विवादित डीएनए वैज्ञानिक जेम्स वाटस

डीएनए की बनावट की खोज करने वाले एक वैज्ञानिक जेम्स वाटसन को अपने पूर्वाग्रहों की सजा मिल गयी है, पर कल्पना कीजिये अपने देश में ऐसा होता तो संभवतः वर्तमान सरकार उन्हें देश का वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त कर लेती…

बता रहे हैं वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय

डीएनए की बनावट की खोज करने वाले एक वैज्ञानिक जेम्स वाटसन के नस्लवादी और अवैज्ञानिक कमेंट के कारण वे जिस संस्था में काम कर रहे थे, उसने उनसे पूरी तरह सम्बन्ध तोड़ लिया है। उन्हें सभी मानद पदों से हटा दिया है। हाल में ही उन्होंने एक डाक्यूमेंट्री में कहा था कि गोरे लोगों और काले लोगों की बुद्धिमत्ता (आईक्यू) में अंतर होता है। काले लोग कम बुद्धि वाले होते हैं। इस वक्तव्य के बाद, लॉन्ग आइलैंड स्थित कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी, ने अपने सभी मानक पदों से वाटसन को बेदखल कर दिया है।

कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी के साथ जेम्स वाटसन का पुराना सम्बन्ध है। वर्ष 2007 में भी एक साक्षात्कार के दौरान वाटसन ने कहा था, उन्हें अफ्रीका का भविष्य अंधकारमय लगता है, क्योंकि सभी सामाजिक विकास की बातें हम यह मानकर करते हैं कि उनकी बुद्धिमत्ता भी उतनी ही है जितनी हम गोरों की, पर वास्तव में ऐसा नहीं है।

इस साक्षात्कार के बाद लैबोरटरी ने उन्हें चांसलर के पद से हटा दिया गया था और सभी प्रशासनिक अधिकार वापस ले लिए गए थे। पर, कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी ने उनसे मानक पद, जैसे चांसलर एमेरिटस, ओलिवर ग्रेस प्रोफेसर एमेरिटस और आनरेरी ट्रस्टी को बहाल रखा था। हाल के उनके बयान के बाद सभी मानक पद भी छीन लिए गए।

वर्ष 2007 में उन्होंने अपने बयान के बाद हंगामा होने पर सार्वजनिक तौर पर माफी भी माँगी थी। नए साक्षात्कार में उनसे जब सवाल किया गया कि क्या आपके विचार नस्ल और बुद्धिमत्ता के बारे में बदल गए हैं? इसके जवाब में वाटसन ने कहा, नहीं… बिलकुल नहीं, काले लोग कम बुद्धिमान होते हैं।

कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी ने उन्हें सभी पदों से हटाने की घोषणा करते हुए कहा, “वाटसन का बयान निंदनीय है, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और न ही इस संस्था का कोई ट्रस्टी, फैकल्टी, स्टाफ या स्टूडेंट इस विचार से सहमत है। यह संस्था अपने पूर्वाग्रह को विज्ञान का दुरुपयोग कर सही साबित करने के प्रयास की भर्त्सना करती है।”

वाटसन का योगदान डीएनए की संरचना की खोज में भी संदिग्ध ही है। वैज्ञानिक मौरिस विल्किंस के सुझाव पर इंग्लैंड की महिला विज्ञानिक रोसलिंड फ्रेंक्लिन ने एक्स-रे क्रिस्टलोंग्राफी की मदद से डीएनए की खोज की थी। इसके बाद वाटसन ने फ्रांसिस क्रीक के साथ बिना फ्रैन्किन को बताये और बिना इजाजत लिए इस काम को आगे बढ़ाया और इसकी संरचना को अपने नाम से प्रकाशित किया।

वर्ष 1953 में जर्नल नेचर ने वाटसन और क्रीक का शोध पत्र प्रकाशित किया। यह महज संयोग ही था कि इसी अंक में विल्किंस और फ्रेंक्लिन का भी शोधपत्र प्रकाशित किया गया था। पर, इसके बाद वाटसन और क्रीक डीएनए की खोज के पर्याय बन गए और विल्किंस और फ्रेंक्लिन को लगभग भुला दिया गया। वर्ष 1962 में वाटसन और क्रीक के साथ विल्किंस को भी नोबेल पुरस्कार मिला पर, रोसलिंड फ्रैंकलिन के काम को किसी ने याद नहीं किया।

