राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह उत्तर प्रदेश और बिहार का एनडीए के हाथ से निकलना माना जा रहा है तय….

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अब 2019 के लोकसभा चुनाव की चर्चा शुरू हो गई है। इन चुनावों को 2019 के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा था। एक सवाल आज हर किसी के मन में उठ रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में किसकी सरकार बनेगी?

हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हार के बाद भाजपा की चुनावी राह आसान नहीं रह गई है। उसे 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के अलावा उत्तर प्रदेश में सपा बसपा रालोद और कांग्रेस के संभावित गठबंधन, बिहार में राजद और अन्य के गठबंधन के आलावा अन्य प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों की कड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा।

यदि हिंदी पट्टी के राज्य भाजपा के हाथ से फिसले, जिसकी प्रबल संभावना बन गयी है, तो शेष राज्यों से भाजपा के लिए 100-150 से ऊपर जाना लगभग असम्भव हो जायेगा।

हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली जीत के कई मायने हैं। राजस्थान में भाजपा को 18 सीटों का नुकसान हो रहा है। यहां की सभी 25 सीटों पर 2014 में भाजपा का कब्जा था, लेकिन इस बार यदि आज चुनाव होते हैं भाजपा को यहां 7 तथा कांग्रेस को 18 सीटें मिल सकती हैं। यानी भाजपा को 18 सीटों को नुकसान हो रहा है।

मध्य प्रदेश में भी भाजपा को खासा नुकसान हो सकता है। राज्य की 29 सीटों में 2014 में भाजपा का 27 सीटों पर कब्जा था,जबकि कांग्रेस के पास मात्र 2 सीटें थी। बदले परिदृश्य में यहां कांग्रेस को 20 और भाजपा के खाते में 9 सीटें जा सकती हैं।

इसी तरह छत्तीसगढ़ की कुल 11 सीटों में से कांग्रेस के खाते में 9 तथा भाजपा के खाते में 2 सीटें जा सकती हैं। यानी इन तीन राज्यों की कुल 65 सीटों में से भाजपा 18 सीटों में सिमट सकती है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से लोकसभा की 65 सीटें आती हैं। 2014 के चुनावों में भाजपा ने इनमें से 62 सीटों पर कब्जा जमाया था। बदले परिदृश्य में यदि कोई चमत्कार नहीं हुआ तो भाजपा को केवल इन तीन राज्यों में 44 सीटों का नुकसान हो सकता है।

यदि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बसपा, कांग्रेस और आरएलडी का महागठबंधन होता है तो भाजपा को भारी नुकसान होना निश्चित है। तब भाजपा 10 से 15 सीटों पर सिमट सकती है, क्योंकि ऐसी स्थिति में गठबंधन का वोट शेयर 55 फीसद से ज्यादा जा सकता है। देश में हिंदी पट्टी के राज्य भाजपा की ताकत हैं। भाजपा को हिंदी प्रदेशों की पार्टी कहा जाता है। भाजपा को केंद्र की सत्ता में लाने में हिंदी प्रदेश बड़ी भूमिका निभाते आए हैं।

पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था। भाजपा को 282 के आंकड़े तक पहुंचाने में हिंदीभाषी राज्यों के भारी जन समर्थन ने मदद की थी। हिंदी प्रदेश भाजपा के गढ़ हैं। इन प्रदेशों का किला यदि दरकता गया तो भाजपा के मिशन 2019 के अभियान को ‘ग्रहण’ लगना तय है।

बिहार में कुल 40 सीटें हैं, जिसमें इस बार कम से कम 25 सीटें राजद के गठबंधन को और 15 सीटें भाजपा जेडीयू और लोजपा के पाले में जा सकती हैं। झारखंड की कुल 14 सीटें में भाजपा को 5, यूपीए को 5 और अन्य के खाते में 4 सीट जा सकती हैं।

