भीड़ तंत्र तब कहां चला जाता है जब बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मोबाइल डाटा, गोरा बनाने की क्रीम, वजन कम करने की चाय, श्री लक्ष्मी यन्त्र के नाम पर अमीर बनाने का लालच देती हैं। रामदेव सरीखे भगवा व्यापारी राष्ट्रवाद के नाम पर ठगते हैं? क्यों समाज इन ठगों की करतूतों पर भीड़ इकट्ठी नहीं करता….

विवेक का विश्लेषण

लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान ‘पप्पू’ के तौर पर ख्यात राहुल गाँधी ने नाटकीय अंदाज में झूठ के राजनीतिक अवतार मोदी को गले लगा लिया। इसे सामाजिक स्वीकार्यता भी मिली, शायद इसलिए भी क्योंकि भारत में ठगी का इतिहास उतना ही पुराना है जितना खुद भारत। ठगी की परम्परा अलग अलग स्वरूप में अलग अलग वर्ग में फलती फूलती रही है। इतिहास से होते हुए ठगी को आज के परिपेक्ष्य में देखने के लिए समाज की कुछ रोजमर्रा की सच्ची कहानियों से रूबरू होना ज़रूरी है।

हमारे देश में ठगी के एक रूप को सामजिक मान्यता प्राप्त रही है जिसे ‘बहरूपिया’ के नाम से आज का भी समाज जानता है। ये बहरूपिये भेष बदल कर ठगी करते आये हैं और समाज जानते समझते इन्हें बर्दाश्त करता रहा। साधू के भेष में दो बहरूपियों ने 2014 में उत्तर प्रदेश जिला गोरखपुर के चांडी गाँव में एक ही परिवार के 6 लोगों की हत्या कर सारा घर लूट लिया था।

हरियाणा का मेवात जिला कटलू काटने के लिए पूरे भारत में मशहूर है। कटलू काटने के लिए किसी भी सोने सी दिखने वाली नकली ईंट या किसी अन्य ‘चारा’ इस्तेमाल में लाया जाता है और जब ग्राहक पैसों के साथ माल खरीदने आता है तो उसे लूट लिया जाता है। लूट का आलम ऐसा है कि कारों और मोटरसाइकिलों से लदे ट्रक के ट्रक तक आज भी इस इलाके में लूटे जाते हैं और फिर उसी शोहरत की आड़ में माल बेचने के नाम पर बार-बार किसी न किसी को लूटा जाता है| प्रशासन आज तक इस लूट को रोक पाने में नाकाम है।

दिलीप कुमार और वैजयन्ती माला के अभिनय से सजी 1968 की फिल्म ‘संघर्ष’ में बनारस के पंडों की ठगी का सजीव चित्रण किया गया है। इसे आज के भारत में मथुरा, पुष्कर, अजमेर शरीफ, और बनारस जैसे धार्मिक स्थलों पर खुले तौर पर देखा जा सकता है, कैसे विदेशी पर्यटक और घरेलू पर्यटकों को धर्म के नाम पर मंदिरों और मस्जिदों में संगठित रूप से ठगा जाता है और इस धंधे को सामाजिक एवं राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है, जिसके लिए क़त्ल करना भी आम बात है।

सरकारी तंत्र ने धर्म के नाम की ठगी को आस्था, संस्कार सरीखे टीवी चैनलों के माध्यम से करने का लाइसेंस भी दिया हुआ है, जहाँ कोई निर्मल बाबा गोलगप्पे को लाल चटनी से खाने की सलाह भर से कटलू काट लेता है।

65 वर्षीय रामकरण मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर से 30 किलोमीटर की दूरी पर बसे टेकनपुर गाँव में खेती का काम करते हैं। दो वर्ष पहले एयरटेल का मोबाइल नंबर लिया और न जाने कैसे एक कॉलर ट्युन खुद ही बजने लगी और अब हर माह 30 रुपये कट जाते हैं। 24 वर्षीय संजीव टेकनपुर में ही बीएसएफ के ट्रेंनिंग अकादमी के बैरा का काम करते हैं, उनके आइडिया के फ़ोन नंबर से रोज़ 5 रुपये खुद ब खुद कट जाते हैं।

उपभोक्ता सेवा केंद्र में फ़ोन लगा 10 मिनट तक जद्दोजहद करने पर पता चला कि इस समस्या से निजात पाने के लिए 3 रुपये प्रति मिनट की दर से उनके 30 रुपये कट चुके हैं। अर्थात अब ठगी का मोदीकरण यानी डिजिटलीकरण हो चुका है।

दो रोज़ पहले कन्नोज के एक गाँव में सांप की मणि ढूँढने के नाम पर सपेरों के गिरोह ने समूचे घर का माल साफ कर दिया, इस अंधविश्वास में सारा गाँव शामिल था और मणि के नाम पर पूरा का पूरा घर खोद डाला गया था।

