Last Update On : 01 11 2018 11:17:59 PM

‘जूठन’ को उत्तराखंड सरकार ने यह कहकर पाठ्यक्रम से हटा दिया कि ये जातिवाद फैलाने की बात करती है। रामानुजन की 300 रामायण ये कहकर हटा दी गई कि इससे हिंदू भावनाएं आहत होती है। आज कांचा इलैया की किताबों को ये कहकर हटाया जा रहा है कि ये नफ़रत फैला रही हैं….

सुशील मानव की रिपोर्ट

पिछले दिनों दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टैंडिंग कमेटी ने अपनी मीटिंग में यह प्रस्ताव किया है कि कांचा इलैया की तीन किताबें ‘मैं हिंदू क्यों नहीं हूं’, ‘पोस्ट हिंदू इंडिया’, ‘गॉड एज पॉलिटिकल फिलॉसफर’ और नंदिनी सुंदर की किताब ‘बर्निंग बस्तर’ को एम राजनीति विज्ञान की पाठ्यक्रम से हटा दिया। कमेटी ने किताबों को हटाने का प्रस्ताव देते हुए तर्क दिया है कि ये किताबें हिंदू आस्था की गलत समझ को प्रस्तुत करती हैं।

डीयू की स्टैंडिंग कमेटी ने ‘दलित’ शब्द के अकादमिक इस्तेमाल पर भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। स्टैंडिंग कमेटी के इस प्रस्ताव के खिलाफ़ कल यानि 30 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे दिल्ली यूनिवर्सिटी के आर्ट फैकल्टी के गेट नंबर 4 पर ‘फाइट फॉर सोशल जस्टिस इन डीयू’ द्वारा विरोध सभा आयोजित की गई।

विरोध सभा के पहले वक्ता के तौर पर जाकिर हुसैन कॉलेज में हिंदी विषय के एसोसिएट प्रोफेसर लक्ष्मण यादव ने कहा कि आज हम उस दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ एक व्यक्ति को एक वोट देने का तो अधिकार होगा, लेकिन सामाजिक आर्थिक गैरबराबरी इतनी ज्यादा है कि अगर हमने एक बराबरी का मुल्क नहीं बनाया तो ये वोट देने का लोकतांत्रिक अधिकार अर्थहीन हो जाएगा। भारत अपने अतंर्विरोधी का इस मोड़ पर आकर शिकार हो जाएगा, लेकिन उस मुकम्मल देश बनने का जो एक दस्तावेज़ था वो भारतीय संविधान के रूप में हमारे सामने रखा गया जो आज तक के तमाम संघर्षों को एकजुट करके, एक बराबरी का मुल्क बनाने का एक मुकम्मल दस्तावेज़ था।

उस दस्तावेज़ को लागू करने के लिए जिन कुछ संस्थानों के ऊपर जिम्मेदारी थी उनमें राजनीतिक प्रतिष्ठान सबसे प्रमुख थे, लेकिन वो राजनीतिक प्रतिष्ठान वोटबैंक की राजनीति में तब्दील हो गए। समाज के ऊपर जिम्मेदारी थी कि हजारों साल के इस शोषण में हमने कभी दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, आदिवासियों को कभी बराबरी का दर्जा नहीं देने दिया गया।

उन्हें वो बराबरी का हक़ दिलाने की कोशिश करता, लेकिन हमारा समाज इसे बहुत शिद्दत से करता हुआ नहीं दिखा। मुकम्मल मुल्क बनाने की तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इन विश्वविद्यालयों पर थी इसलिए इन्हें चलाने की जिम्मेदारी राज्य की थी। ताकि हर गरीब पिछड़ा दलित शिक्षा के मुहाने तक पहुंच सके। संविधान लागू होने के साथ रिजर्वेशन लागू हुआ पर विश्वविद्यालयों में नहीं।

1990 के बाद जब सोशल ऑडिटिंग हुई तो ये पाया गया कि 85 फीसदी जनसंख्या वाला बहुसंख्यक न तो शिक्षक बन सका है न छात्र। वो विश्वविद्यालयों तक पहुंच ही नहीं पाया। विश्वविद्यालयों पर इतने दशकों तक किसका कब्जा था। इसके पाठ्यक्रम किसने बनाए। जब इन विश्वविद्यालयों पर स्त्रियों, दलितों, पिछड़ों ने पहली बार व्यवस्थित रूप से पढ़ने आने की दावेदारी की तब जाकर फातिमा शेख, सावित्री बाई फुले अंबेडकर और मंडल का ख्वाब पूरे होते हैं जब बहुसंख्यक इन विश्वविद्यालयों में पढ़ने आते हैं।