दिल्ली में 2014 में भाजपा ने सातों लोकसभा सीटों पर कब्जा किया था, लेकिन इस बार भाजपा 2-3 सीटों पर सिमट सकती है। शेष चार सीटों पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जीत सकती है।

वहीं जम्मू-कश्मीर की 6 एन सीटों में से भाजपा को 2 सीटें मिल सकती हैं, जबकि कांग्रेस को एक, पीडीपी को एक तथा नेशनल कांन्फ्रेंस को 2 सीटें मिल सकती हैं। हरियाणा की कुल 10 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 2014 में 7 सीटें मिली थी जबकि कांग्रेस के खाते में एक तथा आईएनएलडी के खाते में 2 सीटें गईं थी। इस बार भाजपा को 2, कांग्रेस तथा आईएनएलडी को 4-4 सीट मिल सकती हैं।

उत्तराखंड और हिमाचल में भी भाजपा को 2-2 सीट का नुकसान हो सकता है। उत्तराखंड में भाजपा को पिछली बार सभी 5 सीटों पर जीत मिली थी। इस बार भाजपा को दो सीट का नुकसान हो सकता है। जबकि कांग्रेस के खाते में दो सीट जा सकती हैं। 2014 में हिमाचल प्रदेश की सभी 4 सीटों पर भाजपा का कब्जा था, लेकिन अनुमान के मुताबिक इस बार भाजपा को 2 तथा कांग्रेस को 2 सीट मिल सकती है।

महाराष्ट्र में यदि भाजपा और शिवसेना अलग अलग चुनाव लड़ती हैं और कांग्रेस एनसीपी गठबंधन करके लडते हैं तो 48 लोकसभा सीटों में 25 तथा 15 सीटें भाजपा को और 08 सीटें शिवसेना को मिल सकती हैं। गुजरात में भाजपा ने 2014 में सभी 26 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार भाजपा को 14 तथा कांग्रेस को 12 सीटें मिल सकती हैं।

पश्चिम बंगाल में 42 सीटों में से भाजपा को 2 सीटें फिर मिल सकती हैं। टीएमसी को 28, जबकि सीपीएम को 08, कांग्रेस को 04 सीटें का अंदाजा विश्लेषक लगा रहे हैं। ओडिशा में भाजपा को 3 सीटें तथा कांग्रेस को 2 और अन्य के खाते में 16 सीटें जा सकती हैं। पूर्वी भारत के मिजोरम, नागालैंड, मेघालय आसाम, त्रिपुरा, मणिपुर, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में एनडीए को अच्छी खासी सफलता मिल सकती है।

दक्षिण भारत की 132 सीटों जिसमें आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, अंडमान निकोबार, लक्ष्यद्वीप और पुदुचेरी शामिल हैं, वहां से एनडीए को कोई खास लाभ मिलने की संभावना नहीं लगती। कर्नाटक की 28 सीटों में भाजपा को कुछ खास की संभावना नहीं जताई जा रही है, जबकि कांग्रेस को 12 तथा जेडीएस को 8 सीटें मिल सकती हैं।

अब लोकसभा चुनाव के लगभग चार महीने बचे हैं। मोदी सरकार डैमेज कंट्रोल करने की कवायद जरूर करेगी। उसका प्रयास होगा की उत्तर प्रदेश में विपक्ष का गठबंधन न होने पाए, पर सरकारी तोते की गर्दन फिलवक्त सुप्रीम कोर्ट के हाथ में है इसलिए शायद सपा बसपा को वह सीबीआई का डर न दिखा पाए।

संघ परिवार, साधु-संत वोट की पॉलिटिक्स के लिए अगले चार महीनों में राम मंदिर बनवाने के लिए जुटेंगे, पर मन्दिर का मुद्दा कारगर होता नहीं दिखता। वैसे भी चुनाव से पहले आखिरी चार महीनों में सत्ता के बूते कुछ संभव नहीं हुआ करता। हाँ कांग्रेस सहित विरोधी सेल्फ गोल न मारें और कोई चमत्कार न हो तो मोदी सरकार की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।


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