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‘सप्ताह की कविता’ में आज युवा कवि विपिन चौधरी की कविताएं

युवा कवि विपिन चौधरी की कविताएं पितृसत्‍ता को मिल रही चुनौती को सामने रखती हैं। ‘पतंग उड़ाती मां’ कविता में वे लिखती हैं -‘मां की पतंग खूब उपर उडती/डोर पकडे मुग्‍ध देखता भाई…/पिता से अलग होकर/ मां ने‍ पिता के हिस्‍से के सभी काम संभाले/ फिर भला वह पतंग क्‍योंकर न उड़ाती…’

विपिन की कविताओं में प्रेम की आत्‍मीय जिद और त्रासदी के कई रूपाकार मिलते हैं -‘दिल/ ठीक उसी चीज पर उंगली रखता है जो हमें मिलेगी नहीं…’ ‘इंतजार और फासला’ कविता प्रेम की विडंबना को दर्शाती है -‘अरसे बाद हम प्रेमी मिले/मगर एक दोस्‍त की तरह।’

विपिन की एक प्‍यारी कविता है ‘ रसूल रफूगर का पैबंदनामा’ निर्मल वर्मा का एक शीर्षक है ‘एक चिथड़ा सुख’ यह कविता भी कुछ ऐसी ही सुख की दरारों को आलोकित करती है। इस कविता के माध्‍यम से कवयित्री एक सवाल भी उठाती है -एक बनाये/ दूसरा पहने/ और तीसरा, रफू करे/ दुनिया इसीलिए ऐसी है/ तीन भागों की वीभत्‍सता में बंटी…’

विपिन उस हरियाणा प्रदेश से आती हैं जहां बेटियों को बचाने की जद्दोजहद सरकारें बारहा करती नजर आती हैं। क्‍या हरियाणा, क्‍या राजस्‍थान या उत्‍तर प्रदेश, भारत के अधिकांश हिस्‍से में स्‍त्री भ्रूणहत्‍या पर नियंत्रण की कोशिशें स्‍त्री के प्रति हमारे नजरिये को दर्शाती हैं। विपिन की कविताएं भी स्‍त्री की उस अखिल भारतीय पीड़ा को अभिव्‍यक्‍त करती हैं -‘न जाने कैसी है हमारी तासीर/ हम लात-घूंसे खाती रहीं/ खिलखिलाती भी रहीं।

आइए पढ़ते हैं विपिन चौधरी की कविताएं – कुमार मुकुल

लड़कियों के खेल में गोबर शामिल होता है
स्कूल जाने वाली चंद सौभाग्यशाली
लड़कियां आधी छुट्टी में
स्टापू, पकड़म-पकड़ाई, रस्सी, खो-खो खेलती हैं
जानने वाले जानते है
कि लड़कियां जन्म से ही रचनात्मक होती है
वैसे 1000 के पीछे 877 में स्त्री:पुरुष अनुपात वाले प्रदेश में
इस तथ्य से इनकार करने वाले भी बहुतेरे हैं
गोबर चुगना
गांव के हद में एक मूल्यवान काम है
उसे सहेजना
एक आर्थिक निपुणता
जिसे गांव-गुहाँड की निरक्षर लड़कियों ने एक
चुस्त खेल बना कर ही दम लिया है
तपती बालू रेत में सलवार के पोंचे में उलझने से बचती
भागती हैं ये लड़कियां
लोगों की ढोर डंगरों के पीछे-पीछे
थक जाने पर देखती है
किसका तसला ऊपर तक गोबर से भरा है
काम को एक खेल में तब्दील कर अपनी
सूझ बूझ का अंगूठा लागने के
इस खेल में किसी और की दिलचस्पी हो ना हो
इसकी उन्हें परवाह नहीं है
देश के ग्रामीण विकास मंत्री को
गांवों में इस कामनुमा खेल की कोई खबर कैसे हो
यह खेल किसी देश के खेल में शमिल भी नहीं है
अपने यहाँ एक रोज़गार मंत्री
आंकड़ों में मुहँ घुसाये बिना यह नहीं बता सकता कि
देश में कितने बेरोजगार हैं
और ग्रामीण मामलों का मंत्री
तो इतना लाजवाब कर देता है जब वह
अपना ताज़ा बयान लेकर हाज़िर होता है कि
“सब ग्रामीण लड़कियां अब स्वाबलंबी हो गयी हैं”

ऐ लड़की
तुम क्या पसंद करोगी
कहो
किसी सत्यवान की खातिर तपना पसंद करोगी
या सीता की तरह आग में उतरना चाहेगी
या कोई और ही रास्ता चाहने वाली हो?

पर ध्यान रहे पूरी मर्जी तुम्हारी नहीं
जिस भी रास्ते से तुम जाओगी
वह हमारी सलाहों मशवरों से होकर गुजरेगा
कई अल्पविराम पूर्णविराम होंगे तुम्हारे आगे-पीछे
तुम्हें हर पल परदे में रखा गया
तुम्हारे कदम लक्ष्मण-रेखा के भीतर ही रोके गए
इतनी धनी पहरेदारी पर भी
तुम्हारी आंखों ने उसे ही क्यों भेदा
जो तुम्हारी पहुंच से परे था
एक फंदा भी तैयार है यहां
यहां! इस तरफ
अपना सिर इसमें खुद डालोगी या
इसमें भी हमें हाथ बंटाना होगा
हमें पीसना आता है छोरी
धान भी इंसान भी

हमारे पास मूंछें नाक और सत्ता सब है
एक चुप हजार सुख हैं
सुन ले और हमारी हिदायतों के भीतर रह
यहीं तुम्हारी किस्मत होगी
पर उससे पहले
जरा इधर तो आ!

बारीक ध्वनियों का बेचैननामा है कविता
एक लम्बी बेचैनी से गुज़रते हुए
कई ध्वनियाँ चुपके से साथ हो लेती हैं
बाहर जो कुछ भी अड्गम-सड्गम सुनाई देता है
उसे एक कोने में धकेलते हुए
सुबह मेरी और आईने के बीच की मूक बातचीत
बग़ीचे को पानी की फुहारों का दर्शन करवाते हुए
पानी और पेड़-पत्तों के आस-पास बिखरी हुई
जो रंग-बिरंगी ध्वनियाँ थिरक रही होती हैं और
भूखी-प्यासी
चिड़ियों को दाना-पानी
देते वक़्त
शुक्रिया की जो महीन आवाज़े वे भी और
न जाने कितनी ही
ध्वनियाँ कविता में रूपांतरित हो
उकड़ूँ बैठ जाती हैं
एक सुन्दर कविता
इन्हीं ध्वनियों का बैचैननामा ही तो है।