जब उनमें से ही कुछ लोग निकलकर शिक्षक बनते हैं तब वो सवाल करते हैं कि पचासी प्रतिशत जनता का नजरिया उनका अपना अनुभव तुम्हारे पाठ्यक्रम में नहीं है। हम इस पाठ्यक्रम को बदलेंगे और फिर हमने पाठ्यक्रमों में अपनी बात रखी। हमने पाठ्यक्रम में गुलामगिरी, मुर्दहिया, जूठन लगा दिया तो उन्हें दिक्कत हुई। उन्होंने विभागों में दलित पिछड़े शिक्षकों को प्रताड़ित किया, क्योंकि गुलामगिरी उनके हिंदुत्व को चुनौती देने लगी।

‘जूठन’ को उत्तराखंड सरकार ने यह कहकर पाठ्यक्रम से हटा दिया कि ये जातिवाद फैलाने की बात करती है। रामानुजन की 300 रामायण ये कहकर हटा दी गई कि इससे हिंदू भावनाएं आहत होती है। आज कांचा इलैया की किताबों को ये कहकर हटाया जा रहा है कि ये नफ़रत फैला रही हैं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी शिक्षक एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सुधांशु ने कहा कि स्टैंडिंग कमेटी का ये फैंसला चौंकाने वाला था। दलित और एससी/एसटी एक शब्द नहीं है। दलित शब्द हजारों साल के संघर्ष के इतिहास का बोध है। डीयू में एस्मा लागू करने की कोशिश की गई ये कहकर की शिक्षक आजकल हर छोटे-बड़े मसले पर प्रतिरोध करने लगे हैं। ताकि हम प्रतिरोध भी न कर सकें।

यूनिवर्सिटी में शिक्षा और अनुशासन के नाम पर एस्मा और सीसीएस लागू की जा रही है। टीचर एसोसिएशन के अध्यक्ष समेत 22 शिक्षकों को निशाने पर रखा गया है। वर्ष 2017-18 को सोशल जस्टिस के लिए स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।

डीयू के हिंदी विभाग के प्रोफेसर और दलित लेखक श्योराज सिंह बेचैन ने प्रतिरोध सभा में बोलते हुए कहा कि ये सिर्फ दलितों की बात नहीं। प्रेमचंद जैसा एक बड़ा नेता समाज को मिला तो उसका एक कारण ये भी था कि उन पर गांधी का बहुत प्रभाव पड़ा था। यदि आज अंबेडकर का प्रभाव लेखकों और समाज पर नहीं पड़ेगा तो समाज को अपना लेखक कैसा मिलेगा। गांधी के ‘हरिजन’ शब्द का विरोध अंबेडकर ने किया क्योंकि इसमें समानता नहीं है।

अंबेडकर ने जनता में गांधी जी के सड़े विचार नाम से एक लेख लिखा था। ये शब्दों से खेलने शब्दों को खत्म करने का दौर है। वो कहते हैं ‘दलित’ संवैधानिक शब्द नहीं है तो मैं कहता हूँ कि संविधान कोई शब्दकोष नहीं है। श्योराज सिंह बेचैन आगे कहते हैं कि गुलाम को गुलामी का एहसास करा दो तो वो विद्रोह कर देगा। ये स्थितिसूचक शब्द है। जातिसूचक नहीं ये वैज्ञानिक शब्द है।

स्थिति बदलने पर ये स्वतः ही हट जाएगा। वो कहते हैं कि अछूत की स्थिति गुलाम से बदतर थी, क्योंकि बिकने वाले की कीमत होती है जबकि जो चीज मुफ्त में मिलती है उसका कोई केयर नहीं करता फिर मरे या जिए उन्हें फर्क नहीं पड़ता था।

प्रसिद्ध पत्रकार दिलीप मंडल ने कहा कि मुझे खुद कांचा इलैया के कई बातों से असहमति है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं उनकी किताबों को बैन करके ज्ञान का रास्ता ही बंद कर दूं। ये तो वही बात हुई कि धरती गोल बोलने वालों को धरती चपटी मानने वालों ने मारा—पीटा और जिंदा जला दिया।

इस समय अकादमियों का जो मेनस्ट्रीम है उसे आप ब्राह्मणवादी, मनुवादी, ब्राह्मण वर्स्ववादी जैसा चाहें वैसे जान लें उनकी सारी कोशिशें ये है कि ज्ञान के अलग अलग जो शेड्स हैं वो न आए। एक मोनोलिप क्रिएट हो जिसमें जो कहा जा रहा है केवल वो सच हो, जिसमें तुलसी को पढ़ा सकते हैं कांचा इलैया को नहीं। दो अजीब से चीजें आप एक साथ करने की कोशिश करते हैं।

