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सप्ताह की कविता में आज हिंदी कवि गगन गिल की कविताएं 

मैथिलीशरण गुप्त, निराला, महादेवी वर्मा से लेकर रघुवीर सहाय और आलोक धन्वा तक जिसने भी नारी की मूलभूत संवेदनाओं को पकड़ने की कोशिश की है उसने दुखों की एक जीवंत कथा रची है। अपने सारे संघर्षों और बदलावों के बाद भी हमारा प्रगतिशील तबका आधी दुनिया के दुखों को आज भी सरसरी तौर पर ही लेता है। उनके निजी संघर्षों को वह अपने उपयोगितावादी तराजू पर तौलता है। उसके होंठ लहूलुहान होते हैं और हमारी अंधी अपेक्षाएँ वहाँ फूल ही ढूंढ़ती हैं।

ऐसे में गगन गिल की कविताएँ मार्मिक चुनौती के रूप में सामने आती हैं। इनमें लड़कियाँ हैं। अबोले दुखों के बोझ से झुकी हुई लड़कियाँ, उनके भार से गूंगी हुई लड़कियाँ। वे हमारे कंधे छूती हैं, विषम हंसी हंसती हैं और चली जाती हैं। यही चुनौती है। अपना दुख बाँटने को नहीं कहती हैं लड़कियाँ। आप में संवेदनाएँ हैं, कूवत है तो बढ़ें और बाँटें उनका दुख। दुख जिनके कारक आप हैं।

लड़कियों से संबंधित गगन की कविताओं में एक पूरी कथा है व्यथा की। किससे कहे लड़की। कौन सुनेगा इसे। विश्वास भी करेगा। किसी सहृदयी ने विश्वास किया भी, तो क्या उसे लेकर लड़ेगा भी और इसीलिए अकेली है लड़की, उदास भी और हंसी के बारूद पर बैठी है। फैज खूब समझते थे इस अफसुर्दा हंसी को। गगन की कविता बताती है कि किस तरह भारतीय समाज में लड़कियों को सुहागन बनाने की प्रक्रिया में अभागन बना दिया जाता है। किस तरह उनकी हर फड़कती नस को मुर्दा रंगीन रेखाओं में तब्दील कर दिया जाता है।

लड़कियां आधुनिकता की चाहत में अपनी त्वचा को रंगती, पोतती, उसकी पर्तें खोदती अपना सौंदर्य खोती चली जाती हैं, एक दिवालिया जिद में -‘लेकिन आजकल वह जिद में है/ अपनी देह का सादापन धीरे-धीरे उखाड़ती हुई!’ गगन गिल की लड़कियों पर केंद्रित कविताओं की मुख्य विशेषता उनकी निर्मल करुणा का ममतामय भोलापन है। जिसे छूते भी भय लगता है। उसे छूना जैसे उदासी को छूना है – ‘माँ की उम्र के इस मौसम में क्या खाकर मरोगे बेटे?/ मिट्टी, घास, बर्फ पहले किसे कुरेदोगे/ अपने नन्हें हाथों से या भूखे ही मरोगे?/ बस नींद मत कुरेदना माँ की कभी/ इसमें उसके सपनों की मिट्टी फंसी होगी।’

करुणा का जैसा आलोक इन कविताओं में है विरले ही कहीं और होगा। करुणा की अभिव्यक्ति की इसी प्रतिभा को लेकर आलोक धन्वा खासे चर्चित हैं। पर एक ओर ये कविताएँ आलोक जी की करुणा के पीछे अलंकार के रूप में जो दुहराव होता है उससे मुक्त हैं, तो दूसरी ओर उनके यहाँ करुणा के साथ जो युग के सवाल होते हैं उसका उस रूप में यहाँ अभाव भी है। यहाँ सहजता है करुणा की, जो किसी ममतामयी नारी में ही हो सकती है। माताएँ हमारे यहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी किस तरह अपनी पुत्रियों को कुंठाएँ सौंपती हैं और बतलाती हैं कि ये ही सुख हैं उसे दिखलाती हैं ये कविताएं – ‘बीत जाएँगे/ जैसे भी होंगे स्याह काले दिन/ हम हैं न तुम्हारे साथ! /कहती हैं माँएँ और बुदबुदाती हैं खुद से/ कैसे बीतेंगे ये दिन हे ईश्वर!’ किस तरह बार-बार लड़कियों को लुभाता प्रेम धोखा देता हुआ खुद शोक में बदल जाता है। प्रेम पर एक बिल्कुल ईष्र्यामुक्त दृष्टिकोण भी उभरता है गगन के यहां। लड़कियों पर केंद्रित कविताओं से गगन की अपनी पहचान बनती है, वहाँ उनकी संवेदनाएँ खुलकर खिलती हैं और वे अमृता प्रीतम के सपाट रोमानीपन से मुक्त दिखती हैं। महादेवी के बाद हिंदी में नया उभार हैं गगन। आइए पढते हैं गगन गिल की कुछ कविताएं –कुमार मुकुल

