Last Update On : 25 10 2018 09:39:30 AM

जो मांस व्यापारी मोईन कुरैशी ताजातरीन जंग के केंद्र में है, वह सीबीआई के दो पूर्व डायरेक्टरों का खासमखास दल्ला रहा है और जांच एजेंसी को उंगली पर नचाता रहा है

मोदी सरकार अपने आखिरी साल में बन चुकी है भ्रष्टाचार का जलता हुआ जहाज और अब इसमें कोई शक नहीं कि झुलसेंगे आसपास वाले भी

मनमोहन सरकार में ‘भ्रष्टाचार’ को अफसरों के प्रलोभन का मुख्य हथियार बनाया जाता था, मोदी सरकार में ‘धौंस-पट्टी’ भी शामिल है। इसी का प्रतिबिम्ब है कि सीबीआई के दो भ्रष्टतम डायरेक्टर, जिनका जिक्र ऊपर आया है, एपी सिंह और रंजीत सिन्हा, कांग्रेस शासन में अवतरित हुए जबकि इस नामी एजेंसी के इतिहास की सबसे बड़ी अंतर कलह भाजपा शासन में चलती दिख रही है

सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ पूर्व आईपीएस वीएन राय का विश्लेषण

पिछले नवम्बर में जब राकेश अस्थाना को सीबीआई में एडिशनल डायरेक्टर से स्पेशल डायरेक्टर बनाया जाना था उनके बॉस आलोक वर्मा ने सीवीसी को चिट्ठी लिखकर सूचित किया कि अस्थाना के विरुद्ध छह मामलों में गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप सामने आये हैं और उनकी जांच चल रही है। न सिर्फ मोदी सरकार के सीवीसी ने इस चिट्ठी का संज्ञान नहीं लिया, बल्कि मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट अपॉइंटमेंट कमेटी ने एक ही दिन में अस्थाना की पदोन्नति पर स्वीकृति की मुहर लगा दी।

लिहाजा, बेशक सीबीआई चीफ और उनके डिप्टी फिलहाल एक दूसरे पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे हों और उन्हें छुट्टी भेजकर जिस अफसर को सीवीसी की मार्फ़त नया चीफ बनाया गया वह भी ऐसे ही आरोपों से घिरा हो, लेकिन इस बेशर्म कलह की जड़ स्वयं प्रधानमन्त्री हैं। यहां तक कि अस्थाना को अपने मंसूबों में फलने-फूलने के लिए मनमाफिक सहयोगी जुटाने का खुला अवसर भी देश के प्रधानमन्त्री के इशारे पर ही मुहैय्या हुआ।

इसी वर्ष जुलाई में आलोक वर्मा इंटरपोल की कांफ्रेंस में शामिल होने देश से बाहर क्या गये, सीवीसी की ओर से आनन-फानन में नए अफसरों को सीबीआई में लेने की बैठक बुला ली गयी। वर्मा के लिखित विरोध के बावजूद पीएमओ और सीवीसी ने अस्थाना को इस बैठक में सीबीआई का प्रतिनिधित्व करने दिया और इस तरह अस्थाना के चहेते लोग सीबीआई में शामिल कर लिए गए। इन्हीं में से एक डीएसपी को वर्मा के आदेश पर अस्थाना के विरुद्ध दर्ज हुए केस में गिरफ्तार भी किया जा चुका है।

मोदी की गुरुतर बेशर्मी के कद को उनके बड़े पद के समकक्ष होने का श्रेय जरूर दिया जाना चाहिये। आज कम ही लोगों को याद होगा कि नब्बे के दशक के शुरू में प्रधानमन्त्री चंद्रशेखर की सरकार हरियाणा पुलिस के दो सिपाहियों की निगरानी के चलते गिर गयी थी।

तब बुरी तरह उखड़े चंद्रशेखर को राजीव गांधी के दूतों ने मनाने का बहुत प्रयास किया पर बात बनी नहीं। सीबीआई में आये प्रशासनिक भूकंप की वजह कम से कम वरिष्ठ आईपीएस अफसर तो बने जो नरेंद्र मोदी की मीडिया के दम पर बनायी ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ साख को बेतरह क्षति पहुंचा गये हैं।

सीबीआई में भ्रष्टाचार की जंग कोई नई बात नहीं, बेशक इतने खुले में पहली बार नजर आ रही हो। दरअसल, जो मांस व्यापारी मोईन कुरैशी ताजातरीन जंग के केंद्र में है, वह सीबीआई के दो पूर्व डायरेक्टरों का खासमखास दल्ला रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हुयी जांच में ये दोनों डायरेक्टर घोर भ्रष्टाचार के दोषी पाये गए और स्वयं सीबीआई के जिम्मे इनके विरुद्ध केस को सिरे चढाने का कार्यभार आन पड़ा। अस्थाना और वर्मा के बीच एक दूसरे पर रिश्वत के आरोप की महाभारत में यही मुईन कुरैशी शिखंडी बनाया हुआ है।

यूं भी यह जंग सीबीआई बनाम सीबीआई न होकर अमित शाह बनाम अहमद पटेल का नमूना ज्यादा है। जितनी प्रशासनिक नहीं उससे अधिक राजनीतिक। दोटूक कहें तो केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद अमित शाह ने अपने आका के राजनीतिक हित साधने में सीबीआई को वैसे ही हांका है जैसे मनमोहन सरकार में अहमद पटेल किया करते रहे थे। संयोग से दोनों गुजरात से हैं; अमित शाह, नरेंद्र मोदी की कठपुतली भाजपा के अध्यक्ष और अहमद पटेल तब की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रमुख किरदार!