तुलसी को यदि आप पढ़ा सकते हैं, कहानियों के जरिए वेद और गीता को पढ़ा सकते हैं धर्म के टेक्स्ट को आप भाषा के सिलेबस में पढ़ा सकते हैं तो आप सोसोलॉजी के सिलेबस में कांचा इलैया को गुलामगिरी को एनीहिलेशन ऑफ कास्ट को क्यों नहीं डालना चाहते हैं। आखिर प्रॉबलम क्या है। पिछले दो साल से भारत सरकार ने एनीहिलेशन ऑफ कास्ट छापनी बंद कर दी है। ये कोशिश हो कि आप उस ज्ञान तक न पहुँचे जो ज्ञान उनके वर्चस्ववादी ज्ञान को चैलेंज कर रहा है।

अगले वक्ता के रूप में बोलते हुए इतिहास के प्रोफेसर भूपिंदर सिंह ने कहा कि अगर वो सत्ता में बैठकर ये सोचते वे मनमानी करके मनुवाद फिर से लाएंगे और उनका कोई विरोध नहीं करेगा तो वो ये गलतफहमी उन्हें अपने दिल-ओ-दिमाग से निकाल देनी चाहिए। सैकड़ों साल के संघर्ष के बाद दलित ने जो अर्जित किया है, आज उस पर हमला हुआ है।

पिछले चार सालों में लगातार दलित अधिकारों पर हमला हुआ है। सबसे बड़ा हमला वो नहीं होता जो अधिकारों पर होता है सबसे बड़ा हमला वो होता है जो विचारों पर होता है। आज कांचा इलैया की किताब हटाकर उन्होंने सबसे बड़ा हमला किया है। वो चाहते हैं कि दलित के पास उसकी आपनी भाषा अपने शब्द अपना विचार न हो। ताकि वो गुलाम बने रहें। भाषा विचार और शब्द गुलामी के खिलाफ़ लड़ाई का हथियार होते हैं। इसीलिए वो डरते हैं।

ये बेहद शर्मनाक है कि दलित शब्द को डीयू के किताबों से हटानेवाली स्टैंडिंग कमेटी में कुछ दलित सदस्य भी शामिल थे। जबकि दलित सिर्फ शब्द नहीं प्रतीक है, बहुजन संघर्ष का इतिहास है। लड़ाई का टूल है। दलित शब्द छीनकर वो हमारी लड़ाई को खत्म कर देना चाहते हैं।

डीयू के दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर केशव प्रसाद ने कहा कि जब आप उनके नॉलेज सिस्टम पर प्रश्न उठाते हैं तो उन्हें समस्या होने लगती है। गौरी लंकेश, नरेंद दाभोलकर जिसने भी उनके खिलाफ प्रश्न उठाया, उनका विश्लेषण किया उसे रास्ते से हटा दिया गया। जब हम राजनीतिक सांस्कृतिक और भौतिक लीड लेते हैं तो उन्हें समस्या होती है। हमें छुआछूत दिया गया, हमें हरिजनता और बैकवर्ड वर्ग दिया गया दिया गया, लेकिन तमाम दिए गए कैटेगरी में दलित एक बहुत ही मजबूत राजनीतिक कैटेगरी है दलित शब्द में स्वयं के सम्मान के लिए है।

जब हम 1947 का दलित पैंथर मूवमेंट है जिससे होकर सोसायटी बदलाव आते है। 1990 में मंडल कमीशन के बाद आइडिया ऑफ दलित का विकास होता है। दलित साहित्य दलित राजनीतिक आंदोलन, दलित संघर्ष का विकास होता है। दलित शब्द मुक्ति की बात करता है सिर्फ दूसरे तरह के कष्टों से ही नहीं उत्पीड़न से भी। ये इसकी ताकत है। मुस्लिम और स्त्री जो भी उत्पीड़ित है वो दलित है।

ये किसी पर सवाल उठाने की बात नहीं है उन्हें यूनिवर्सिटी में हमारे अस्तित्वमान होने यहां प्रवेश करने से समस्या है। वे अब तक हमें सीमांत बताते रहे और हम मेनस्ट्रीम में आ गए। हम दलित बहुजन लोग क्रिएटर हैं मार्जिनल तो वो लोग हैं। अंबेडकर ने भारतीय इतिहास को आधार दिया ये बताकर बुद्धिज्म और ब्राह्मणवाद का संघर्ष के बारे में बताया। कांचा इलैया की किताब मैं हिंदू क्यों नहीं हूं उसी की व्याख्या करती है।

एक शोध छात्र सुमित ने बताया कि उसे डीयू के स्टैंडिंग कमेटी द्वारा सिल्बस से बाहर की गई किताबों से क्या हासिल हुआ है। दलित एक विचार है जो सिर्फ दलित की नहीं बल्कि स्त्री और पूरे समाज की बात करता है। उसने बताया कि इन किताबों से हमें ये पता चला कि किस तरह से जातिवादी समाज को हटा करके एक समतामूलक समाज बनाना है। नारी समानता और नारी को किस तरह बराबरी का दर्जा दिया जा सकता है ये मुझे फुले को पढ़कर पता चला।

