प्रतीकात्मक फोटो

अमेरिका के अश्वेतों से सबक क्यों नहीं लेते भारतीय दलित

मोदी सरकार ने अपने बजट में गायों के संरक्षण के लिए 700 करोड़ रुपए आवंटित किए, जबकि दलित और आदिवासी महिलाओं की सुरक्षा के लिए पीसीआर और अत्याचार निवारण अधिनियम पर अमल करने के लिए सिर्फ 147 करोड़ रुपए…

संजय रोकड़े

भारत की सामाजिक संरचना में सबसे निचले पायदान पर जीवन बसर करने वाली अनुसूचित जाति के उत्थान के लिए अब तक किसी भी दल या सरकार ने ईमानदारी से काम नहीं किया है। अब तक जितनी भी सरकारें बनी, उन्होंने इनके साथ दोगली नीति को ही प्रमुखता में रखा।

अबकि केन्द्र की मोदी सरकार ने जिस तरह से वार्षिक बजट में दलित उत्थान के लिए राशि का आवंटन किया, इससे भी मंशा जाहिर हो जाती है। भाजपानीत मोदी सरकार दलितों की कितनी हितैषी है और सही मायने में यह सरकार उनका कितना सामाजिक, आर्थिक उत्थान चाहती है ये दलितों के लिए बजट में जारी राशि को देखकर भी अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस बार के बजट में दलित समुदाय की महिलाओं की बेहतरी के लिए जितनी राशि जारी की गई है, वह गायों के लिए जारी बजट से भी है। जिस तरह से चुनावी बजट होने के बावजूद दलित समुदाय के हित में राशि आवंटित की गई है, उससे पूरे देश के दलितों में नाराजगी पसरी हुई है।

दलितों ने 2014 में भाजपा की लोकसभा चुनाव जीत में अहम योगदान दिया था। 5 वर्षों में नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लोगों के साथ मारपीट और लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं से भी साबित होता है कि ये लोग दलित और आदिवासियों को लेकर कितनी विरोधी मानसिकता रखते हैं।

आरएसएस और उसका आनुशांगिक संगठन भाजपा दलित विरोधी है, कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। अब लोकतंत्र के इस उत्सव में एक बार फिर दलित और आदिवासियों को अपना शासक चुनने का अवसर मिला है। जो दल इस समुदाय का घोर विरोधी माना जाता है, उसे अपना मत देने से पहले सौ बार सोचना चाहिए।

बहरहाल चुनावी दौर में भाजपा ने दलितों को लुभाने के लिए बजट में टुकड़ा फेंकने का काम तो किया है, लेकिन इस दोगलेपन को समझना जरूरी है। भाजपा कभी भी दलितों का हित नहीं कर सकती है। इतिहास गवाह है कि जब जब भी जहां जहां भी भाजपा की सरकारें बनी है, तब तब वहां दलितों पर अन्याय अत्याचार बढ़े हैं। इनकी कथनी और करनी को छोटे से उदाहरण से समझना होगा।

एक तरफ तो भाजपानीत सरकारें दलित अत्याचार में रिकार्ड बनाती हैं, वहीं दूसरी तरफ ये दलित आदिवासियों की भावनाओं के साथ शोषण कर हितैषी बनने की कोशिश करते हैं। पिछले साल भाजपा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के उल्लंघन पर तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए अध्यादेश लेकर आ गई थी, वहीं केन्द्र में चुनावों को देखते हुए एससी/एसटी कल्याण मद में थोड़ा सा बजट बढ़ाकर खुद को आर्थिक विकास का पक्षधर बताने का भरसक प्रयास किया है।

अबकि मोदी सरकार ने एससी कल्याण के लिए आवंटित राशि में 35.6 फीसदी की वृद्धि करते हुए 2018—19 के 56,619 करोड़ रुपए के मुकाबले उसे 2019—20 में 76,801 करोड़ कर दिया, जबकि एसटी के लिए आवंटित राशिए जो 2018—19 में 39,135 करोड़ रुपए थी, 2019—20 में बढ़ाकर 50,086 करोड़ रुपए कर दी है।

