Last Update On : 10 03 2018 07:08:00 PM

सही खबर को तलाशने और लोगों तक पहुंचने में छह गुना अधिक समय लगता है। वहीं झूठी खबरें या जानकारियां ज्यादा दूर तक और ज्यादा लोगों तक बहुत तेजी से पहुंच जाती हैं…

इंटरनेट क्रांति से सोशल मीडिया के जरिए जहां कोई भी सच छुपना आसान नहीं है, लोगों का अपनी बात सबके बीच पहुंचाने का यह एक मजबूत माध्यम बना है, उसी तरह और उसी अनुपात में झूठी खबरें भी सोशल मीडिया के जरिए खूब प्रचारित—प्रसारित होती हैं।

अमेरिका के मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने झूठी खबरों पर एक रिसर्च किया है। अध्ययन में यह बात सामने आई है कि झूठी खबरें 70 फीसदी से भी अधिक बार रीट्वीट की गई हैं। यह बात भी शोध में सामने आई है कि सोशल मीडिया से झूठी खबरें छह गुना अधिक तेजी से फैलती हैं।

सोशल मीडिया पर खबरों के जरिए फैलते झूठ के अध्ययन के लिए 2006 से 2017 के बीच माइक्राब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर ट्वीट की गईं 1.26 लाख खबरों पर नजर रखी गई। इसी से यह पता चला कि झूठी खबरों को 70 फीसदी से अधिक बार रीट्वीट किया गया, जबकि दूसरी तरफ सच्ची और सही खबरों को प्रसारित—प्रचारित होने में इसके बजाय अधिक समय लगता है।

कई वेबसाइट और टीवी शो भी फेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करने के लिए शुरू हो चुके हैं। हमारे देश के नेता फेक न्यूज को जमकर बढ़ावा दे रहे हैं पहले भी कई नेता फेक न्यूज़ शेयर करके फंस चुके हैं। 

इस अध्ययन में प्रमुख शोधकर्ता और शोध के सहलेखक देब रॉय कहते हैं, सही खबर को तलाशने और लोगों तक पहुंचने में छह गुना अधिक समय लगता है। वहीं झूठी खबरें या जानकारियां ज्यादा दूर तक और ज्यादा लोगों तक बहुत तेजी से पहुंच जाती हैं। गौरतलब कि सोशल मीडिया की झूठी खबरों पर किया गया यह अध्ययन साइंस पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है।

पिछले साल भाजपा नेता नूपुर शर्मा ने अपने ट्विटर हैंडल पर गुजरात दंगों के दौरान न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक तस्वीर शेयर करते हुए उसे उसे बंगाल में चल रहे बवाल व दंगों की तस्वीर बताते हुए लोगों से बंगाल को बचाने का आह्वान किया था। इस फेक फोटो के लिए उनकी खूब लानत—मनानत हुई थी। बीजेपी नेता नूपुर शर्मा ने इस झूठी फोटो के जरिए लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश करते हुए कहा था कि जंतर मंतर पर एकजुट होने की अपील करते हुए कहा था कि जाग जाओ इससे पहले देर हो जाए। 

गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर फैलती झूठी खबरों पर रिसर्च करने वाले प्रोफेसर रॉय एमआईटी की लैबोरेटरी फॉर सोशल मशीन्स चलाते हैं और वह ट्विटर के पूर्व मुख्य मीडिया वैज्ञानिक भी रह चुके हैं। उनके मुताबिक अध्ययन के नतीजे वाकई चौंकाने वाले थे। रिसर्चर्स के मुताबिक इस शोध से ऑनलाइन संपर्क तंत्र को समझने में आसानी होगी।

शोधकर्ताओं ने उदाहरणों के साथ बताया है कि किस तरह की झूठी खबरें सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती हैं। जैसे कि 2013 में बोस्टन मैराथन के दौरान हुए बम धमाके के बाद सोशल मीडिया पर कई झूठी और भ्रामक खबरें छाईं रहीं। इस धमाके के बाद आठ साल की एक बच्ची के मारे जाने की खबर खूब वायरल हुई थी, जिसमें कहा गया था कि यह बच्ची एक साल पहले हुए सैंडी हुक स्कूल हत्याकांड में मारे गए लोगों की याद में दौड़ रही थी। जबकि यह खबर सरासर झूठी थी, क्योंकि बच्चों को इस मैराथन में दौड़ने ही नहीं दिया गया था।

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रिसर्चर्स के मुताबिक सच जहां बामुश्किल 1000 लोगों के बीच पहुंच पाता है, वहीं उसी समयावधि में झूठी खबरें 10,000 लोगों के बीच मजबूत पकड़ बना लेती हैं। ज्यादातर वायरल होने वाली झूठी खबरें न सिर्फ अचरज पैदा करने वाली होती हैं, बल्कि उनसे घृणा और भय का माहौल भी बनता है।

इसी तरह की कई खबरें अकसर सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं, जिनमें से कई तो समाज को काफी हद तक नुकसान पहुंचाने वाली होती हैं। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष के बतौर कहा कि ज्यादातर झूठी खबरें वायरल करने के पीछे लोगों की कोई खास मंशा नहीं होती, मगर यह अटेंशन पाने का माध्यम भर होती हैं।