Last Update On : 08 06 2018 02:42:03 AM

सप्ताह की कविता में आज हिंदी के ख्यात कवि पंकज सिंह की कविताएं

‘दुनिया को बदलने के स्वप्न’ से भरे कव‍ि के भीतर ‘सदियों की आग की’ जो विरासत है वही अपने ‘समय की जीभ पर’ हलचल पैदा करती जनोन्मुख है। चरम ‘बदहाली’ के दिनों में भी ‘सिर्फ सहमति और स्थिरता’ की चाहत रखने वाली ‘दैत्याकार’ सत्ता के बरक्स आम जन के बारंबार खड़े होने की असफल मगर अनंत कोशिशों की दास्तान हैं पंकज सिंह की कविताएं। अपनी सारी सामर्थ्य को ‘बार-बार ईंधन’ बनाने का जीवट है कवि के भीतर और अपने समय के फॉसीवादी चरित्रों की उसकी पहचान मुकम्मल है। इसीलिए 1974 की कविता ‘तुम किसके साथ हो’ में लिखी पंक्त‍ियां –

‘देखो कैसा चमकता है अंधेरा/काई की गाढी परत सा/एक निर्मम फॅासीवादी चरित्र पर/ देखो लोकतंत्र का अलौकिक लेप…’ आज चालीस साल बाद भी वैसी ही प्रासंगिक लग रही हैं जैसी तब की परि‍स्थ‍ितियों में रची जाती वे थीं। लोकतंत्र का लेप लगाए फॉसीवाद आज फिर सत्तासीन है और पूरा मीडिया उसकी अलौकिकता से ओत-प्रोत है। ‘अच्छे दिनों’ की डुगडुगी के सामने सारी अभिव्यक्तियां बेसुरी नजर आ रही हैं। पर ऐसे कठिन समय में भी कवि को ‘खामोश पेड़ों की ताकत के कई’ सचों पर भरोसा है कि हर वसन्त में उनका प्राकट्य ‘रंगों की भाषा में’ होना ही है। हिन्दी में क्रांतिकारी कविता की चर्चा बारहा होती है, पर जिस तरह के कलात्मक अवलेह में लपेटकर उसे प्रस्तुत किया जाता है कि वह एक परिवर्तनकामी चेतना से ज्यादा परिवर्तन के प्रतीक के रूप में सिमटता चला जाता है। आलोक धन्वा, वेणु गोपाल, मंगलेश डबराल आदि कई रंग हैं इस कविता के पर आलोक को छोड़कर बाकी के यहां या तो वह भाषाई परचम बनता नजर आता है या नारा होकर सीमित रह जाता है। अपनी आंतरिक ताकत के साथ वह आलोक धन्वा में प्रकट होता है। मंगलेश के यहां तो आम जन का संघर्ष कलात्मक अभिव्यक्त‍ि को एक मुक्त‍िकामी स्पर्श देने तक सीमित रह जाता है पर इस मामले में पंकज सिंह अकेले कवि हैं जो जनता की ताकत को उसके ऐतिहासिक संदर्भों के साथ पिछले चालीस सालों से लगातार रेखांकित करते आ रहे हैं –

संस्मरणों की अपनी पुस्तक ‘यादों के चिराग’ में कथाकार कमलेश्वर एक जगह लिखते हैं – ‘ … यह ‘नहीं’ मेरी सोच और अस्मि‍ता का मूलाधार बना है। … ‘नहीं’ मेरी अन्तर्शक्ति‍ है। … मुश्किलें बार-बार आईं लेकिन इस ‘नहीं’ के कारण कभी पछतावा नहीं आया।’ पंकज सिंह के एक कविता संकलन का नाम ही ‘नहीं’ है। कमलेश्वर की तरह पंकज सिंह का ‘नहीं’ भी उनकी अंतर्शक्ति‍ है। ‘मैं कुछ नहीं छिपाउंगा’ कविता में ‘नहीं’ की ताकत को वे बड़े स्प्ष्ट तौर पर अभिव्यक्त करते हैं –‘मैं कुछ नहीं छिपाउंगा /सफेद को नहीं कहूंगा स्याह…’ अपनी इच्छाओं की अभिव्यक्ति हम सामान्यतया हां की सकारात्मकता के साथ करते हैं। कि हमें चाहिए होती है एक सुंदर और सुकोमल दुनिया, स्वप्निल और रंगों भरी। अक्सर हम भूल जाते हैं कि इन सुकोमल भावों की नर्म बाहों थामने के लिए भी हमें सुदृढ़ हाथों की जरूरत होती है, जो बारहा जन्म लेते नवांकुरों के खिलाफ लगातार खड़ी होती बाधाओं को रोकें, उन्हें स्पष्ट न कह सके, उसके लिए परिस्थितियों की कठोर जमीन को तोड़ उसे उर्वर और कोमल बना सकें। पंकज सिंह की ‘इच्छाएं’ ऐसी ही स्पष्ट और सकारात्मक ना के लिए जगह बनाती हैं ताकि हम ‘ताकत वालों की आंखों में आंखें डाल’ उनकी बुरी ‘नीयत को ताड़’ सकें और कह सकें…नहीं’। कवि की यह ना इसलिए है कि उसे –‘पूरे-पूरे वाक्य चाहिए जिनमें निश्चित अर्थ हों।’आइए पढ़ते हैं पंकज सिंह की कुछ कविताएं – कुमार मुकुल

शर्म
डरी हुई हैं बेशुमार भली स्त्रियाँ
डरे हुए हैं बेशुमार बच्चे

काग़ज़ पर क़लम लेकर झुके लोगो
यह कितनी शर्म की बात है।

मध्यरात्रि
मध्यरात्रि में आवाज़ आती है ‘तुम जीवित हो?’
मध्यरात्रि में बजता है पीपल
ज़ोर-ज़ोर से घिराता-डराता हुआ

