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एक प्राइवेट कंपनी ‘नार्डिक क्रूज प्राइवेट लिमिटेड’ को फायदा पहुंचाने के लिए हजारों-लाखों लोगों की आजीविका भाजपा सरकार द्वारा छीनी जा रही है। इससे भाजपा का वर्गीय चरित्र भी समझ आएगा कि वह किस तरह छोटे पूंजीपतियों का पेट काटकर चंद बड़े पूंजीपतियों की जेब भरी जा रही है….

बता रहे हैं अभिषेक आज़ाद

बनारस में विकास के नाम पर अलकनंदा क्रूज का उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी द्वारा उद्घाटन किया गया। अलकनंदा क्रूज 84 सीटों की एक बड़ी डबल डेकर नाव है, जिसमें 60 सीटें निचली डेक पर और 24 सीटें ऊपरी डेक पर है। यह 5 सितारा होटल की तरह विलासिता पूर्ण है। सेमिनार, पार्टी और कॉर्पोरेट इवेंट्स के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह आपको 75,000 रूपये में 11 पंडितों द्वारा रुद्राभिषेक की सुविधा भी देता है। इसकी कीमत 1 करोड़ रुपये है। इसका संचालन ‘नार्डिक क्रूज प्राइवेट लिमिटेड’ नामक एक प्राइवेट कंपनी कर रही है।

अलकनंदा क्रूज के उद्घाटन को इस तरह से बड़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, जैसे यह सरकार की कोई बड़ी विकास योजना हो और इससे लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार मिलने वाला हो। मीडिया ने क्रूज का इस तरह से बढ़—चढ़कर गुणगान किया, जैसे इसके आने से कोई क्रांति हो गयी हो।क्रूज नाव पर तैरता हुआ एक रेस्त्रां है। अब आप गंगा के बीचोंबीच रेस्त्रां का लुफ्त ले सकते हैं। गंगा के बीच में एक रेस्त्रां खुला है, जिसका उद्घाटन करने मुख्यमंत्री जी पहुंच गए।

गौरतलब है कि क्रूज को प्राइवेट कंपनी चला रही है और इसका सरकार से कोई लेना देना नहीं है। एक बड़े पूंजीपति ने एक बड़ी सी नाव खरीदी और उसका उद्घाटन करने के लिए मुख्यमंत्री को बुला लिया। बस इतनी सी बात को सरकार अपनी उपलब्धि और विकास के रूप में पेश कर रही है।

बीजेपी के लिए एक निजी रेस्त्रां का खुलना भी एक बड़ा विकास है। बीजेपी के विकास मॉडल को समझना होगा। एक निजी कम्पनी को नवरत्न का पुरस्कार दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री निजी नाव/रेस्त्रां का उद्घाटन कर रहे हैं। एक निजी कम्पनी प्रधानमंत्री को सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री का पुरस्कार दे रही है। ये कैसा विकास है? और किसका विकास है?

जब से क्रूज चला है तब से स्थानीय लोगों की नावों के लाइसेंसों का रिन्यूअल नहीं हो रहा है। बनारस के दशाश्वमेध घाट पर गंगा में पूरे 84 घाट के नाविक समाज के लोग जुटे। उन्होंने अपनी नाव को बंद कर विरोध प्रदर्शन किया। उनके हाथों में तख्तियां थीं और वे सरकार विरोधी नारे लगा रहे थे। उनका कहना है कि गंगा में क्रूज चलाकर सरकार बड़े पूंजीपतियों की मदद करना चाहती है और उन जैसे गंगा पुत्रों का पेट काटना चाहती है। उन्होंने सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि गंगा में क्रूज की योजना बंद करे, वरना हम लोग गंगा में इस पर से उस पार तक पूरे बनारस की नाव बांधकर विरोध करेंगे और आगामी चुनाव में पूरे देश में इनके विरोध में प्रचार करेंगे।

क्रूज चलाने को हरी झंडी देने पर नाविकों में भारी रोष व्याप्त रहा। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इसके खिलाफ 1100 नाविक 28 दिसंबर से हड़ताल पर बैठे कि क्रूज को लाकर उनके पेट पर लात मारी जा रही है। इससे उनके रोजगार पर संकट गहरायेगा। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा कॉरपोरेट्स के साथ खड़े होकर उनकी रोजी रोटी छीनी जा रही है।

यहां पर क्रूज मालिकों और नाविक समाज के हितों के टकराव के माध्यम से हम बड़ी पूंजी और छोटी पूंजी के विरोधाभास को समझ सकते हैं। नावों को क्रूज के रास्ते से हटाने के लिए लाइसेंसों का रिन्यूअल बंद कर दिया गया है। एक प्राइवेट कंपनी ‘नार्डिक क्रूज प्राइवेट लिमिटेड’ को फायदा पहुंचाने के लिए हजारों-लाखों लोगों की आजीविका छीनी जा रही है। इससे हमें भाजपा का वर्गीय चरित्र भी समझ आएगा कि वह किस तरह छोटे पूंजीपतियों का पेट काटकर चंद बड़े पूंजीपतियों की जेब भर रही है।

क्रूज को चलाने के लिए नदियों में बहुत अधिक मात्रा में पानी की जरूरत पड़ेगी। गर्मी के महीनों में अक्सर नदियां सूख जाती हैं। कम पानी में क्रूज का चलना सम्भव नहीं होगा। ऐसे हालात में नदियों में पानी की उपलब्धता बनाये रखने के लिए नहरों व सहायक नदियों में पानी के प्रवाह को रोकना पड़ेगा।

यदि नहरों, सहायक नदियों और छोटी-छोटी धाराओं में पानी के बहाव को रोका गया तो किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पायेगा, जिससे एक बहुत बड़ा सिंचित उपजाऊ क्षेत्र बंजर हो जायेगा। इतना सबकुछ करने के बाद भी जल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। सरकार अगर क्रूज चलाने की अव्यावहारिक ज़िद पर अड़ी रही तो समाज के एक बड़े तबके को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचायेगी।

भारतीय जनता पार्टी जमीनी काम करने के बजाए हवा-हवाई बातें करती है। क्रूज को सरकार के अंतिम साल में लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र चलाया गया है। यह एक राजनीतिक जुमला है। भारतीय नदिया क्रूज के संचालन के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इसके लिए बारहों महीने जल से भरी रहने वाली सदाबहार नदियां उपयुक्त होती हैं, किन्तु सभी भारतीय नदिया बरसात में उफ़न जाती हैं और गर्मी आते-आते सूख जाती हैं।


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