दिन-ब-दिन उजड़ती जाती धरा और पूरी धरती को सड़क और शॉपिंग काम्पलेक्स में तब्दील करने पर आमादा इस दुनिया से विदा हो गए उत्तराखण्ड की धरती पर जन्म लेने वाले वृक्षमानव सकलानी

सुशील मानव 

जनज्वार। सुप्रीम कोर्ट के जज अरुण मिश्रा ने दो दिन पहले शुक्रवार 18 जनवरी को प्रदूषण पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि –दिल्ली गैस चैंबर बन गई है, अब यह रहने लायक नहीं है, रिटायरमेंट के बाद मैं दिल्ली में नहीं रहूँगा। इससे पहले वर्ष 2015 में दिल्ली हाइकोर्ट ने भी दिल्ली में रहने को गैस चैंबर में रहने जैसा बताया था।

पर्यावरण प्रत्यक्ष तौर पर न सिर्फ़ आमजन के जीवन पर प्रभाव डालता है बल्कि उनके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन स्तर को भी प्रभावित करता है। पर्यावरण संतुलन जब भी बिगड़ता है, उसकी भयावहता का दंश आमजन को ही भुगतना पड़ता है। खास लोग तो फिर भी एयर फ्रेशनर, वॉटर आरओ जैसी मशीनों को हथियार बनाकर प्रदूषण के खिलाफ़ अपनी लड़ाई लड़ लेते हैं। लेकिन गरीब वंचित तबके के लोग जिनकी जंग रोटी तक ही सिमटी है प्रदूषण की जद में सबसे ज्यादा आते हैं और तमाम लाइलाज बीमारियों से ग्रसित होकर असमय ही जान गँवाने को अभिशप्त हैं।

ये विडंबना ही है कि चिपको आंदोलन के बाद भारत में पर्यावरण या वृक्ष संरक्षण से जुड़ा कोई आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया। नर्मदा आंदोलन के मूल में पर्यावरण से ज्यादा विस्थापन के प्रश्न थे। अभी मई 2018 में तूतीकोरिन तमिलनाड़ु में स्टरलाइट कॉपर यूनिट से पर्यावरण को हो रहे नुकसान के विरोध में आंदोलन कर रहे स्थानीय लोगों पर तमिलनाड़ु पुलिस प्रशासन द्वारा असॉल्ट राइफल द्वारा निशाना लगाकार आधा दर्जन लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

लेकिन एक शख्स ऐसा भी था जो लगातार बिना किसी हो हल्ले के अपने गाँव को इस प्रदूषण से बचाये रखने के आंदोलन में लगा हुआ था। इसका नाम था विश्‍वेश्‍वर दत्‍त सकलानी। जिन्होंने- “वृक्ष माता-पिता हैं, हमारी संतान हैं, हमारे सगे साथी हैं”, का नारा दिया था। जिन्हें इस वृक्ष आंदोलन के चलते लोगों ने वृक्षमानव (ट्री-मैन) की उपाधि दे दी थी।

विश्‍वेश्‍वर दत्त सकलानी का जन्म दो जून 1922 को सकलाना पट्टी के पुजार गांव में हुआ था। बचपन से ही बाप-दादा के मुँह से पर्यावरण संरक्षण की कहानियां सुन सुनकर विश्‍वेश्‍वर दत्त प्रकृति से प्रेम करने को प्रेरित हुए। विश्वेश्वर दत्त ने अपने हाथों पहला पौधा तब रोपा था, जब वो बालक थे और उनका आयु महज 8 वर्ष थी। पौधों के कलम तैयार करने का हुनर उन्‍होंने अपने चाचा से सीखा था।

बाद में अपने प्रिय भाई के निधन के बाद हुआ तो वह घंटों गायब रहने लगे, भाई की असमय मौत की असह्य वेदना बर्दाश्त करने के बहाने से वो पौधे रोपने लगे। इस दौरान वह पूरा दिन पौधे लगाने में बिताते थे। फिर 11 जनवरी 1958 में जीवनसंगिनी शारदा देवी की असमय निधन के बाद तो जैसे उन्होंने पौधरोपण को ही अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य बना लिया। एक अनुमान के मुताबिक सकलानी ने अपनी अंतिम सांस तक 50 लाख पेड़ लगाए। विश्वेश्वर सकलानी ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था और वो जेल भी गए थे।