पिता ने कहा
1.
पिता ने कहा
मैंने तुझे अभी तक
विदा नहीं किया तू मेरे भीतर है
शोक की जगह पर

2.
शोक मत कर
पिता ने कहा
अब शोक ही तेरा पिता है

बच्चे तुम अपने घर जाओ
बच्चे तुम अपने घर जाओ
घर कहीं नहीं है
तो वापस कोख में जाओ,
माँ कहीं नहीं है
पिता के वीर्य में जाओ,
पिता कहीं नहीं है
तो माँ के गर्भ में जाओ,
गर्भ का अण्डा बंजर
तो मुन्ना झर जाओ तुम
उसकी माहावारी में
जाती है जैसे उसकी
इच्छा संडास के नीचे
वैसे तुम भी जाओ
लड़की को मुक्त करो अब
बच्चे तुम अपने घर जाओ

एक उम्र के बाद माँएँ
एक उम्र के बाद माँएँ
खुला छोड़ देती हैं लड़कियों को
उदास होने के लिए…

माँएँ सोचती हैं
इस तरह करने से
लड़कियाँ उदास नहीं रहेंगी,
कम-से-कम उन बातो के लिए तो नहीं
जिनके लिए रही थीं वे
या उनकी माँ
या उनकी माँ की माँ

मसलन माँएँ ले जाती हैं उन्हें
अपनी छाया में छुपाकर
उनके मनचाहे आदमी के पास,

मसलन माँएँ पूछ लेती हैं कभी-कभार
उन स्याह कोनों की बाबत
जिनसे डर लगता है
हर उम्र की लड़कियों को,
लेकिन अंदेशा हो अगर
कि कुरेदने-भर से बढ़ जाएगा बेटियों का वहम
छोड़ भी देती हैं वे उन्हें अकेला
अपने हाल पर!

अक्सर उन्हें हिम्मत देतीं
कहती हैं माँएँ,
बीत जाएँगे, जैसे भी होंगे
स्याह काले दिन
हम हैं न तुम्हारे साथ!

कहती हैं माएँ
और बुदबुदाती हैं ख़ुद से
कैसे बीतेंगे ये दिन, हे ईश्वर!

बुदबुदाती हैं माँएँ
और डरती हैं
सुन न लें कहीं लड़कियाँ
उदास न हो जाएँ कहीं लड़कियाँ

माँएँ खुला छोड़ देती हैं उन्हें
एक उम्र के बाद…
और लड़कियाँ
डरती-झिझकती आ खड़ी होती हैं
अपने फ़ैसलों के रू-ब-रू

अपने फ़ैसलों के रू-ब-रू लड़कियाँ
भरती हैं संशय से
डरती हैं सुख से

पूछती हैं अपने फ़ैसलों से,
तुम्हीं सुख हो
और घबराकर उतर आती हैं
सुख की सीढियाँ
बदहवास भागती हैं लड़कियाँ
बड़ी मुश्किल लगती है उन्हें
सुख की ज़िंदगी

बदहवास ढूँढ़ती हैं माँ को
ख़ुशी के अँधेरे में
जो कहीं नहीं है

बदहवास पकड़ना चाहती हैं वे माँ को
जो नहीं रहेगी उनके साथ
सुख के किसी भी क्षण में!

माँएँ क्या जानती थीं?
जहाँ छोड़ा था उन्होंने
उन्हें बचाने को,
वहीं हो जाएँगी उदास लड़कियाँ
एकाएक
अचानक
बिल्कुल नए सिरे से…

लाँघ जाती हैं वह उम्र भी
उदास होकर लड़कियाँ
जहाँ खुला छोड़ देती थीं माँएँ
उदास होने के लिए…