Last Update On : 06 11 2018 11:25:11 PM

हरियाणा रोडवेज की हड़ताल खत्‍म होने पर जैसे ही पक्‍के कर्मचारी काम पर लौटे, रोडवेज विभाग की ओर से आउटसोर्सिंग के तहत भर्ती किए गए सभी कर्मचारियों को दिखा दिया घर का रास्‍ता…

सुशील मानव की रिपोर्ट

जनज्वार। कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में एक शब्द का प्रयोग किया है- ‘उजरती श्रम’ (Wage slavery)’ । उजरती श्रम दरअसल मजदूरों के बीच मची श्रम की होड़ है, जिसका कार्पोरेट, पूँजीपति और राजनीतिक सत्ता अपने अपने मुताबिक फायदा उठाकर दोहन करते हैं। हरियाणा रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान रोडवेज विभाग की ओर से आउट सोर्सिंग के तहत 270 लोगों की नई भर्तियां की गई थीं। लेकिन इन लोगों की नौकरी महज़ एक सप्ताह ही चली और इनकी नौकरी छीन ली गई।

ऐसा नहीं कि इनसे कोई गलती हुई बल्कि रोडवेज की हड़ताल खत्‍म होने पर जैसे ही पक्‍के कर्मचारी काम पर लौटे, रोडवेज विभाग की ओर से आउटसोर्सिंग के तहत भर्ती किए गए सभी कर्मचारियों को घर का रास्‍ता दिखा गया। दीपावली के ठीक पहले सप्ताह भर की नौकरी के बाद बिना किसी ठोस वजह के नौकरी से निकाले जाने बाद पीड़ितों में घोर निराशा और नाउम्मीदी और विक्षोभ है।

गौरतलब है कि हरियाणा रोडवेज कर्मचारियों द्वारा की गई हड़ताल के दौरान सरकार के आदेश पर रोडवेज प्रशासन ने ठेके पर चालक परिचालक रख कर बसें चलाने का ऐलान किया था। इसी कड़ी में आऊटसोर्सिंग पॉलिसी एक के तहत 140 चालक व 130 परिचालक भर्ती किए गए थे।

नए भर्ती किए गए 130 परिचालकों में तीन महिलाएं भी शामिल थी। ये थी रेवाड़ी की शर्मिला, सिरसा की निर्मला और शैफाली मांडा। पहली बार हरियाणा रोडवेज में इन तीन महिलाओं को कंडक्टर के पद पर नौकरी मिली थी, जिसे तमाम अखबारों और मीडिया चैनलों ने नये बदलाव के रूप में बड़े शोर-शराबे का साथ पेश किया था।

वहीं गांव खारी सुरेरां की निर्मला को प्रदेश की पहली महिला परिचालक के रूप में नियुक्ति दी गई थी और कुछ दिन बाद ही शैफाली मांडा निवासी सिरसा सेक्टर 20 को भी परिचालक नियुक्त किया गया था। परिचालक के पदों पर पहली बार महिलाओं की तैनाती को हरियाणा रोडवेज प्रबंधन ने केंद्र सरकार की ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नीति’ से जोड़कर लगे हाथ अपनी पीठ भी थपथपा ली थी। लेकिन अब इन महिलाओं की रोडवेज से सेवा समाप्ति के बाद रोडवेड प्रबंधन ने मुर्दा चुप्पी अख्तियार कर ली है।

वहीं हफ्ते भर की नौकरी के बाद निकाली गई हरियाणा की पहली महिला बस कंडक्टर निर्मला का कहना है कि, “उसे नौकरी चले जाने का दुख नहीं है, परंतु इतना जरूर है कि सरकार ने मीडिया के माध्यम से उसकी ज्वानिंग के समय बड़े जोर-शोर से प्रचार किया था। ये गलत हुआ है। परमानमेंट नहीं तो कांट्रेक्ट बेस पर रख सकते थे। तीन महीने से पहले ही हटा दिया है। सरकार को हमारे बारे में कुछ सोचना चाहिए। हड़ताल खत्म होते ही हमसे बक्से जमा करवा लिए गए और कहा गया कि आपको कल से नहीं आना जबकि ज्वाइनिंग के समय पूरे प्रदेश में वेकेंसी को लेकर पूरा प्रचार किया गया।”

जबकि दूसरी महिला बस कंडक्टर शैफाली मांडा कहती हैं कि “विभाग ने बिना नोटिस दिए उसे हटा दिया और ज्वाइनिंग के समय भी कुछ लिखकर नहीं दिया था।”

बता दें कि नई भर्ती किए गए 270 चालकों परिचालकों के दम पर ही सरकार हरियाणा रोडवेज कर्मचारियों के हड़ताल को काफी हद तक बेअसर करने में कामयाब रही थी लेकिन जैसे ही हड़ताल खत्म हुआ और पुराने कर्मचारी काम पर लौटे सरकार ने अपना गर्ज निकलते ही इन 270 लोगों को दूध में गिरी मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंका।

ये उजरती श्रम की विडंबना है। ये बेरोजगारी की विडंबना है। अपने ही वर्ग का शत्रु बनकर विपत्ति में हरियाणा सरकार को जनाक्रोश से उबारने वाले ये लोग निजी स्वार्थ के लालच में एक ओर अपने वर्गीय बंधुओं का नुकसान करते हैं और दूसरी ओर सरकार इनका इस्तेमाल करने के बाद घुमाकार इनके पेट पर लात मार देती है।

गौरतलब है कि हरियाणा रोडवेजकर्मियों की हड़ताल के 18वें दिन चंडीगढ़ हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद समाप्त हो गई। रोडवेज की हड़ताल खत्म होते ही शनिवार 3 नवंबर को सभी पुराने रोडवेज कर्मी ड्यूटी पर लौट आए। हड़ताल के दौरान रोडवेज ने कांट्रेक्ट पर जिले में रखे करीब 270 चालकों-परिचालकों के हाथों में बसें थमा रखी थीं, मगर स्थायी रोडवेज कर्मियों के लौटते ही एक ही झटके में इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया।

सिटी रोडवेज वर्कशॉप में शनिवार 3 नवंबर सुबह ही उनसे बसों की चाबियां ले ली गईं। हफ्ते भर की नौकरी के बाद निकाले गए लोगों का कहना था कि उन्होंने सरकार का मुश्किल समय में सहयोग दिया, लेकिन सरकार का अपना काम निकलते ही उन्हें अब बाहर कर दिया है।

कैंट बस स्टैंड पर दोपहर इकट्ठा हुए कांट्रेक्ट पर रखे चालकों व परिचालकों ने रोष जताया। वह रोडवेज जनरल मैनेजर से भी मिलने के लिए गए, मगर अवकाश के होते वह नहीं मिल सके।