यह लालीपॉप देकर दलित वोट साधने की कोशिश तो कि लेकिन इसका दलितों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। एससी/एसटी समुदाय के बीच में काम करने वाले सामाजिक संगठनों का भी यही मानना है कि एससी/एसटी फंड में वृद्धि दलित समुदायों के लिए अप्रासंगिक है, क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से आवंटित राशि बहुत कम है और फंड आवंटन के दिशा निर्देशों का उल्लंघन करता है।

नीति आयोग के 2017 के दिशा—निर्देशों के अनुसार एससी/एसटी के विकास के लिए आवंटित फंड उनकी आबादी के अनुपात से कम नहीं होना चाहिए, जबकि मोदी सरकार ने ऐसा ही किया है।

दलितों के बीच काम करने वाले सामाजिक संस्थान एनसीडीएचआर के अध्ययन के मुताबिक पिछले पांच बजटों में एससी कल्याण कोषों के लिए आवंटित राशि में कुल 2,75,772 करोड़ रुपए की कमी कर दी गई है। दलितों के खिलाफ हिंसा में वृद्धि के बावजूद नागरिक अधिकारों के संरक्षण के अधिनियम 1995 और अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 को लागू करने की मशीनरी को मजबूत करने के लिए बजट में 2018 के 404 करोड़ रुपए के मुकाबले मामूली बढ़त के साथ 490 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।

सामाजिक न्याय मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 31 जनवरी तक एडब्ल्यूएससी फंड का करीब 52 फीसदी यानी 29,912 करोड़ रुपए ही मंजूर किए। हालाकि एसटी मद में थोड़ा बेहतर प्रदर्शन दिखा है। बेशक इस बजट के कुल आवंटन में थोड़ी वृद्धि हुई है, पर मैट्रिक बाद मिलने वाली छात्रवृत्ति जैसी अहम योजनाओं के लिए तो राशि घटा ही दी है। बहरहाल इस बजट में बड़ी बड़ी राशियां तो हैं, पर गहराई नहीं।

अगर इस बजट में सरकार की प्राथमिकताओं की तरफ नजरे इनायत करें तो पायेगें कि गायों के संरक्षण के लिए 700 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जबकि दलित और आदिवासी महिलाओं की सुरक्षा के लिए पीसीआर और अत्याचार निवारण अधिनियम पर अमल करने के लिए सिर्फ 147 करोड़ रुपए रखे गए हैं। ऐसी स्थिति में अजा/जजा वर्ग को स्वयं समझना होगा कि उसका सामाजिक और आर्थिक उत्थान कौन चाहता है।

फिर ऐसी स्थिति में क्या करना होगा यह एक विचारणीय प्रश्र है। क्या कोई खुद की राजनीतिक ताकत खड़ी करनी होगी या जो राजनीतिक ताकतें हैं, उन पर अपने हितों के लिए दबाव बनाना होगा या इसके इतर भी समाज में जो तबका आरक्षण पाकर शिक्षा के सहारे नौकरीपेशा में आकर आर्थिक रूप से संपन्न हो गया है, उसे आर्थिक आंदोलन के लिए पहल करनी चाहिए।

इस वर्ग को अत्त दीपो भव की तर्ज पर आर्थिक आंदोलन की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए। अगर ऐसा होता है देश में औद्योगिकीकरण का भी एक नया दौर शुरू होगा। अब इसे जमीनी अमलीजामा कैसे पहनाया जाए, इसके लिए भारत के दलित समुदाय को अमेरिका के अश्वेतों से कुछ सीखना होगा।

