Last Update On : 06 03 2018 07:53:00 PM

गरीबों के लिए मुफ्त उपलब्ध डायलिसिस के लिए हल्द्वानी के सरकारी अस्पताल बेस चिकित्सालय में गरीबों से वसूले जा रहे एक बार में 400 से 500 रुपए तक…

हल्द्वानी से संजय रावत और विद्या शर्मा की रिपोर्ट

गरीबी रेखा से नीचे के मरीजों को मुफ्त इलाज का दावा कितना खोखला है, यह देखना हो तो कुमाऊं के बेस चिकित्सालय हल्द्वानी जरूर जाएं। पी.पी.पी. मोड़ में दिए गए डायलिसिस सेंटर में इसका नमूना देखने को मिलेगा। यहां एक मजदूर बीपीएल कार्ड लेकर सी.एम.एस. (मुख्य चिकित्सा अधीक्षक) के पास महीनों गुहार लगाता रहा और डायलिसिस के लिए जांच के पैसे भरता रहा। 

तीरथ पुर, रुद्रपुर जिला उधमसिंह नगर निवासी प्रभुनाथ उम्र 72 वर्ष, सप्ताह में 2 बार रुद्रपुर से हल्द्वानी बेस चिकित्सालय इसलिए जाता है कि उसे किडनी संक्रमण का रोग है, जिसके लिए उसे डायलिसिस करानी होती है। डायलिसिस से पहले खून की जांच करानी होती है जो बीपीएल मरीजों के लिए मुफ्त है, पर प्रभुनाथ से इसके लिए कभी 400 तो कभी 500 रुपये वसूले जाते हैं।

प्रभुनाथ जैसे जाने कितने मरीज अस्पताल प्रशासन की संवेदनहीनता से पीड़ित होंगे। डायलिसिस विभाग दरअसल, बेस चिकित्सालय ने पी. पी. पी. मोड़ पर कर दिया, जिसे अभी बैंगलौर की ‘नेफ्रो प्लस’ नामक कंपनी चला रही है। बेस चिकित्सालय और नेफ्रो प्लस कम्पनी के करार (एम.ओ.यू.) के तहत मरीजों की जांच मुफ्त होती है, जिसकी एवज में कम्पनी बेस चिकित्सालय को उसका बिल देती है। बिल का भुगतान बेस चिकित्सालय उदारतापूर्वक कम्पनी को कर देता है। गौर करने वाली बात यह भी है कि किडनी संक्रमण एक ऐसी बीमारी है जिसके डायलिसिस को कोई मेडिक्लेम कंपनी भी कवर करती है।

हैरानी इस बात की है कि कम्पनी प्रभुनाथ जैसे न जाने कितनों से इसके पैसे वसूलती है और सी.एम.एस. बजाय कम्पनी को दंडित करने की प्रक्रिया शुरू कर कम्पनी मैनेजर से गुहार लगाते नजर आते हैं कि – ‘गरीबों से पैसे नहीं लेने है भैय्या’।

शासन और अस्पताल प्रशासन की मंशा जानिए
इन हकीकतों से रोज दो-चार इसलिए होना होता है कि शासन-प्रशासन की मंशा लोक कल्याणकारी हो न हो, नारे जरूर लोक कल्याणकारी रहे हैं। वर्ना ये कैसे होता कि शासन स्तर से दो डायलिसिस मशीनें खरीद कर अस्पताल में इनस्टॉल कराया जाता है, फिर उसी सत्र (वर्ष 2012) में डायलासिस विभाग पी.पी.पी. मोड़ में दे दिया जाता।

वर्ष 2012 में पहली बार किसी ‘राही केयर’ नामक कम्पनी को 5 वर्षों के लिए दिया गया और फिर 20 मार्च 2017 से 2020 तक ‘नेफ्रो प्लस’ कम्पनी को दिया गया है। ये भी जबरदस्त इत्तेफाक कि दोनो कम्पनी के सैन्टर मैनेजर महेन्द्र सिंह बिष्ट ही रहे। यही वो मेंनेजर हैं जो प्रभुनाथ जैसे कई बी.पी.एल. कार्ड धारकों से अवैध वसूली करते हैं। 

कम्पनी के लिए उदार है अस्पताल प्रशासन
बेस चिकित्सालय के सी.एम.एस. डाॅ. एस.बी.ओली को जब इस वाकये से वाकिफ कराया गया तो उन्होंने बड़ी उदारतापूर्वक कम्पनी मैनेजर महेन्द्र सिंह बिष्ट को बुलाया और कहा कि इनसे पैसे क्यों ले रहे हो भैय्या आप, हमें बिल भेजो, भुगतान हम करते तो हैं।

कम्पनी से की जाएगी रिकवरी
पीड़ित प्रभुनाथ बताते हैं कि वो जब से डायलासिस को आते हैं, उसमें जांच के लिए 400 रूपए लिए जाते हैं। प्रभुनाथ महीने में 8 बार डायलासिस को आते हैं, तो यह रकम 3200 रूपए महीना हुई। अब और प्रभुनाथों का हिसाब अस्पताल प्रशासन क्यों लेने लगा, जब वो कम्पनी के प्रति पहले से ही उदार है।

कौन चलता है करार के हिसाब से 
नेफ्रो प्लस कम्पनी के सेंटर मैनेजर महेन्द्र सिंह बिष्ट से जब पूछा गया कि आपके करार के तहत आपको मरीज की जांचे मुफ्त कर भुगतान अस्पताल प्रशासन से लेना होता है, फिर आप मरीजों से किस बात के पैसे लेते हैं। तो उनका कहना था कि करार के हिसाब से कौन चलता है? और कभी इस पर किसी ने कोई हस्तक्षेप भी नहीं किया।

ऐसी स्थिति में अस्पताल प्रशासन और शासन की मंशा को भी समझा जा सकता है और सस्ते सुलभ ईलाज के लिए आम आदमी की स्थिति को भी।

(फोटो : किडनी संक्रमण से पीड़ित प्रभुनाथ, जो सरकारी बेस चिकित्सालय में मुफ्त उपलब्ध डायलिसिस के लिए हर माह चुका रहा हजारों रुपए)