इस पेपर ने मुझे ये सिखाया है कि किस तरह संविधान में दिए अधिकारों की कसौटी पर खुद को कसकर अपने अधिकारों के लिए खड़े हो सकते हो। दलित पोलिटिकल विचार उस बात को नकारताहै जो ये कहता है कि फला वर्ग के लोग सिर से पैदा हुए, फला वर्ग के लोग पांव से।

आखिरी वक्ता के रूप में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर सरोज गिरी ने कहा कि उनको मुख्य दिक्कत दलित बहुजन राजनीतिक विचार से है। हम उनके विचारकों को पढ़ते हैं तो उससे उन्हें दिक्कत नहीं है। लेकिन जब हम अपने विचारकों को पढ़ते हैं तो उन्हें दिक्कत होती है। आज सत्ता में वो हैं फिर भी डरे हुए वो हैं।

वो कहते हैं कि आप कांचा इलैया को हटाइये अंबेडकर को पढ़ाइये। यदि अंबेडकर को आप भारतीय राजनीति, आधुनिक भारत के राजनीतिक विचार के रूप में पढ़ाते हैं तो उसे ठीक कहते हैं लेकिन यदि आप गौतम बुद्ध की शैली से आने वाले अंबेडकर के दलित बहुजन विचार जो कि उनका असल कोर है उसे पढ़ाएंगे तो उससे उन्हें दिक्कत है। वो अंबेडकर के उस विचार के असल कोर को मारकर अपने अनुसार इस्तेमाल कर लेंगे। उनको दलित बहुजन थॉट से दिक्कत है जो उनके हिंदुत्व को चैलेंज करता है।

डीयू के छात्र संतोष कुमार ने कहा कि जब गीता में कृष्ण कहते हैं कि वर्ण व्यवस्था में रहकर जीवन का आनंद लो तब जातिवाद नहीं फैलती। तुलसी पढ़ाए जाते हैं तो क्या तुलसी जातिवाद खत्म कर रहे हैं। लेकिन मुरुगन से आपके धर्म को परेशानी होती है, खतरा पैदा हो जाता है। जब संविधान ये कहता है कि इक्वलिटी बिफोर लॉ और इक्वल प्रोटेक्शन ऑफ लॉ तो देश संविधान से चलेगा या कि धर्म से। विश्वविद्यालयों का सिलेबस लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रैटर्निटी के सिद्धांत पर होंगी की दकियानूसी होंगी।

काशी राम ने कहा था कि जिस समाज की सांस्कृतिक वैचारिकी का आधार मजबूत नहीं होगा उस समाज का राजनीतिक आधार भी कमजोर होगा, वहीं विश्व भारती विश्वविद्यालय के शोध छात्र मनीष ने कहा कि अगर तुम तीन किताबें बैन करोगे तो हम सैंकड़ों किताबें लिखेंगे।

गोरखपुर विश्वविद्यलय के छात्र भास्कर चौधरी ने कहा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय जातिवाद का गढ़ रहा है। इस साल जब हमने विश्वविद्यालय चुनावों में जयभीम के नारे के साथ जब हमने चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी के साथ चुनाव लड़ा तो मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल करते हुए चुनाव ही रद्द कर दिया।

डीयू के ही एक शोधछात्र सुचित ने कहा कि स्टैंडिंग कमेटी का दलित शब्द के इस्तेमाल से बचने का सुझाव देना दरअसल कास्ट के रेडिकल को अल्टरनेटिव डिस्कोर्स के जरिए बताने की कवायद है।

डीयू के छात्र गनेश्वर ने कहा कि बुद्ध, रविदास, फुले, अंबेडकर, पेरियार ताराबाई शिंदे और कांशीराम पहली बार दलित पर्सपेक्टिव अकादमिक सिलेबस में शामिल है। ये केवल कांचा इलैया के बारे में नहीं है। अगर हम इस सिलेबस में भी नहीं पढ़ेंगे उन्हें तो क्या पढ़ेंगे।

एक दूसरे छात्र मिथिलेश ने कहा कि दलित साहित्यकारों ने उनके मिथकों प्रतीकों को टंपर्ड कर दिया है तर्कों कि माध्यम से। उनके प्रतिमानों को चुटकुलों में तब्दील कर दिया है। इससे उन्हें दिक्कत है।

विरोध सभा के बाद छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर यूनिवर्सिटी कैंपस से लेकर वीसी आवास तक विरोध मार्च निकाला और ज्ञापन सौंपा।