अश्वेतों ने अमेरिकी सरकार की तरफ टुकटुकी लगा कर देखने की बजाय अपने स्तर पर आर्थिक पहल की ओर कदम बढ़ाने का काम बहुत पहले ही शुरू कर दिया था। बड़े गर्व और आश्चर्य की बात है कि आज अमेरिका में अश्वेतों के स्वामित्व वाले 21 बैंक हैं। इनकी संयुक्त पूंजी 4.7 अरब डॉलर है। यानी लगभग 330 अरब रुपए। यह अमेरिकी अश्वेतों की हिम्मत के ही सौदे है कि अब यहां इनके स्वामित्व की तमाम क्रेडिट यूनियंस के साथ ही इनके स्वामित्व वाली इंश्योरेंस कंपनियां और अनेक वित्तीय संस्थाएं हैं, लेकिन भारत के दलित बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के द्वारा दिए गए आरक्षण के सहारे खुद का ही जीवन स्तर उठा पाए हैं, वह भी ठीकठाक नहीं।

यहां के दलितों ने सामुदायिक स्तर से आर्थिक बेहतरी की पहल नहीं की है। अब तक भारत में दलितों के बीच जितने भी आंदोलन हुए या संगठन बने हैं उनका एक ही काम है नौकरीपेशा वर्ग को और सुविधाएं कैसे हासिल हो। इस वर्ग की बड़ी आबादी की खुशहाली के लिए कोई ईमानदार पहल नहीं हुई है।

जब भी इस वर्ग की बड़ी आबादी के लिए समाज के नौकरीपेशा वर्ग की तरफ आशा भरी नजरों से देखा गया तब तब इस वर्ग ने समाज के पिछड़े तबके के साथ यह कहकर शोषण किया कि देश में अभी मनुवादियों की सरकारें हैं और वह हमारे समाज के लिए कोई काम नहीं कर सकती है।

असल में इन्होंने ऐसा कहकर अपनी जिम्मेदारी से ही पल्ला झाड़ा है। भारत में दलितों के बीच में एक नए ब्राह्मण का उदय हुआ है, जबकि अमेरिका में ऐसा नहीं हुआ। यहां दास प्रथा के अंत के मात्र 25 साल बाद ही 1886 में एक पूर्व दास ने पहला अश्वेत बैंक स्थापित कर दिया था। मतलब साफ है कि अश्वेतों ने अपने आर्थिक विकास के लिए किसी के रहमोकरम पर आश्रित नही रहने का फैसला कर लिया था।

1900 में ही एक पूर्व अश्वेत दास बुकर टी वॉशिंगटन ने प्रथम नेशनल नीग्रो बिजनेस लीग्य की स्थापना कर दी थी। इसका मुख्य भाव अश्वेतों में आर्थिक शक्ति खड़ी कर देना था। मजेदार बात तो यह है कि इसी समय एक अश्वेत महिला मैडम सी जी वॉकर ने पहला अश्वेत ब्रांड मार्केट में लॉन्च कर दिया था। इसका वहां पर खासा सकारात्मक असर भी देखा गया। इस नैशनल नीग्रो बिजनेस लीग से प्रभावित होकर तमाम अश्वेत युवाओं ने उद्योग धंधों व व्यापार को अपना करियर बनाना शुरू कर दिया।

वॉल स्ट्रीट पर सेल्समेन के रूप में पहला अश्वेत व्यक्ति भी वर्ष 1949 में रजिस्टर्ड हो गया और 1952 में ही पहली अश्वेत सिक्यॉरिटीज फर्म को नैशनल असोसिएशन ऑफ सिक्यॉरिटीज डीलर्स द्वारा शेयर ट्रेडिंग का लाइसेंस मिल गया। इसके साथ ही वर्ष 1960 में पहली दफा एक अश्वेत कंपनी वॉल स्ट्रीट पर रजिस्टर्ड हो गई।

आज तमाम अश्वेत वॉल स्ट्रीट में इन्वेस्टमेंट बैंकर्स, फाइनेंशियल अनालिस्ट, ट्रेडर्स, फंड मैनेजर्स और वेंचर कैपिटलिस्ट के रूप में बड़ी ही सफलता और जिम्मेदारी के साथ काम कर रहे हैं। अश्वेतों का अमेरिका के आर्थिक बाजार पर अपने अधिपत्य को बढ़ाने का यह अभियान कहीं भी नहीं रुका।

