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कत्थक इबादत है और गुरु ईश्वर, आज कत्थक का सम्मान, अस्तित्व, शास्त्रीयता सब कुछ गुरुओं के कारण है…

नयी दिल्ली, जनज्वार। ‘जो असम्भव लगता हो, उसे संभव करने के तरीके तलाशना ही एक अच्छे शिष्य की विशेषता है, जिस तरह तीर को दूर तक फेंकने के लिए धनुष की प्रत्यंचा को उतना ही पीछे खिंचा होता है, उसी तरह नृत्य कला में अपने गुरु, उनके गुरु और उनके गुरु के कार्यों को जानना कलाकार को आगे ले जाता है, जितना अतीत का अन्वेषण करेंगे उतना ही आगे जाएंगे।’

यह उदगार कत्थक केंद्र के अध्यक्ष, प्रख्यात रंगकर्मी शेखर सेन ने व्यक्त किए। वे दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित कत्थक केंद्र में सम्पन्न डॉ चित्रा शर्मा की पुस्तक –‘गुरु मुख से’ के लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के बतौर बोल रहे थे।

इस आयोजन में प्रख्यात कत्थक गुरु शोभना नारायण, कत्थक गुरु राजेन्द्र गंगानी और पंडित जयकिशन जी महाराज और जाने माने साहित्यकार लीलाधर मंडलोई विशेष अतिथि थे। उल्लेखनीय है कि चित्रा शर्मा की इस पुस्तक में कत्थक के सभी घरानों के 17 गुरुओं के साक्षात्कार को प्रस्तुत किया गया है.

कार्यक्रम की शुरुआत में चित्रा शर्मा ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि कत्थक उनके लिए इबादत है और गुरु उनके लिए ईश्वर। आज कत्थक का सम्मान, अस्तित्व, शास्त्रीयता सब कुछ गुरुओं के कारण है।

लीलाधर मंडलोई ने इस अवसर पर कत्थक के संगतकारों पर भी इसी तरह के शोधपरक पुस्तक की आवश्यकता पर जोर दिया। राजेंद्र गंगानी ने कहा कि उनके गुरु कहते थे की कुछ लिखना नहीं है, सबकुछ सीधे दिल से याद करो तो कभी नहीं भूलोगे। उनका मानना है की कत्थक को वीडियो या स्काईप से नहीं सिखाया जा सकता, यह कला गुरु के सामने, साथ में ही सीखी जा सकती है।

शोभना नारायण का वक्तव्य कत्थक में आ रहे परिवर्तन, उसकी मौलिकता और शास्त्रीयता पर केन्द्रित था। उन्होंने कहा कत्थक में गत पांच दशकों में कई प्रयोग हुए – पेश करने के ढंग और चमक भले ही अलग हो गयी हो, लेकिन मूल आत्मा वही रही।

इस तरह की पुस्तकें आने वाले दिनों में इस बात का प्रमाण होंगी की पहले गुरु किस तरह सीखते थे और आज कैसे। हमें हर पीढ़ी को हर प्रयोग को सम्मान देना चाहिए। पंडित जयकिशन महाराज ने कहा की गुरु असल में अपने शिष्य के स्वभाव को बदलता है, ताकि वह कला को भलीभांति सीख सके। कार्यक्रम का संचालन प्रांजल धर ने किया।