Last Update On : 07 12 2017 09:11:00 AM

गुजरात चुनावों के मद्देनजर #EVM पर हिमांशु यादव का विश्लेषण

जिस तरह से EVM की विश्वसनीयता को लेकर देशभर के विभिन्न कोनों से सवाल उठ रहें है और वही हाल के हुए विधानसभा एवं नगर निकाय चुनावों में, EVM को लेकर जो अनियमितता की बात हो रही है. आज वह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के अस्तित्व लिए चुनौती साबित हो रहा है.

इसको लेकर गुजरात चुनाव से पहले ही, सोशल मीडिया पर वहां के युवाओं ने EVM के विरोध में एक बड़ा कैम्पेन शुरू कर चुके हैं. जिसका असर गुजरात के करीब देश के अन्य राज्यों में साफ़ पड़ता दिखाई पड़ रहा है. जिसमें युवाओं द्वारा यह अपील किया जा रहा है कि देश का कोई भी नागरिक EVM को बैन लगाने के लिए जन अपील के माध्यम से चुनाव आयोग तक अपना सन्देश पहुंचाने के लिए, सोशल मीडिया के माध्यम से यानि You Tube, Facebook, Twitter एवं अन्य माध्यमों के द्वारा EVM को बैन कर, बैलेट पेपर से चुनाव कराने की माँग किया जा रहा है. जिसमें सबसे ज्यादा पापुलर 30-40 सेकेण्ड का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करने की बात की जा रही है.

अगर हाल के दिनों में EVM के खिलाफ सबसे ज्यादा सवाल तब खड़े हुए जब उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा सहित अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आये. तो विपक्षी दलों ने, EVM से हुए घपले को लेकर बड़े जोर-शोर से सवाल खड़े किये लेकिन इसको लेकर इन पार्टियों ने जन-भावनाओं जाने बगैर या फिर, जनता की सामूहिक चेतना की माप-तौल किये बिना सत्ता पक्ष पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है.

इसको लेकर मुख्य विपक्षी पार्टियों में से एक ‘आम आदमी पार्टी’ की तरफ से, इसकी अनियमितता को लेकर दिल्ली विधानसभा में डेमो भी दिया गया. लेकिन उसके बाद, गाहे-बगाहे EVM की गड़बड़ी को लेकर बाते होती रही लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश के नगर निकाय के परिणाम आये, वैसे ही हर तरफ से, इसके परिणाम को लेकर विरोध का दौर शुरू हो गया. लगभग सभी विपक्षी पार्टियों व सिविल सोसायटी के लोगों ने EVM से चुनाव कराने को लेकर व उसकी विश्वसनीयता पर दोबारा सवाल खड़े किये.

जिसका आधार यह था कि उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सिर्फ शहरी इलाकों में जीत दर्ज की. जहाँ सिर्फ EVM से चुनाव हुए. वहीँ दूसरी तरफ जहाँ-जहाँ बैलेट पेपर से चुनाव हुए वहाँ भाजपा की बड़ी हार हुई. अगर वोटिंग का प्रतिशत देखा जाय तो नगर निकाय की चुनावी नतीजें भाजपा के विरोध में खड़े हुए नजर आते हैं. खैर इस नगर निकाय चुनाव से एक बात ख़ास तौर से साफ़ हो गया कि EVM का देश में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. जहाँ बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों मायावती ने यहाँ तक चुनौती दे डाली कि वह अपने नगर निकाय चुनाव में जीते हुए प्रत्याशियों का इस्तीफ़ा तक कर देने को कहा है.

वहीँ अगर इसके इतिहास के बारे में बात करें तो देश में EVM की शुरुआत १९८० में या फिर EVM का उपयोग पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर किया गया तभी से EVM की विश्वसनीयता को लेकर देश में विमर्श शुरू हो गया. इसका सबसे प्रखर विरोध भारतीय जनता पार्टी ने शुरू की. भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमनियम स्वामी की अध्यक्षता में 2010 में EVM और उसकी पारदर्शिता पर अन्तराष्ट्रीय सम्मलेन आयोजित किया गया जिसमें निष्कर्ष निकला की EVM की पारदर्शिता संदिग्ध है.

अप्रैल 2010 में हैदराबाद के इंजीनयर हरि प्रसाद ने अपनी विदेशी टीम के साथ EVM की तकनीक पर शोध किया जिसका निष्कर्ष निकला कि EVM के साथ छेड़छाड़ संभव है इसलिए चुनाव प्रणाली को विश्वसनीय बनाए रखने के लिए बैलेट पेपर से ही चुनाव होने चाहिए.

और वहीँ 2012 में सुब्रमनियम स्वामी ने दिल्ली हाई-कोर्ट में EVM के खिलाफ पेटीशन दायर की जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला था कि EVM टेम्पर प्रूफ नहीं है और चुनाव आयोग अपने स्तर पर इसे दुरुस्त करने का प्रयास करे चूंकि सुब्रमनियम स्वामी EVM को हटाकर बैलेट पेपर से चुनाव कराना चाहते थे. इसलिए उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायलय में इसके खिलाफ फिर से पीटिशन डाली. जिस पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 8 अक्टूबर, 2013 के अपने फैसले में चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाई और तीन महीने के अन्दर हर EVM के साथ VVPAT मशीन लगाने का आदेश दिया. इसके बावजूद भी चुनाव आयोग ने अब तक हर EVM के VVPAT मशीन अब तक उपलब्ध नही करायी है.

सोशल मीडिया पर #banEVM मूवमेंट चलाने वाले व गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी ‘आकाश नबाव’ का कहना है कि आखिर क्या कारण है जो भारतीय जनता पार्टी सत्ता से बाहर रहते हुए EVM से वोट कराने का जबरदस्त विरोध कर रही थी. वही आज सत्ता में आकर EVM को सही ठहरा रही है.

दूसरी पार्टियों का EVM पर ढुलमुल रवैया होने का कारण आगे आकाश नबाव यह बताते हैं कि यह भारतीय लोकतंत्र की हत्या की साजिश है इसलिए देश के सभी नागरिकों को एक जुटकर होकर EVM के खिलाफ अपनी आवाज उठानी चाहिए तभी भारत में लोकशाही सुरक्षित रहेगी.

(हिमांशु यादव गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय में जर्मन भाषा के परास्नातक के छात्र हैं तथा ‘भगत सिंह विचार मंच’ के संयोजक हैं.)