अक्सर क्राइम की खबरों में या फिर पारिवारिक विवाद के दौरान कई बार कहा जाता है कि बच्चे का डीएनए करा लो पता चल जाएगा कि वो इस परिवार का बच्चा है या नहीं। कई बार तो पति पत्नी के बीच के झगड़ों को भी डीएनए के जरिए सुलझाया जाता है जिसमें पति को शक होता है कि बच्चा उसका नहीं है। यानि हम कह सकते हैं कि डीएनए टेस्ट से हमें किसी शख्स से संबंध के बारे में जानकारी मिलती है।

आप कह सकते हैं कि इस टेस्ट के जरिए माता—पिता, दादा—दादी खानदान और वंश परिवार जातीय समूह की जानकारी मिल जाती है। इतना ही नहीं कई बार पुलिस भी डीएनए टेस्ट का सहारा लेकर अपराधी तक पहुंचती है। पर हमारे देश में डीएनए शब्द को जनता के बीच ले जाने का काम वैज्ञानिकों ने नहीं बल्कि राजनेताओं ने किया है। वर्ष 2014 के बाद तो यह नेताओं के भाषण का अभिन्न हिस्सा हो चला है। कभी बिहार के लोगों का डीएनए खराब होता है तो कभी पर्यावरण रक्षा हमारे डीएनए में आ जाता है।

वाटसन की नस्लवादी या महिला विरोधी और अवैज्ञानिक टिप्पणी का इतिहास बहुत पुराना है। वर्ष 1968 में क्रीक के साथ प्रकाशित पुस्तक “द डबल हेलिक्स” में उन्होंने रोसालिंड फ्रैंकलिन के बारे में लिखा है, “वो अपने महिलाओं वाले गुणों के उजागर नहीं करती थीं। उनके महिलाओं वाले फीचर्स प्रभावी थे, वो सुन्दर नहीं थीं ऐसा नहीं कहा जा सकता, पर वो यदि अपने कपड़ों का जरा भी ख्याल रखतीं तो बहुत सुन्दर हो सकतीं थीं। उनके सीधे काले बालों से मैच करती हुई लिपस्टिक उन्होंने कभी नहीं लगाईं।” वर्ष 1997 में सन्डे टेलीग्राफ को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, महिलाओं को आजादी मिलनी चाहिए कि वे समलैंगिक जींस धारी गर्भ का गर्भपात करा सकें।

वर्ष 2000 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया बर्कले में बोलते हुए वाटसन ने कहा था कि दुबले लोग कम खुश रहते हैं इसीलिए वे ज्यादा काम कर पाते हैं। इसी भाषण में उन्होंने काले लोगों को अच्छा प्रेमी बताया था, और कहा था कि हम लैटिन लवर्स की बात करते हैं, पर ब्रिटिश लवर्स की नहीं।

वर्ष 2003 के एक डाक्यूमेंट्री इंटरव्यू में वाटसन ने कहा, लोग कहते हैं कि यदि दुनिया की सारी महिलायें सुन्दर हो जाएँ तो भयानक स्थिति होगी, पर मेरा मानना है कि यह बहुत अच्छा होगा। उन्होंने आगे कहा मूर्खता एक रोग है। वर्ष 2012 में उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं के योगदान की चर्चा करते हुए कहा था, महिलायें कम प्रभावी हैं और पुरुषों के मनोरंजन के लिए हैं।

वर्ष 2007 के अफ्रीका वाले बयान के बाद से वाटसन कोल्ड स्प्रिंग हार्बर लेबोरेटरी के मानक पदों पर ही सिमट गए थे और उन्हें भाषणों के लिए भी बुलाना लगभग बंद कर दिया गया था। ऐसे समय पैसे की तंगी का हवाला देते हुए वर्ष 2014 में अपने नोबेल पदक नीलाम कर दिया। ऐसा करने वाले वे पहले नोबेल पुरस्कार विजेता बने।

वाटसन को अपने पूर्वाग्रहों की सजा तो मिल गयी, पर कल्पना कीजिये अपने देश में ऐसा होता तो संभवतः वर्तमान सरकार उन्हें देश का वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त कर लेती।

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