Last Update On : 09 03 2018 06:19:00 PM

‘सप्ताह की कविता’ में आज कवि विजेंद्र की कविताएँ

‘वे लोग मुझे असुर कहते हैं /और आदमी को आदमी से तराश दुनिया के दर्दनाक हिस्से करते हैं…’ अपनी कविताओं में विजेन्द्र परंपरा से चलते चले आए उस भेदभाव को रेखांकित करते हैं, जिसमें भारत के मूल बाशिंदों को द्रविड़ से असुर और फिर शूद्र कहकर अपमानित किया गया और धीरे-धीरे उन्हें अछूत की श्रेणी में ला खड़ा किया गया। देखा जाए तो आदमी से आदमी को तराश कर जुदा करने की ये कोशिशें दुनिया भर में शासक जातियों ने की हैं। उन्हें सुर-असुर कहें या श्वेत-अश्वेत। वे उस षड्यंत्र की ओर ध्यान दिलाते हैं, जिसके तहत पहले वे रामायण के रचनाकार और पहले कवि को अछूत की श्रेणी में डालते हैं और फिर उनके श्राप से निषादों की पूरी जाति को अछूत करार देते हैं। यह सब एक श्रेष्ठ जाति का गौरवमय इतिहास रचने के नाम पर सदियों से किया जाता रहा है।

आज तुम मेरे नाम का काला बाजार करने पर तुले हो और खराद पर चिनगारियाँ लेते जिन्दा आदमी को सिर्फ आत्मा आत्मा आत्मा कह कर भूसा उड़ाते हो। इस ऐतिहासिक धोखाधड़ी को वे जहाँ से पकड़ते हैं, जिस तरह उसके सामने उसका क्रूर चेहरा लाते हैं वह हिन्दी में अपनी मिसाल आप है। लय, ताल व तुक वाली कविताएँ व सानेट भी लिखते रहे हैं विजेंद्र। हालाँकि ये कविता के पुराने फार्मेट हैं, पर नए कथ्यों से ये भी विजेंद्र के यहाँ प्रभावी हो जाते हैं,और कहीं तो लगता है कि इस पुराने फार्मेट में ही यह नया कथ्य ज्यादा सही ढंग से अभिव्यक्त हो सका है। आइए पढ़ते हैं विजेन्‍द्र की कविताएं – कुमार मुकुल

पगडंडी
मैं जहाँ तक चला हूँ
वहीं तक
मेरी पगडंडी है
उसके आगे फिर –
पथरीली कँकरीली धरती है
और घने वन
गूँजते थर्राते ढलान
वहाँ अभी कोई पथ नहीं
न कोई पगडंडी
वहाँ सबसे पहले जो जाएगा
वही होगा मेरा कवि।
मैं अपनी पगडंडी
अलग भले न बनाऊँ
पर जो दूसरों ने
मुझसे पहले बड़े आघात सहकर बनाई हैं
उन्हें धुँधलाऊँ नहीं
उन्हें विकृत न होने दूँ
पशुओं के पैने खुर –
जिन आभामय अंकुरों को खूंदकर गए
उन्हें उगा नहीं सकते –
पहली पगडंडी पर चलकर
आगे अपनी बनाना ही –
कविता है।
डरो मत…
मैं हर बार
बनी-बनाई पगडंडियों से
चलकर ही
नयी पगडंडियॉं बनाता हूँ –
पिता की पगडंडी भले ही मैं न चलूँ
पर अपने लिए
बेहतर और ऐश्वर्यवान पगडंडी तो बनाऊँ
पर उनका क्या
जिन्हें –
आगे-आगे बनी पगडंडियॉं
दिखाई नहीं देतीं !

राम राम जो चिल्लाते हैं, भक्त नहीं हैं
राम-राम जो चिल्लाते हैं, भक्त नहीं हैं
कहते हैं हमें क्या मंदिर मस्जिद से, चाहिए
हमें तुरफ़ राम की जो न कटे, कहीं है
कोई जो सिद्ध करे यह मस्जिद है, कहिए

उनसे तब कितने मंदिर ढाए अतीत में
उनका हिसाब लेना है। मथुरा काशी
में भी चेतन रहना है। सोए अतीत में
रहें हम सभी, अब हिन्दुत्व जगा है, राशी

धन की छिपी सत्ता में हमको दिखती है
कैसे दिल्ली पहुँचें, अब तक समझ न पाए
अँधकार में रहे भटकते, यह दिखती है
सही सलामत कुंजी हमको कीर्तन गायें

सब मिलकर बस मंदिर यहीं बनेगा, न बने
चाहे, जाए भाड़ में हिन्दू-अपनी भंग छने।

मेरी एक और धरती
मेरी एक और धरती भी है
उपजाऊ
सदा अन्नमय
सुंदर और शान्त ऋतुओं के बीज
जहाँ होती हैं अँधेरे की
सघन छायाएँ विश्रान्त
हिलती हैं टहनियाँ
समय की अतुकान्त
टपकती हैं बूँदें अरुणोदय की
पवित्र निष्काम

घास के हरे तिनकों पर
अशा का मत करो कभी तिरस्कार
कैसे हो गए हैं वन
उदास धुँधलके भरे
बिना बिरखा के
मेरे भीतर है
एक और क्षितिज
तुम्हारी कामकाजी आँखों से ओझल

अभी-अभी हुआ है
उदित इंद्रधनु
अंकुरित बिरवों को छूता हुआ
कभी नहीं देखा तुम्हारी तरह
पेड़ को उदास
फूलों के झरन पर भी
वह रहता है मेरी ओर विहँसता
अगले दिन की खिलावट से
क्यों परेशान है अँधेरा

पोदनी चिड़ियाँ
तितलियाँ
मधुमक्खियाँ
ले जाती हैं फूलों को पराग
बिना पूछे ही पेड़ से
शब्द के जन्म से ही
पैदा हुई है आँच वाणी की
बिजली की कौंध से
थरथराती है हवा

अदेह हँसी की गूँजों में भी
छिपा रहता है
दर्द का उफनता लहरा
क्या करूँगा देख कर
अपनी परछाई गँदले पानी में।