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‘सप्ताह की कविता’ में आज कवि सुदीप बनर्जी की कविताएँ

सुदीप बनर्जी की कविताएँ भाषा और शिल्प के स्तर पर एक हद तक समर्थ परिवर्तनों का प्रमाण हैं। हालांकि समकालीन संदर्भों में ये संप्रेषण के स्तर पर जटिल होती गई हैं। कहीं-कहीं वह असद जैदी की तरह मोहभंग की किंकर्तव्यविमूढ़ शैली के निकट भी पहुँच जाती हैं। पर सामान्यतः भाषा की तहों के भीतर जाने पर उसके कई अर्थ खुलते हैं जो कविता को उसकी संघर्षशील परंपरा से जोड़ते हैं। जैसे —’पैदल-पैदल चलकर/ नदी पहुँची है उस कस्बे में / नंगे पैर उसके/पैरों का माहावर घुल गया है/ मटमैले पानी में /वह कोयले से आँक रही है दुनिया /दीवाल में अपनी तरफ /जो सदियों से उसी तरफ खड़ी है दीवाल के /पीछे गायब संसार की बेवजह नोंक पर…’

यह सदियों से दीवार के पीछे खड़ी मध्यवर्गीय भारतीय स्त्री है। भीतर दीवार पर कोयले से वह अपनी कल्पना को घिसती वन-उपवन, पशु-पक्षी, देश-विदेश चित्रित करती है, उसी में वह अपनी दृष्टि खोती चली जाती है, और बाहर दुनिया झुलस रही है? उसे मरहम की जरूरत है, जो ये स्त्रियाँ ही दे सकती हैं? समकालीनता का जहर, वह भी बाँट सकती हैं? अगर उन्हें बाहर की दुनिया में बराबरी की हिस्सेदारी दी जा सके?

जंगल और उसके प्रतीकों को लेकर कई कविताएँ हैं सुदीप बनर्जी की। जिसमें सत्ता और व्यवस्था के कई चेहरे सामने आते हैं? और कवि उनके आगे प्रश्नचिन्‍ह लगाता है? कवि खुद व्यवस्था का एक पुरजा रहा है और जब उसका साथ व्यवस्था की विकृतियों से पड़ता है तो कभी तो वह खुद उसमें शामिल होने की कैफियत से खुद से सवाल करता है। कभी उसकी दिशा बदलने के लिए हस्तक्षेप की कोशिश करता है- ‘पेड़ों को कहा राजा आपने /दरख्त कहा, आग कहा/ पर वे टाल बन गए ईंधन के…’ समय के इस दोमुँहेपन को कवि ईमानदारी से उजागर करता है।

सुदीप की कुछ कविताएँ दूसरी ही जमीन की कविताएँ हैं। जिनमें संवेदना की लय कुछ ज्यादा ही तीव्र है। जहाँ चिंता गहरी है, लगता है कवि एक अंधी सुरंग में फंसा हुआ है पर वह रोशनी को देख रहा है। पहचान रहा है, उस ओर बढ़ रहा है। इसमें कभी तो वह ऊपर को जाता है। कभी डूबने लगता है। कभी हाथ-पाँव मारता किनारे की और बढ़ने लगता है- ‘आसमान तुम्हारे कितने तारे तुम्हें परेशान करते हैं,/ जंगल तुम कितने पेड़ों से उदास होते हो लगता है कवि की संगत में जंगल, आकाश सब शालीन हो रहे हों सबकी चिंताएँ कवि की चिताएँ बन जाती हैं?  आइए पढ़ते हैं सुदीप बनर्जी की कविताएंकुमार मुकुल

उतना कवि तो कोई भी नहीं
उतना कवि तो कोई भी नहीं
जितनी व्‍यापक दुनिया
जितने अंतर्मन के प्रसंग

आहत करती शब्‍दावलियां फिर भी
उंगलियों को दुखा कर शरीक हो जातीं
दुर्दांत भाषा के लिजलिजे शोर में

अंग प्रत्‍यंग अब शोक में डूबे
चुपचाप अपने हाड़ मांस रूधिर में आसीन
उंगलियां पर मानती नहीं अपनी औकात

उतना कवि तो बिल्‍कुल ही नहीं
कि उठ खड़ा होता पूरे शरीर से
नापता तीन कदमों से धरती और आसमान

सिर पर पैर रखता समय के।

एक और बच्चा मर गया
एक और बच्चा मर गया
गिनती में शुमार हुआ
तमाम मेहनत से सीखे ककहरे
पहाड़े गुना भाग धरे रह गए

शहर के स्कूल से जाकर
सैकड़ों नंग-धडंग बच्चों के
रक्खे-फ़ना शरीक़, गो कि थोड़ा शरमाता हुआ
आख़िरकार आदिवासी बन गया
कोई तारा नक्षत्र नहीं बना फलक पर

इतनी चिताएँ जल रही है
पर रोशनी नहीं, थोड़ी गर्मी भी नहीं
इतने हो रहे ज़मींदोज़ पर भूकंप नहीं

ईश्वर होता आदमक़द तो
ज़रूर उदास होता
यह सब देखकर
सिर झुकाए चला गया होता

पर आदमक़द आदमी भी तो नहीं
ईश्वर का क्या गिला करें

सिर्फ़ शायरों की मजबूरी है
दुआएँ माँगना या थाप देना
इस निरीश्वर बिखरे को
बिलावजह वतन को

जंगलों को चीरकर
आते नहीं दीखते कोई धनुर्धारी
आकाश रेखा पर कोई नहीं गदाधर

केवल उनके इंतज़ार में गाफ़िल
मैं ख़ुद को नहीं बख्शूँगा सुकून
इस मुल्क के बच्चों के वुजूद से
बेख़बर, बेजबाँ ।

ऐश्वर्य तो तुम्हें नहीं देगा यह
ऎश्वर्य तो तुम्हें नहीं देगा यह जीवन
लगातार भटकते दुनिया भर में
तुम रह जाओगे अपने जीवन में

याद रह जाएगी कोई एक कविता
अपना आख़िरी दिनों का उदास चेहरा
उपहास करते दरख़्तों का दिन-रात उगना
जड़ों की शिराएँ तुम्हारे काँपते पैरों से
धरती के मर्मस्थल तक
आजीवन क्लान्ति के क्लेश पहुँचाती हुईं

ऎश्वर्य तो नहीं ही फिर भी
भाषाएँ नहीं होती खलास।