दिल्ली के सरोजिनी नगर में सुनार की दुकान चलाने वाले 30 वर्षीय ललित आये दिन सबको ठगते ही हैं पर कुछ रोज़ पहले एक 18 वर्षीय लड़का सोने की चैन बेचने के नाम पर ललित को ठग गया। चेन के सिर्फ दोनों सिरे ही सोने के थे, जिस सूरत में एक सिरा काट कर जांचने पर सोना सिद्ध भी हुआ पर बाद में बाकी की सारी चेन नकली निकली।

इसी वर्ष के जनवरी माह की कड़कती ठण्ड में दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में एक 80 वर्षीय बुजुर्ग, हाथ और चेहरे पर सफेदी के छीटे, कपड़े तार तार और पैर में टूटे जूते, अचानक मिर्गी के दौरे का आघात और मुंह के बल सड़क पर गिरता है। 25 गज के मुर्गी के दड़बों वाले घरों से निकल कर भीड़ उसे घेरे खड़ी है। पानी का स्पर्श मिलते ही बुजुर्ग होश में आता है और उसकी व्यथा सुन मेरे समेत सबके दया का भण्डार कुछ ऐसा खुला कि उत्तराखंड के गढ़वाल तक जाने का किराया, खाना और कपड़ों तक की व्यवस्था हो गई।

शाम को फिर वही व्यक्ति किसी दूसरी गली में ठीक पहले जैसे ही बेहोश पड़ा मिला और माजरा साफ था कि ये भी एक ठग है। मेरे क्रोध की सीमा पार होने ही वाली थी कि ये सोच कर ठिठक गया, क्या कारण होंगे जो एक 80 वर्षीय बुजुर्ग व्यक्ति को ये मार्ग अपनाना पड़ा होगा? और उसे वहाँ से चुपचाप अपना माल समेत चले जाने के लिए मैंने कहा।

केरल, के आलेपी जिले के निवासी, 34 वर्षीय बीजू बीएसएफ में सिपाही के तौर पर कार्यरत हैं और उनकी 33 वर्षीय पत्नी लीबी घर पर फेसबुक पर चैटिंग की शौकीन हैं। इसी फेसबुक पर एक भारतीय, विदेशी गोरा दोस्त बनकर इंग्लैंड से पार्सल भेजने का झाँसा दे 3 लाख रूपए ठग गया, जिसे बाकायदा लीबी ने ही चार खातों में जमा किया। खाता नंबर होने और घर तक की डिटेल निकाल कर देने पर भी पुलिस का स्वभाव भारतीय पुलिस जैसा ही रहा।

ऐसी कहानियाँ आपको आये दिन अख़बारों और अपने आस पड़ोस से सुनने को मिल जाएंगी। कई बार हम गलियों सड़कों पर पकड़े जाने वाले ठगों को भीड़ के हवाले कर उनकी जान ले बैठते हैं और त्वरित न्याय प्राप्ति हो जाने की अनुभूति भी करते हैं। ग्राम पंचायतें नंगा कर मुंह काला करती है और पोल से बाँध कर जान ले लेती हैं।

ऐसा ही भीड़ तंत्र तब कहां चला जाता है जब बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मोबाइल डाटा, गोरा बनाने की क्रीम, वजन कम करने की चाय, श्री लक्ष्मी यन्त्र के नाम पर अमीर बनाने का लालच देती हैं। रामदेव सरीखे भगवा व्यापारी राष्ट्रवाद के नाम पर ठगते हैं? क्यों समाज इन ठगों की करतूतों पर भीड़ इकट्ठी नहीं करता?

गंभीर विषय है कि भारत का संविधान एक तरफ अंधविश्वास को रोकने के लिए नीति निर्देशक सिद्धांत की बात करता है तो वही अनुच्छेद 51 (क) मौलिक कर्तव्य के रूप में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रसारित करने की बात करता है| पर हमारी सरकारें बाकायदा टीवी चैनलों पर बाबाओं को ठगने और कंपनियों को आपको भ्रामक प्रचार से लूटने की छूट देती हैं। ये सुव्यवस्थित ठगी के व्यवसाय सरकारों और मीडिया की आय के साधन हैं और वे खुद भी इस ठगी में शामिल है।

नोटबंदी जैसी ठगी खुद भारत सरकार ने की और इसके बावजूद समाज का एक बड़ा वर्ग इससे खुश है तो समझा जा सकता है कैसे समाज को सब ठग अपने अपने वर्ग के मुताबिक लूटने में सफल रहे हैं। इनसे न्याय दिला पाना न्यायालयों के लिए भी गैरज़रूरी जान पड़ता है, पर सड़क के ठग को सजा देने के लिए भीड़ जमा होती ही है क्योंकि वो व्यवस्थित लूट का हिस्सा कम और व्यक्तिगत लूट का ज्यादा होता है।

आखिर में क्यों 32 के 32 गुण मिला कर विवाह कराने वाले पंडित को विवाह के विफल होने के उपरान्त भी हम अगले विवाह को तय कराने के लिए आमंत्रित करते हैं? उसके लिए उपभोक्ता अदालत में या जिला न्यायालय में मुक़द्दमा दायर किया जाना चाहिए या त्वरित न्याय के लिए भीड़तंत्र के हवाले कर देना चाहिए?


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