यह साल दर साल निखरते चले गया। इस मजेदार आर्थिक पहल के साथ अब यहां 1991 में पहली अश्वेत कंपनी ब्लैक इंटरटेनमेंट टेलीविजन न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज पर ट्रेडिंग के लिए लिस्टेड हो गई है। फोर्ब्स मैगजीन ने वर्ष 2001 में ब्लैक इंटरटेनमेंट टेलीविजन के संस्थापक रॉबर्ट एल जॉनसन की प्रथम अश्वेत अरबपति होने की घोषणा भी कर चुकी है।

इनके बाद तीन और अश्वेत नए अरबपति बन कर इस समुदाय का नाम रोशन कर रहे हैं। इन नए अरबपतियों में मैडम ओप्रा विनफ्रे, माइकल जॉर्डन तथा रॉबर्ट स्मिथ शामिल हैं जो पूरे संसार में अश्वेतों की शान बढ़ा रहे हैं। दरअसल अमेरिकन अश्वेतों की तस्वीर दो तरह की संस्थाओं ने बदली है। पहले नीग्रो बिजनेस लीग ने अश्वेतों में बिजनेस को लोकप्रिय बनाया, वहीं अश्वेत स्वामित्व के बैंकों ने अश्वेतों के बीच धन संचित करने की एक नई संस्कृति पैदा की।

आसान शर्तों और कम इंट्रेस्ट रेट पर लोन उपलब्ध कराकर अश्वेत बैंकों ने इस समुदाय के युवाओं में कारोबार शुरू करने का उत्साह पैदा किया। अश्वेत बैंकों की स्थापना के कारण समूचे अमेरिकी में इस समुदाय के बीच एक नया आत्मविश्वास पैदा हुआ। हालांकि अभी भी यहां बहुत सारे अश्वेत गरीब हैं और नस्ली भेदभाव का शिकार होते हैं, पर अमेरिकी अश्वेत आज एक बड़ी आर्थिक शक्ति बनकर उभर चुके हैं।

वे भारत के दलितों के समान सरकारों को गरियाने का काम नहीं कर रहे है। सरकारी आरक्षण व सुविधाओं का रोना भी नहीं रो रहे हैं। भारत के दलित नौकरीपेशा लोगों की तरह आरक्षण पाकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से दूर भी नहीं भाग रहे हैं। अमेरिका के जाने माने अश्वेत लेखक और रेडियो होस्ट लोरी एल्डर के मुताबिक यदि अमेरिकी अश्वेत एक देश होते तो जीडीपी के मामले में दुनिया के पंद्रहवें सबसे अमीर मुल्क होते।

लोरी एल्डर के अनुसार 2014 में ही अश्वेतों की वार्षिक आय 836 अरब डॉलर थी, जबकि एक और संस्था सोलिंग सेंटर के अनुसार अश्वेतों की वार्षिक आय 1000 अरब डॉलर है। अश्वेत अमेरिका की आबादी मात्र 12.5 प्रतिशत है, यानी चार करोड़ से भी कम। जबकि भारत में दलितों की आबादी करीब 20 फीसदी है। करीब बीस करोड़ की आबादी वाले इस दलित समाज से विधायक, सांसद, कैबिनेट मंत्री यहां तक कि मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति भी हैं। डॉक्टर, इंजीनियर, कॉरपोरेट प्रोफेशनल्स और उद्यमी तो बहुतेरे हैं, पर इनके पैसों का क्या होता है आखिर देश में एक भी दलित बैंक या दलित इंश्योरेंस कंपनी क्यों नहीं है। इसका मुख्य कारण शायद यही है कि भारत में दलितों ने अमेरिकी अश्वेतों की तरह अपनी कमाई को अनुशासन में नही बांधा और न ही इस अपनी कमाई से तमाम तरह के उद्योग धंधे स्थापित करने की सोच रखी।

