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राफेल डील से पहले मोदी सरकार ने हटा दिया था एंटी करप्शन क्लॉज

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

राफेल डील पर सोमवार 10 फरवरी को द हिंदू ने एक और खुलासा किया है। इससे सत्ता के गलियारों में हड़कम्प मच गया है। द हिंदू के आज के अंक में प्रकाशित एन राम की बाईलाईन रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्रांस के साथ हुई इस डील के समझौते पर दस्तख्त करने से चंद दिन पहले ही सरकार ने इसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ पेनाल्टी से जुड़े अहम प्रावधानों को हटा दिया था।

द हिंदू के अनुसार सरकार ने 2013 की डीपीपी शर्तों पर राफेल डील साइन की थी, लेकिन इसने पेनाल्टी, अनुचित प्रभाव। इंटग्रिटी पैक्ट और एजेंट/एजेंसी से जुड़े कमीशन और खातों तक पहुंच से जुड़े प्रावधान इस सौदे से हटा दिया और कुछ में बदलाव भी किए। सरकार ने उस क्लॉज को भी हटा दिया, जिसमें कहा गया था कि दोनों कंपनियों को पेमेंट के लिए फ्रांस सरकार एक एस्क्रॉ अकाउंट ऑपरेट करेगी।

द हिंदू के अनुसार उच्च स्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण भारत सरकार ने सप्लाई प्रोटोकॉल से मानक रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) की उन धाराओं को हटा लिया था, जिनके तहत ‘बेजा दबाव और दलालों तथा एजेंसियों के इस्तेमाल पर दंड लगाने’ का प्रावधान था। इसके साथ ‘दसॉ एविएशन व एमबीडीए फ्रांस के कंपनी खातों में पहुंच के अधिकार’ देने वाले प्रावधानों को भी हटा लिया गया।

द हिन्दू ने आधिकारिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा है कि तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने सितंबर 2016 में दो सरकारों के बीच हुए एग्रीमेंट, सप्लाई प्रोटोकॉल, ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट और ऑफसेट शेड्यूल में 8 बदलाव मंजूर किए थे।रिपोर्ट के मुताबिक राफेल सौदे में उच्च स्तरीय राजनीतिक दखलंदाजी हुई थी। अनुचित प्रभाव के इस्तेमाल पर जुर्माना, एजेंट कमीशन, दैसो और एमबीडीए फ्रांस कंपनी के खाते तक पहुंच के प्रावधान डील के मसौदे से हटा दिए गए थे।

द हिंदू के अनुसार 23 सितंबर 2016 को भारत और फ्रांस के बीच हुए एग्रीमेंट के मुताबिक दैसो राफेल विमानों की सप्लायर है और एमबीडीए फ्रांस भारतीय वायुसेना के लिए हथियारों की सप्लायर है। राफेल सौदे का एग्रीमेंट और दस्तावेजों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी (सिक्योरिटी) 24 अगस्त 2016 को ही मंजूर कर चुकी थी।

प्रावधानों के सौदे में छूट
द हिंदू की रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार के दखल के बाद अनुचित ढंग से सौदे को प्रभावित करने, एजेंट और एजेंसी के कमीशन और दसॉ और एमबीडीए फ्रांस के अकाउंट के खातों तक पहुंच पर जुर्माने से संबंधित स्टैडर्ड डिफेंस प्रॉक्यूरमेंट प्रोसिजर यानी डीपीपी के प्रावधानों से सौदे को छूट दे दी गई थी। इस कदम से मोदी सरकार के कथित भ्रष्टाचार विरोधी दावों पर गम्भीर प्रश्नचिंह लगा है। 2014 में मोदी सरकार यूपीए सरकार के कथित भ्रष्टाचारों को निशाना बना कर सत्ता में आई थी।

