दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशनल क्लब में 6 अप्रैल को धूमधाम से मनी फॉरवर्ड प्रेस की 10वीं सालगिरह

सुशील मानव

दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशनल क्लब ऑफ इंडिया के डिप्टी स्पीकर हॉल में फॉरवर्ड प्रेस की दसवीं सालगिरह मनाई गई। इस मौके पर फॉरवर्ड प्रेस के संरक्षक और संचालक इवान कोस्टका की किताब “फॉरवर्ड थिंकिंग; एडीटोरियल, एसे इट्स (1996-2016)” का लोकार्पण किया गया।

अपने वक्तव्य में बोलते हुए इवान कोस्टका ने कहा कि उन्होंने 10 वर्ष पूर्व देश के दलितों—बहुजनों की आवाज को स्वर देने के लिए फॉरवर्ड प्रेस की शुरुआत की थी। फॉरवर्ड प्रेस नाम देते हुए हमारा दृष्टिकोण ये था कि हम फॉरवर्ड सोचेंगे, देखेंगे साथ ही हम अपनी आंखें पीछे भी रखेंगे, जबकि लोग या तो फॉरवर्ड देखते हैं या फिर बैकवर्ड।

इवान कोस्टका ने कहा ज्योतिबा फुले सही मायने में भारतीय परिप्रेक्ष्य में सामाजिक न्याय के जनक थे। फुले ने हमें फॉरवर्ड सोचने और सामाजिक न्याय की दिशा में आगे बढ़ने का एक कैंपस दिया। बाबा साहेब अंबेडकर जोकि कार्ल मार्क्स से बहुत प्रभावित थे उन्होंने कहा था कि हमारा काम फुले के बिना नहीं चल सकता। अंबेडकर और फुले दोनों दलित बहुजन आइकॉन थे। ज्योतिबा फुले ने जहां अपने काम और किताब से ब्राह्मणवाद को डिकंस्ट्रक्ट (विखंडित) किया, वहीं अंबेडकर ने भारत का संविधान क्रॉफ्ट करके सामाजिक न्याय पर आधारित नई लोकतांत्रिक व्यवस्था कंस्ट्रक्ट की।

सुविख्यात ​दलित लेखक कांचा इलैय्या भी अपनी किताब ‘मैं हिंदू क्यों नहीं हूँ’ में ब्राह्मनिज्म को डिकंस्ट्रक्ट करते हैं और फिर बहुजन संस्कृति को रिकंस्ट्रक्ट करते हैं। इवान कोस्टका ने आखिर में कहा कि मेरी चिंता भविष्य को लेकर ये है कि उत्तर आधुनिकता सत्य को खत्म न कर दे। लेकिन फिर फुले याद आते हैं तो मन इस विश्वास से भर उठता है सत्यमेव जयते।

कार्यक्रम में बहुजन और ‘इंटिलेक्चुअल कैपिटल’ मुद्दे पर ब्रज रंजन मणि, जस्टिस वी ईश्वरैय्या और पी.एस. कृष्णन ने अपनी बातें रखीं।

ब्रजरंजन मणि ने कहा, कैपिटल कई तरह के होते हैं। इनमें सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक, कार्पोरेट, मीडिया, इंटरप्राइजेज, उच्च शिक्षा आदि कई तरह के कैपिटल होते हैं। इन सभी कैपिटल के 98 प्रतिशत पर सवर्णों का कब्जा है। आज सिर्फ एक वैश्विक नागरिकता है, जिसमें सिर्फ अरबनाईजेशन और मॉडर्नाइजेशन होता है। संस्कृतिकरण और आधुनिकीकरण एक साथ किया जा रहा है, यह मूर्खता नहीं तो क्या। दरअसल संस्कृतिकरण ही ब्राह्मणीकरण है।

पीएस कृष्णन ने कहा कि आज सुप्रीम कोर्ट में एक भी दलित—बहुजन समाज का जज नहीं है, न ही किसी हाईकोर्ट में। सचिवालय में एक भी दलित बहुजन नहीं है, सोशल जस्टिस कहां है। भूमिविहीन लोग बदतर स्थिति में हैं। इसमें सेवा देने वाले लोग, सफाईकर्मी आदि हैं। ओबीसी समाज के जिन लोगों के पास थोड़ी भी जमीन है, वो बेहतर स्थिति में हैं। एससी, एसटी ओबीसी और अल्पसंख्यको के लिए एक थिंक टैंक बनाए जाने की ज़रूरत है।

आखिरी वक्ता के तौर पर बोलते हुए जस्टिस वी ईश्वरैय्या ने कहा- नारायण गुरु, पेरियार स्वामी, ज्योतिबा राव फुले आदि ने हमारे समाज के लिए एक दिशा तय की थी। मैकाले महिषासुर था। उसने ब्राह्मणवादी संरचना पर हमला किया। गीता में भी हिंदू का धर्म के रूप में कहीं उल्लेख नहीं है। ब्राह्मणवाद ने हमारे चार्वाक संस्कृति को नुकसान पहुंचाया है। चतुर्वर्ण और जाति व्यवस्था बनाकर उन्होंने हमारी संस्कृति को ध्वस्त कर दिया। निजी शिक्षा को खत्म करके स्कूल शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किया जाए। सबके लिए एक कॉमन एजुकेशन हो। इसके अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए। सबके लिए काम का अधिकार दिया जाए तबी सही मायने में संविधान लागू हो पाएगा।

कार्यक्रम के आखिर में इवान कोस्टका की पत्नी और फॉरवर्ड ट्रस्ट की संरक्षक मिसेज कोस्टका ने फॉरवर्ड प्रेस के विजन और उद्देश्य को सार्थक और सफल तरीके से आगे बढ़ाने वाले फॉरवर्ड प्रेस के मैनेजिंग एडिटर प्रमोद रंजन और उनकी टीम रामू सिद्धार्थ, नवल किशोर, अनिल जी और क्षितिज जी का विशेष आभार व्यक्त किया।

कार्यक्रम में दर्जनों जाने माने पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने हिस्सेदारी की।


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