी वास्तव में न तो मीसा में बंद हुए थे और न ही डीआइआर में। यह अन्य आपराधिक मुकदमों में उस समय जेल में बंद हुए थे।

बसपा ने बंद कर दी थी पेंशन
लोकतंत्र रक्षक सेनानियों की पेंशन वर्ष 2006 में सपा सरकार के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने की थी। 2007 में उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार आ जाने के बाद पेंशन बंद कर दी गई थी। 2007 से 2012 तक लोकतंत्र रक्षक सेनानियों को पेंशन नहीं दी गई थी।