उन्होंने बांज, बुरांश, सेमल, देवदार का घना जंगल तैयार कर सकलाना क्षेत्र के बंजर इलाके की तस्वीर बदल दी। इसी का नतीजा है कि आज भी क्षेत्र में प्राकृतिक जल धाराएं ग्रामीणों की प्यास बुझा रही हैं। विश्वेश्वर सकलानी की दूसरी पत्‍नी ने भी उनकी इस मुहिम में उनका साथ दिया। इसके अलावा वो दोनों पर्यावरण संरक्षण को लेकर गाँव के लोगों को भी समझाते और पेड़ लगाने और उन्हें बचाने को प्रेरित करते रहते थे।

उन्होंने अपने कड़ी मेहनत और पर्यावरण संरक्षण के विचार के दम पर सकलाना घाटी की तस्वीर बदल दी। छह-सात दशक पूर्व तक यह पूरा इलाका वृक्ष विहीन था। धीरे-धीरे उन्होंने बांज, बुरांश, सेमल, भीमल और देवदार के पौधे लगाना शुरू किया। पुजार गांव में बांज, बुरांश आदि के मिश्रित सघन जंगल आज भी उनके परिश्रम की मूक गवाही देते खड़े हैं।

सन 1986 में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विश्वेश्वर सकलानी को उनकी इस अनमोल मुहिम के लिए ‘इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष-मित्र’ पुरस्कार से सम्‍मानित किया था। एक अनुमान के मुताबिक अपने समूचे जीवनकाल में इस वृक्ष-मानव ने टिहरी-गढ़वाल में करीब 50 लाख पेड़ लगाए होंगे।

18 जनवरी को उत्‍तराखंड के इस 96 वर्षीय ‘वृक्ष मानव’ का निधन हो गया। करीब 10 साल पहले उन्होंने देखने की शक्ति खो दी थी। पौधे रोपने से धूल और कीचड़ आंखों में जाता था, जिससे उन्‍हें परेशानी होने लगी थी। विश्वेश्वर सकलानी अपने पीछे चार बेटों और पांच बेटियों का परिवार छोड़ गए हैं। उनके बेटे संतोष स्‍वरूप सकलानी के मुताबिक, “वो अक्‍सर कहते थे कि उनके नौ नहीं, 50 लाख बच्‍चे हैं। उनके पिता की आत्‍मा उन्‍हीं जंगलों में रहती है, जिन्‍हें बड़ा करने में उन्‍होंने मदद की। मैं अब उन्‍हें जंगलों में तलाशा करूंगा।”

संतोष आगे बताते हैं, जिस सूरजगांव के आस-पास उन्‍होंने एक घना जंगल तैयार किया, वह तेजी से गायब होता जा रहा है। संतोष ने बताया, “दुर्भाग्‍य से, जंगल का बड़ा हिस्‍सा पिछले कुछ सालों में खत्‍म हो गया है क्‍योंकि लोगों को दूसरे कार्यों के लिए जगह चाहिए।”

वृक्षमानव सकलानी का सपना था कि प्रत्येक आदमी पेड़ों को अपने जीवन के तुल्य माने और उनकी रक्षा करे। उनका संदेश था कि जीवन के तीन महत्वपूर्ण मौकों जन्म, विवाह और मृत्यु पर एक पेड़ जरूर लगाएं।

वृक्ष विश्वेश्वर सकलानी की जिंदग़ी में इस कदर शामिल हो गए थे कि वो अपने अंतिम दिनों में बीमारी की अवस्था में भी वृक्ष वृक्ष ही कहते रहते है। बता दें कि विश्वेश्वर दत्त सकलानी काफी समय से बीमार चल रहे थे और बीमार रहते हुए भी उनके मुंह से लड़खड़ाते हुए केवल ये शब्द निकले थे…”वृक्ष मेरे माता-पिता, वृक्ष मेरी संतान, वृक्ष ही मेरे सगे साथी”।

एक तरफ लगातार सड़कों के चौड़ीकरण के नाम पर समूचे देश से करोड़ों पेड़ों को समूल काट दिया गया, दूसरी ओर तमाम अत्याधुनिक जीवन उपकरणों, यातायात कारों आदि के जरिए शहर के शहर गैस चैंबर में तब्दील कर दिए जा जा रहे हैं। एक ऐसे समय में वृक्षमानव विश्वेश्वर सकलानी का जाना समाज और पर्यावरण के लिए बहुत बड़ी क्षति है। दिन-ब-दिन उजड़ती जाती धरा और पूरी धरती को सड़क और शॉपिंग काम्पलेक्स में तब्दील करने पर आमादा इस दुनिया से विदा हो गए वृक्षमानव को मानवता और धरती का कोटि कोटि नमन।


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