पतझड़ के करोड़ों पत्ते
मध्यरात्रि में उड़ते चले आते हैं
नींद की पारदर्शी दीवारों के आर-पार
पतझड़ के करोड़ों पत्ते घुस आते हैं नींद में

मध्यरात्रि में घूमते होंगे कितने नारायन कवि धान के खेतों में
कितने साधुजी
सिवान पर खड़ी इन्तज़ार करती हैं शीला चटर्जी मध्यरात्रि में

मध्यरात्रि में मेरी नींद ख़ून से भीगी धोती सरीखी
हो जाती है मध्यरात्रि में मैं महसूस करता हूं ढेर सारा ठण्डा ख़ून

‘तुम जीवित हो?’ आती है बार-बार आवाज़

मध्यरात्रि में दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है
बजाई जा सकती है किसी की नींद पर साँकल

मध्यरात्रि में कभी कोई माचिस पूछता आ सकता है
या आने के पहले ही मारा जा सकता है मुठभेड़ में
मेरे या तुम्हारे घर के आगे

मध्यरात्रि में कभी बेतहाशा रोना आ सकता है
अपने भले नागरिक होने की बात सोचकर

सम्राज्ञी आ रही हैं
नागरिको उत्सव मनाओ कि सम्राज्ञी के दर्शन तुम्हें करने हैं
भीतभाव से प्रणाम संभालते हुए अपने दुखों के कीचड़ में
रुंधे गले से ही स्वागत गीत गाते हुए
उत्सव मनाओ

सम्राज्ञी का रथ तुम्हारी अंतड़ियों से गुज़रेगा
रथ गुज़रेगा तुम्हारी आत्मा की कराह और शोक से
तुम्हारे सपनों की हरियालियाँ रौंदता हुआ
रथ गुज़रेगा रंगीन झरनों और पताकाओं की ऊब-डूब में

संभलकर, अपनी मुर्दनी और आक्रामक मुद्रा को
मीठी रहसीली स्वागत भंगिमाओं में छिपाते हुए
स्वतंत्रता की इस दोगली बहार में
झुक जाओ भद्र भाइयो
सम्राज्ञी आ रही हैं

सम्राज्ञी तुम्हारी सामूहिक नींद पर झुकी हुईं
आवाज़ों के पुल से धीरे-धीरे नीचे की ओर उतरती हुईं
सम्राज्ञी
तुम्हारी आँखों को
कृतज्ञता और आभार के जल से भरती हुईं
आने वाली हैं

सड़कों के किनारे बच्चे खड़े होने चाहिएँ, अधनंगे मुस्कराते
बचपन के उदासीन खंडहरों में पड़े फटे हुए चित्रों से
हाथों में फूल लिए बच्चे…
स्त्रियाँ तुम्हारी खिड़कियों से झाँकती, हाथ हिलाती
खड़ी होनी चाहिएँ ॠतुओं के कामनाहीन सूनेपन में

ख़ुशियों की आहटें अगोरती स्त्रियाँ…
पेड़ होने चाहिएँ तुम्हारी ठूँठ इच्छाओं की तरह सन्नद्ध विविधवर्णी
और हर तरफ़ सदियों की मुर्दनी भरी ऊसर आँखें
बिछी होनी चाहिएँ आती-जाती हवाओं के रेशे-रेशे में

कि चौकन्ने सभासद हर कहीं मौज़ूद होंगे
कि चौकन्ने सभासद वायदों और सपनों की गुनगुनाहट में
हर कहीं मौज़ूद होंगे तुम्हारे तेवर खंगालते
भविष्य और उत्सव के फूलों के आसपास

सम्राज्ञी आ रही हैं

इस औंधे नगर में हुई हत्याओं की सूचनाएँ सभासद देंगे उन्हें
कि ख़तरनाक बन्दी मारे गए कारागार लांघते हुए
कि कुछ असभ्य लोग मारे गए कुलीन नागरिक आवासों के आसपास
अपने अंधेरों से
संतुष्ट और शालीन अमात्यों का रिश्ता ढूंढ़्ते हुए

और लज्जित भाव से तुम सब सिर हिलाओगे
कि तुमने व्यर्थ का साहस ख़र्च किया, व्यर्थ का मूर्खतापूर्ण विरोध
कि राजकीय हिंसा की सारी घटनाएँ जन्म-जन्मांतरों के नियम हैं
दुस्साहसिक प्रजाओं के लिए…

घोड़ों, मनुष्यों और शस्त्रास्त्रों की भीषण चकाचौंध में
तुम्हारी टांगों की लगातार थरथराहट सम्राज्ञी को दिख न जाए
ध्यान रखना, स्नायुओं की सिहरन शांत रखना
सम्राज्ञी आने वाली हैं तुम्हारे नगर को आगामी वर्षों के लिए
गर्म और सुखद स्मृतियों और आश्वासनों से भरने

इससे पहले कि रथ के घोड़ों की पहली टाप सुनाई दे और
धूल के पहले बादल सीमांत पर उठते हुए नगर की ओर आएँ
तुम एक पहचानहीन हलचल हो जाओ
जिसका कोई भी उपयोग सम्राज्ञी के सैनिक और सभासद करें
तैरते हैं ज़हरीले बादल तुम्हारी आकांक्षाओं के आकाश में
सभागारों में उमड़ते आते हैं झूठ के हज़ारों रंग

सम्राज्ञी की प्रजावत्सलता से गदगद
अपने ज़ंग लगे चेहरे मांज आओ प्रिय नगरवासियो
सम्राज्ञी आ रही हैं

सम्राज्ञी आ रही हैं