अमेरिकी अश्वेतों का धन संग्रहित और व्यवस्थित रहा तो लिहाजा इनके अपने अखबार, रेडियो स्टेशन, टीवी चैनल सब कुछ हो गए, लेकिन भारतीय दलितों की कमाई अनुशासित नहीं हो पाई तो वह सामाजिक ताकत नहीं बन पाई। यह सोचना भी गलत होगा कि भारत में दलितों के पास पैसा नहीं है, इसलिए दलित बैंक नहीं बने या उद्योग धंधों पनप नहीं पाए। असल में यहां के दलितों की मानसिकता ही गुलामी पर आश्रित हो चुकी है।

भारत के दलितों ने अपने विकास का माध्यम केवल और केवल राजनीतिक सत्ता को मान लिया है। वे अक्सर यह कहते फिरते हैं कि जब देश में दलितों की सत्ता होगी तब तमाम विकास के द्वार खुल जाएंगे और इसी की आड़ में दलित कुछ करने की बजाय सत्ता शासकों को कोसने में लगा रहा। लेकिन अमेरिका के अश्वेतों में ऐसा नहीं रहा। वे हमेशा आर्थिक तरक्की के लिए चलते रहे। शायद इसी आर्थिक समृद्धि के कारण ही ओबामा वहां के सफल राष्ट्रपति भी बन पाए।

अमेरिका में अश्वेतों के पास पैसा आने के बाद उनका करीब करीब सभी धंधों पर एकाधिकार होते चला गया। आज यहां के अश्वेतों के पास अपने खुद की बड़ी बड़ी कंपनियां हैं। बड़े बड़े मीडिय़ा संस्थान हैं। अखबार, पत्रिकाएं, रेडियो स्टेशन, न्यूज चैनल सबकुछ है। दुर्भाग्य है कि भारत के सुविधा संपन्न दलित समाज को अब तक इस बात का भान नहीं है कि खुद के स्वामित्व वाला कोई बड़ा मीडिय़ा संस्थान होना चाहिए। भारत में जब तक इस समाज का खुद का कोई बड़ा मीडिय़ा संस्थान नहीं होगा तब तक कोई भी गैर दलित मुख्यधारा का मीडिय़ा सच्चाई को सामने नहीं लाएगा।

आज भी भारत का दलित समाज स्थापित लोगों को दोष देने के सिवाय अपनी बेहतरी के लिए कोई ईमानदार पहल नहीं कर रहा है। बेशक आज भारतीय मीडिया में सवर्णों का 99 फीसदी आधिपत्य है, लेकिन इस बात को कोई समझने के लिए तैयार नहीं है कि मीडिय़ा भी आज की तारीख में बड़ा व्यापार है। अब यह समाज से सरोकार रखने वाला कोई सामाजिक संगठन नहीं।

भारत की आजादी के सत्तर सालों में आरक्षण पाकर दलित समुदाय का इंसान आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकर्स, वैज्ञानिक, जज और तमाम विभागों में बड़े बड़े अफसर तो बन गए हैं, लेकिन आरक्षण विहीन स्थानों पर इनकी मौजूदगी नगण्य है। गीत, संगीत, फिल्म, कला, खेल, सेना, कानून, विज्ञान, राजनीति हर क्षेत्र क्षेत्र में भारत के दलितों की मौजूदगी नगण्य है, जबकि अमेरिकी अश्वेतों का हर स्तर पर दबदबा है।

बराक ओबामा का राष्ट्रपति बनना अश्वेत समाज के लिए गौरव का विषय रहा, पर भारत में आज जो दलित वर्ग का राष्ट्रपति बना है उसकी लाचारी किसी से छिपी नहीं है। वह यहां के दलितों की प्रगति के प्रतीक की बजाय गुलामी का प्रतीक बनकर ही सामने आया है। ऐसे गुलाम प्रतीकों से भारत के दलित समुदाय का मनोबल नहीं बढने वाला है। अब दलितों को खुद आर्थिक प्रगति के लिए नए तरीके से इस राह पर चलना पड़ेगा। दोषारोपण की मानसिकता से हटकर सामुदायिकता के भाव को मजबूत कर अपनी आर्थिक सत्ता हासिल करनी होगी।

(समसामयिक मुद्दों पर लिखने वाले संजय रोकड़े मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करते हैं।)


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