अगर अहमद पटेल के संचालन दौर में आज जैसी खुली कलह सीबीआई ने नहीं देखी तो कह सकते हैं कि आज के दिन अमित शाह की ‘तड़ीपार’ कार्य-शैली सीबीआई अफसरों के सर चढ़ कर बोल रही है। भूलना नहीं चाहिए कि शाह के गुजरात का गृह मंत्री रहते, इसी कार्यशैली के शिकार, मोदी के वफादार दो दर्जन से अधिक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हत्या और अपहरण जैसे गंभीर अपराधों में जेल पहुँच गये थे।

यहाँ, सीबीआई चलाने में, कांग्रेस और भाजपा सरकारों के चरित्र का अंतर भी अपना काम कर रहा है। जहाँ मनमोहन सरकार में ‘भ्रष्टाचार’ को अफसरों के प्रलोभन का मुख्य हथियार बनाया जाता था, मोदी सरकार में ‘धौंस-पट्टी’ भी शामिल है। इसी का प्रतिबिम्ब है कि सीबीआई के दो भ्रष्टतम डायरेक्टर, जिनका जिक्र ऊपर आया है, एपी सिंह और रंजीत सिन्हा, कांग्रेस शासन में अवतरित हुए जबकि इस नामी एजेंसी के इतिहास की सबसे बड़ी अंतर कलह भाजपा शासन में चलती दिख रही है।

मौजूदा सीबीआई तनाव की छानबीन के क्रम में निम्न पक्षों, आयामों व प्रसंगों को ध्यान में रखने से सहजता होगी।

1. सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा की छुट्टी होने से रेखांकित हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच एजेंसी को पिंजड़े में कैद तोता यूँ ही नहीं कहा था- ‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’ हुंकार की दैत्याकार छवि को सहेजने वाला मोदी भी तोते के जरा सा स्वतंत्र पर फड़फड़ाने को सह नहीं सका।

2. वर्मा को एक मिनट किनारे रख दीजिये। वर्तमान कलह में शामिल शेष दो किरदार, वर्मा विरोधी स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना और वर्मा सहयोगी एडिशनल डायरेक्टर अरुण शर्मा की सीबीआई में आने की औकात को समझिये। गुजरात कैडर के ये दोनों अधिकारी राज्य में अमित शाह के प्यादे रहे थे।

3. अस्थाना ने कुख्यात गोधरा काण्ड को एक स्वतः स्फूर्त हिंसक उपद्रव से बदल कर अंतर्राष्ट्रीय मुस्लिम आतंकी साजिश बना दिया था। इसी तरह शर्मा ने अमित शाह के निर्देश पर ‘साहब’ के लिए उस आर्किटेक्ट महिला की जासूसी करायी थी जिसका नाम मोदी के साथ जोड़ा जाता रहा है।

4. दो वर्ष पहले, वर्मा के पूर्ववर्ती सुनील सिन्हा के रिटायर होने से ठीक पहले मोदी-शाह ने सीबीआई के अगले वरिष्ठ अधिकारी को तो तबादले पर सीबीआई से बाहर भेज दिया और तब काफी जूनियर अस्थाना को कार्यवाहक डायरेक्टर का चार्ज दे दिया। सुप्रीम कोर्ट के दखल से सेलेक्शन समिति की बैठक हुयी जिसमें मोदी के अलावा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व नेता विपक्ष लोकसभा भी थे, और मजबूरी में वर्मा को चुनना पड़ा।

5. वर्मा को भी, जो उस समय दिल्ली के पुलिस कमिश्नर होते थे, अमित शाह के दरबार में हाजिरी लगाने के बाद ही डायरेक्टर की कुर्सी के लिए मोदी की हाँ नसीब हुयी थी। ऐसा भी नहीं कि वर्मा ने मोदी-शाह से निभाया नहीं। उदाहरण के लिए मायावती और मुलायम पर कांग्रेस के जमाने से लटकती तलवार का हौव्वा बनाए रखना, ठंडे किये जा रहे व्यापमं प्रकरण को ठंडा रखना और विजय माल्या फरारी पर ढक्कन लगाए रखना, आम लोगों की स्मृति में भी बने हुए हैं।

6. तब भी अस्थाना की शाह समर्थित रंगबाजी के सामने वर्मा ने घुटने नहीं टेके और इसके लिए उन्होंने अभूतपूर्व प्रशासनिक क्षमता दिखायी है। अब वे मामले को सुप्रीम कोर्ट में भी ले गये हैं। उनकी दो वर्ष की तैनाती इस आधार पर समाप्त नहीं की जा सकती कि ‘तोता ज्यादा ही पर फड़फड़ाने लगा था।

मैंने कुछ दिन पहले मोदी को ऐसा डूबता जहाज कहा था, जिसे छोड़कर चूहे भागने लगे हैं। दरअसल, वे जलता हुआ जहाज सिद्ध हो रहे हैं और इस जहाज पर सवार हर व्यक्ति तक आंच पहुंचेगी।