Last Update On : 03 10 2018 11:38:35 AM

किसानों की किन मांगों को सरकार ने माना, किन मांगों पर विचार करेगी, यह तो अभी तक नहीं पता चला, पर नेता ने सिर्फ इतना बताया कि किसान बहुत थक गए हैं और हम आंदोलन खत्म करते हैं

सवाल ये है​ कि कल दोपहर जब पूरा देश किसानों पर हो रहे मोदी सरकार के दमन को देख रहा था तब तो किसान कह रहे थे कि सरकारी आश्वासन से नहीं मानेंगे, उनकी मांगे पूरी होंगी तभी वापस लौटेंगे, लेकिन एकाएक थकान कैसी और आश्वासन पर कैसे मान गए किसान

जनज्वार। भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले 12 दिन पहले देश के अलग—अलग हिस्सों से दिल्ली के लिए चली ‘किसान क्रांति यात्रा’ कल देर रात दिल्ली पहुंचकर खत्म हो गयी। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने कहा कि हम अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे, लेकिन अभी आंदोलन समाप्त करते हैं।

किसान क्रांति यात्रा को लीड कर रहे नरेश टिकैत कहना था​ कि हमलोग 12 दिन से पैदल चल रहे हैं। किसान बहुत थक गए हैं, इसलिए इस आंदोलन को और नहीं चला सकते, पर किसानों के अधिकारों की लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।

अपने नेता के आंदोलन खत्म करने के फैसले के बाद बुधवार 3 अक्टूबर की तड़के सुबह से ही किसान दिल्ली से अपने ​घरों को लौटने लगे थे। दिन में किसानों पर गोली, लाठियां और आंसू गैस दागने वाली पुलिस ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के हस्तक्षेप के बाद देर रात यूपी बॉर्डर पर लगे ​बैरिकेड किसानों के लिए खोल दिए, जिसके बाद चौधरी चरण सिंह मेमोरियल यानी किसान घाट पहुंचे आंदोलनकारी किसानों के नेता ने आंदोलन खत्म करने का निर्णय सुनाया।

किसानों का यह आंदोलन स्वामीनाथन समिती की सिफारिशें लागू करने, बिजली का बिल कम करने, कर्ज माफी, 60 वर्ष से अधिक के किसानों को पेंशन और डीजल—पेट्रोल को सस्ता उपलब्ध कराए जाने को लेकर था। गौरतलब है कि मोदी सत्ता में आने से पहले किसानों के बीच लगातार वादा करते रहे थे कि वह सरकार बनते ही स्वामीनाथन आयोगी की सिफारिशों को लागू करेंगे।

इस आंदोलन में करीब 30 हजार किसान शामिल हुए थे। आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के हरिद्वार के टिकैत घाट से 23 सितंबर को हुई थी। इस आंदोलन में पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान बड़ी संख्या में शामिल थे, जिनमें गन्ना किसानों की बहुतायत थी।

किसानों के इस आंदोलन पर पत्रकार सिद्धार्थ कुछ आंकड़े रखते हैं, जो उन्हें भारत सरकार के जरिए उपलब्ध हुए हैं, आप भी देखें…

पिछले 50 महीनों में कृषि और किसानों को मोदी सरकार ने कैसे तबाह किया कुछ आंकड़े-

  • 2010-11 से 2013-14 के बीच (UPA) कृषि क्षेत्र की विकास दर 5.2 प्रतिशत थी,जो मोदी के इन 4 वर्षों में गिरकर 2.5 प्रतिशत यानी आधी से भी कम हो गई।
  •  किसानों की वार्षिक वास्तविक आय में बृद्धि की दर 3.6 प्रतिशत से गिरकर 2.5 प्रतिशत हो गई।
  • अधिकांश मुख्य फसलों पर लाभ में 1 तिहाई की गिरावट आई।
  • कृषि निर्यात 42 विलियन डॉलर ( 2013-14) से गिरकर 2017-18 में 38 विलियन डॉलर रह गया।
  • लेकिन कृषि का आयात 16 विलियन डॉलर (2013-14) से बढ़कर 24 विलियन डॉलर (2017-18) हो गया।

जिस कृषि पर देश की करीब 63 प्रतिशत यानी 75 करोड़ से ऊपर लोग निर्भर हैं, उसे मोदी ने 48 महीनों में क़रीब तबाही के कगार पर ला दिया। 75 करोड़ लोगों को अच्छे दिनों का सपना दिखाकर, और बदत्तर दिन दिखा दिया। (ये आंकड़े भारत सरकार की संस्थाओं ने ही उपलब्ध कराये हैं)