ऑफसेट शेड्यूल में बदलाव
द हिंदू के अनुसार पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की अगुआई वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डिएसी ने सितंबर 2016 में समझौते, सप्लाई प्रोटोकल, ऑफसेट कांट्रेक्ट और ऑफसेट शेड्यूल में आठ बदलावों का समर्थन किया था और इन्हें मंजूर किया था। यह सब पीएम मोदी की अगुआई में रक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक में समझौते और इससे जुड़े दस्तावेजों को मंजूरी देने के बाद हुआ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की सुरक्षा कमेटी ने 24 अगस्त 2016 को इस डील से जुड़े दस्तावेज़ों को मंजूरी दी थी, जिसके बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद परिषद् की सितंबर 2016 में हुई बैठक में इन प्रावधानों का हटाया गया। इस रिपोर्ट में साथ ही बताया गया कि फ्रांस के साथ इस सौदे के लिए बातचीत कर रही टीम में शामिल तीन अधिकारियों एमपी सिंह, एआर सुले, राजीव वर्मा ने इस प्रावधानों को हटाए जाने पर सख्त ऐतराज जताया था, लेकिन उनकी आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया।

आईजीए में आठ बदलाए किए गए
यह महत्वपूर्ण है कि फ्रांस की सरकार के साथ की जा रही प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की “समानांतर वार्ताओं” पर द हिंदू द्वारा प्रकाशित इस जानकारी और न ही अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई सामग्री में शामिल नहीं किया। उच्च-स्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप का का निहितार्थ है कि मानक रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) से डसॉल्ट एविएशन और एमबीडीए फ्रांस के “अनुचित प्रभाव, एजेंट्स / एजेंसी कमीशन, और कंपनी खातों तक पहुंच के लिए दंड” के नियम को भारत सरकार ने आपूर्ति प्रोटोकॉल से हटा दिया।

द हिंदू के पास मौजूद आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर परिकर की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने सितंबर 2016 में मुलाकात की, और अंतर सरकार समझौता (आइजीए), आपूर्ति प्रोटोकॉल, ऑफसेट अनुबंध और ऑफसेट शेड्यूल में आठ बदलावों को “परिवर्तन और अनुमोदित” किया। यह 24 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में रक्षा सौदों की कैबिनेट समिति (सीसीएस) की आईजीए और संबंधित दस्तावेजों को सहमति दिए जाने के बाद किया गया था।

इन आठ बदलावों में सबसे अहम बदलाव उप-पैरा (सी) में किया गया, जो वाइस एडमिरल अजीत कुमार द्वारा हस्ताक्षरित एक नोट में दर्ज है।अजित कुमार डीसीआईडीएस (पीपी एंड एफडी) और डीएसी के सदस्य-सचिव थे। इसमें कहा गया है कि आपूर्ति प्रोटोकॉल में ‘अनुचित प्रभाव के लिए दंड, एजेंट्स / एजेंसी कमीशन’, और ‘कंपनी खातों तक पहुंच’ से संबंधित मानक डीपीपी के नियम से हटाए जाएं।

यह बेहद महत्वपूर्ण है कि भारत सरकार द्वारा आपूर्ति प्रोटोकॉल से इन नियमों को हटा दिया गया था।जबकि अंतर सरकार समझौता (आइजीए) भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच बड़ा समझौता था, और दो निजी कंपनियों डसॉल्ट और एमबीडीए को आपूर्ति प्रोटोकॉल का पालन करना था।

रक्षा ख़रीद प्रक्रिया की शर्तों का उल्लंघन
द हिन्दू के अनुसार 2013 में बनाए गए रक्षा ख़रीद प्रक्रिया की शर्तों को हर रक्षा ख़रीद पर लागू किया जाना था।एक स्टैंडर्ड प्रक्रिया अपनाई गई थी कि कोई भी डील हो इसमें छूट नहीं दी जा सकती। मगर भारत सरकार ने फ्रांस की दो कंपनियों डसाल्ट और एमबीडीए फ्रांस को अभूतपूर्व रियायत दी।रक्षा मंत्रालय के वित्तीय अधिकारी इस बात पर ज़ोर देते रहे कि पैसा सीधे कंपनियों के हाथ में नहीं जाना चाहिए। यह सुझाव दिया गया कि सीधे कंपनियों को पैसे देने की बजाए एस्क्रो अकाउंट बनाया जाए और उसमें पैसे रखे जाएं।

यह खाता फ्रांस की सरकार का हो और वह तभी भुगतान करे जब डसाल्ट और एमबीडीए फ्रांस सारी शर्तों को पूरा करते हुए आपूर्ति करें। यह प्रावधान भी हटा दिया गया। द हिन्दू के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय से ये महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए हैं।


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